Wednesday, 19 June 2019

मानवीय-संबंधों में प्रेम - अपनत्व तलाशती कहानियों का संग्रह स्वेटर

मानवीय-संबंधों में प्रेम - अपनत्व तलाशती कहानियों का संग्रह स्वेटर
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक- स्वेटर (कहानी संग्रह)
लेखक- अशोक जमनानी, होशंगाबाद
प्रकाशक- संदर्भ प्रकाशन, भोपाल
समीक्षक- अनिल अयान,सतना

अशोक जमनानी का यह संग्रह पहली बार मेरी नजर के सामने हैं, पूरे मध्य प्रदेश के लिए अशोक जमनानी उपन्यासों और कहानियों के लिए जाना पहचाना नाम है, यह कहानी संग्रह अपने अंदर पंद्रह कहानियों को समेटे हुए है। ये सभी कहानी हमारे समाज और परिवार और याराना के बीच घटने वाली कहानियां हैं। इन कहानियों में आपको हर उम्र के पात्र उपस्थित मिलेंगें, इन कहानियों में प्रमुखतः स्वेटर, चोर, सुंदर, परकम्मा वासनी, लफ्फाज, टिकिट, रंग, उल्टी चप्पलें, झुर्रियाँ, अलग, अलमारी, लाल चीटियाँ, ग्लोबल वार्मिंग, ज़मीन, और कुंभ दादी प्रमुख कहानियाँ हैं। इन कहानियों की बात की जाए तो स्वेटर युवा मन की कहानी
जिसे स्वेटर की वजह से प्रेमी के रूप में बदनाम कर दिया जाता है, चोर गली मुहल्लों में चोरियों की घटनाओं पर आधारित कहानी है, सुंदर बुजुर्ग महिला बुआ जी के जीवन की विसंगतियों की कहानी है, परकम्मा वासिनी, एक बेबस बुजुर्ग महिला की अपने पारिवारिक दाम्पत्य दुख को त्यागकर नर्मदा परिक्रमा में लीन होने और अनुभवों की कहानी है। लफ्फाज हरफनमौला बन्ने मियाँ के जीवन पर आधारित कहानी है, वहीं टिकिट एक युवा कामगार गोकुल की परहित सरिस धर्म नहीं भाई सूक्ति को साकार करती कहानी है, रंग पति पत्नी के अंतरंग मनोभावों को छूने वाली कहानी है, उल्टी चप्पलें पिता और पुत्री के अगाध प्रेम को प्रदर्शित करती कहानी हि, झुर्रियाँ ग्रामीण परिवेश की एक बेबस महिला और उसके अनछुए असफल प्रेम की कहानी है। अलग स्त्री और पुरुष के बीच अनायास उपजे प्रेम की कहानी है जिसमें दोनों अपनी अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से अकेलेपन के शिकार होते हैं। अलमारी नव विवाहित जोड़े के शहरी जगदोजहद और आपसी वैचारिक भिन्नता को समेटे हुए घटनाक्रमों की कहानी है। लाल चीटियाँ महिला प्रताड़्ना पर आधारित कहानी है जिसमें प्रमुख पात्र समाज और परिवार से क्षुब्ध होकर पलायन कर जाती है। ग्लोबल वार्मिंग ग्रामीण परिवेश की कहानी हैं जिसमें पूजा और कर्मकांड करने वाले पुरोहित गरीब लोगों को कैसे परेशान करते हैं यह दिखाया गया है। ज़मीन स्त्रीपुरुष के बीच अनन्य प्रेम की पराकाष्ठा और घनिष्ठत को दर्शाती कहानी है, अंतिम कहानी कुंभ दादी  एक  बुजुर्ग महिला के जीवन की कहानी है जिसका अंतिम समय कुंभ नहाने की मनोकामना के साथ पूर्ण होता है।
इन सभी कहानियों में जीवन के विभिन्न रिश्ते, समाज के विभिन्न पहलुओं को देखने और समझने का अवसर मिलता है। इसमें अधिक्तर कहानियों में मानव मन के बीच में उपजे प्रेम को अपने शब्दपाश से कहानी कार ने कहानीपन के द्वारा संवारा है, ग्रामीण परिवेश की कहानियाँ ग्रामीण जनजीवन और संबंधों की महत्ता को उजागर करता है, ये कहानियाँ कोई प्रोफेशनल कहानियों की तरह चटख पटक वाली नहीं हैं, इनमें शहरी मक्कारियाँ और फरेब कम दिखेगा, इन कहानियों में सकारत्मक उर्जा का समावेश कथाकार पात्रों के माध्यम से करता है, इन कहानियों में पात्र पलायन नहीं करते बल्कि साहस दिखाते है, इन कहानियों का देशकाल और वातावरण पाठक को बांधे रखते हैं, संवादों की सहजता पाठक को मंत्रमुग्ध करती है। कुछ कहानियों में स्त्री पात्रों की स्थिति उनकी समाजिक परिस्थियों का आईना बन जाती हैं। कहानियों की भाषा और बुनावट पाठक को उबाऊपन से दूर करती है। कहानी सरलता लिए होने की वजह से पाठक कहानी के कथ्य और कथाकार के उद्देश्य को समझने में सफल होता है। इस संग्रह में मेरे अनुसार उल्टी चप्पलें सर्वश्रेष्ठ कहानी और लफ्फाज किस्सागोई और बुनावट के हिसाब से कुछ कमतर कहानी लगी। हर कहानीकार के लिए सभी कहानी प्रिय होती हैं। इस संग्रह की कहानियाँ पाठकों को कुछ पल के लिए अपने आसपास झांकने के लिए विवश करती हैं, तथा प्रेम और अपनत्व के कितने रूप हो सकते हैं यह समझाने में सफल होती हैं। यहीं सही मायनों में इस संग्रह की पाठकीय सफलता है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

Monday, 17 June 2019

बचपन की सैर कराती बाल कवित़ाओ का संग्रह

बचपन की सैर कराती बाल कवित़ाओ का संग्रह

कृति-अम्मा जरा बताओ, बाल कविताएँ
लेखक- डॉ हरीश निगम, सतना
प्रकाशक- जेटीएस पब्लिकेशन, नईदिल्ली
समीक्षा -अनिल अयान, सतना।

पूरे देश मे जहां बाल साहित्यिक कृतियों का अकाल सा है उस दरमियां डा हरीश निगम की स्मृति शेष अंक का यह संग्रह भीषण गर्मी मे वादियों की ठंडक देने वाला है। सतना मे बाल कविताओं मे थोडा बहुत काम डॉ वेद प्रकाश सिंह प्रकाश जी ने भी किया, हरीश निगम जी की बाल कविताएं जो नवभारत टाइम्स मे नियमित प्रकाशित होती रहीं उनको सहेजने का काम मरणोपरांत उनके परिवारजनों ने इस पुस्तक के रूप मे किया यह बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध होगा। इस संग्रह मे बचपन की हर उस अंगडाई को हरीश निगम जी ने कविता के बंधों मे माला की तरह पिरोया है जिसे हम सामान्यतः नजरंदाज कर देते है।उनके जीवित रहते भी उनके कई बालकविताओं का संग्रह आये हैं। किंतु यह इसलिए भी सर्वश्रेष्ठ है क्योकि यह उनकी अनुपस्थिति मे आया है और उनकी उपस्थिति की महक देता रहेगा।
इस संग्रह मे अर्धशतकीय बाल गीत हैं जो विभिन्न विषयों जैसे अम्मा की बातचीत, चंदामामा, सडकें, पंछी, सर्दी, जाडे का मौसम, दीवाली, सूरज, शिशुगीत, पानी, सुबह, वर्षा, चूहा चुहिया मंहगाई, छुट्टियां, गर्मी, दादा जी, बंदर मामा, नया साल, होली विषयों को समेटा गया है।
सभी गीत बाल मन की जिज्ञासाओं से उपजे हैं। कई सवाल और उनके सवाल देते ये गीत सरल, सहज और गेयता लिए हुए हैं, इन पर बच्चे अभिनय भी कर सकते है प्री प्राइमरी और प्राइमरी कक्षाओं के लिए बच्चों के जुबां मे जल्दी ही आ जाने वाले ये गीत सतना की माटी और सतना के लाल हरीश निगम की लेखनी और भावों की सुगंध बिखेरते हुए पाठक को मंत्र मुग्ध करते है,  पुस्तक के शीर्षक के गीत का बंध देखे-।।नानी इतनी ढेर कहानी, और कुए जी इतना पानी, रोज कहां से पाते हैं, अम्मा जरा बताओ तो।। या फिर ।।आई आई गर्मी आई, पूंछ दबाए भगी रजाई, ठंडा पानी लगे मिठाई, लू मैडम ने डांट लगाई।। इन गीतों मे छंद बद्धता भी है, गेयता भी है, मन का संगीत भी है, लेखक के कलम की जादुई सम्मोहित करने वाली कल्पना भी है। इस पुस्तक को पढते हुए इस बात का क्षोभ जरूर होता है कि हरीश सर की ये कृतियां ही हमारी साथी है। वो अगर होते तो और ज्यादा बाल रचनाएं हमें पढने को मिलती, किंतु उनका यह संकलन बच्चो और बूढों दोनों को बचपन की सैर कराने मे सफल सिद्ध होता है। 

अनिल अयान, सतना

असंवेदनशील समाज की केंचुल उतारती कविताओं का संग्रह

असंवेदनशील समाज की केंचुल उतारती कविताओं का संग्रह
पुस्तक - केंचुल (कविता संग्रह)/लेखक - ऋषिवंश,सतना/प्रकाशक- नमन प्रकाशन, नई दिल्ली/समीक्षा- अनिल अयान,सतना
सतना के सुप्रसिद्ध कवि ऋषिवंश या विद्याशंकर मिश्र अपनी पीढी के जाने माने कवि और उपन्यासकार हैं। वो ऐसे लेखक हैं जिनकी कृतियाँ बिना शोर गुल किये हम सबके बीच में उपस्थित हो जाती हैं, वो एक मात्र ऐसे रचनाकार हैं जिनकी कृति युद्धबीज जो एक उपन्यास है, को भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया। एक तरफ उनके उपन्यासों में आज के समय की विशंगतियों का दर्द हैं वहीं दूसरी ओर वो  जीवन के विभिन्न पहलुओं और अनुभवजन्य रचनाओं से समाज के लोक और जन की बात करते हैं, उनकी कविताओं में आम आदमी की पीड़ा का गान है। उनकी कविताओं में समाज की विद्रूपताओं को प्रकाश में लाने का जिम्मा है। उनकी कविताओं में सहज स्वाभाविक भावों से भरे होने का गुण मौजूद है। केंचुल कविता संग्रह इन्हीं विशंगतिपूर्ण समाज, संबंध, चिंतन, विमर्श, देशकाल का चित्रण देखने को मिलता है। इस संग्रह की जितनी भी कविताएँ हैं वो कविताओं की परंपरागत संरचना से कोसों दूर हैं। उनकी कविताओं में अनावश्यक कल्पनाओं और गूढ़ शब्दों को स्थान नहीं दिया गया। उनकी कविताएँ सीधे तेज प्रवाह से पाठक के दिलो दिमाग तक पहुँचती हैं। उनकी कविताएँ सीधे सपाट, जस के तस, आँखन देखी कागद लेखी की परिकल्पनाओं को समेटें हुए हैं, उनकी कविताओं में शब्द शक्तियों के प्रयोग से परहेज किया गया है, नकी कविताएँ नई कविताओं के काव्य आंदोलनों की बानगी है। इन कविताओं में समस्याओं के लिए कवि की तरफ से सुकून, आश्वासन, तसल्ली, दिलासा और शांति पूर्ण आवेग का प्रवाह दिखाई पड़ता है।
कविता संग्रह के अनुक्रम की तरफ बढ़े तो कविताओं के केंद्रीय भाव ही पाठक को उद्वेलित करने वाले हैं एक शतक कविताओं में हर कविता में कुछ ना कुछ विशेष है जो अन्य कविताओं से उसे भिन्न बनाता है। इस संकलन की कुछ कविताएँ जैसे वक्त की खूटी पर, तेवर, इस्तहार, उम्रकैद, अकुलाहट, पूँछना पड़ेगा, बिजलियाँ, नफरतें, अकाल, खतरनाक समय में, दावानल, टेररिस्ट, शोषण, केंचुल, आवारा किस्से, मामूली लोग, बरबादियाँ, कंगाल,अभिषाप, जो नहीं है, अभागा, चोर आदि कुछ ऐसी कविताएँ हैं जो पाठक को एक पल के लिए सोचने की खातिर विवश कर ही देता है। इन कविताओं की विषय वस्तु लौकिक, समाजिक, साहित्यिक, सामाजिक, संबंधजन्य, मनस्थिति के भिन्न भाव भूमि, अध्ययन और विचरण, जीवन के अनुभवों के बीच से पैदा हुए झंझावातों को प्रस्तुत करती है। सवा सौ पेज की इस कृति में वो सब कुछ मौजूद है जो अकुलाहट और बेचैनी में आकर पाठक पुस्तकों में खोजना चाहता है। इनकी कविताओं में शालीन अक्रोश है, जिसकी बानगी तेवर कविता की ये पंक्तियाँ - कुछ और बिगड़ेगी बातें/ बन जाएगें और पेचीदा हालात/ नहीं बैठेंगी खामोशियाँ चुपचाप/ बदलेगा तेवर आदमी बार बार। इनकी कविताओं में चिंता के रज कण भी आपको देखने को मिलेगें एक बानगी इश्तहार में देखिये- झूठे हलफनामें दे देकर / सुख चाहिए होगा आदमियों को/ इश्तहार बुलाएगा उन्हें अपने आप/ नंगी औरतों के चित्र दिखा दिखाकर/ बेची जाएगीं  कमजोरियाँ/झाँसे में आते रहेंगे लोग। इनकी कविताओं में मानवजीवन के पलायन के बीच में आशाओं की किरण भी देखने को मिलती है केंचुल कविता की ये पंक्तियाँ देखें - दंड़ है देह धरने का/ अवांछित करना और भोगना/ न भूख खत्म हुई न समस्याएँ/ अब तो बासी और विखंडित देह गंधाने लगी है/ केंचुल उतारने की बड़ी इच्छा होती है। धरती के प्रति कवि की जायज चिंताओं को भी संग्रह में स्थान दिया गया है जिसमें वो कहता है कि आपातकालीन व्यवस्थाएँ कारगर नहीं होगीं/ हमें तो चाहिए वही पुरानी और नैसर्गिक/लता पत्र से लदी फंदी आदिमयुग की धरती। ऐसे ही ना जाने कितने भावों को सहेजे कविताओं को संग्रहित करने में सफल हुआ है यह संग्रह,
इस संग्रह की भाषा सपाट खड़ी बोली में है, कहीं कहीं अंग्रेजी, उर्दूऔर बघेली के शब्दों की उपस्थिति भी कविताओं में मिल जाती हैं। कहीं कहीं पर कविताओं में प्रतापगढ़ बांदा का वो अख्खड़पन और बेबाकी का लहजा मिल जाता है, कविताओं में छंदबद्धता और गेयता का अभाव है,शब्दों के साथ चमत्कार और तिलिस्म खोजने का प्रयास बिल्कुल भी नहीं किया गया है। कविताओं में कवि के मन में उपजी चिंता, समाधान, विशंगतियों के प्रति खोजी रवैया, खुद के प्रति सजगता साफ साफ झलकती है, अंततः पाठकों की वोश्रेणी जो समाज देश और राजनीति के प्रति चिंतन और चिंतित रहती है उसके लिए यह संग्रह सुकून और शांति देने वाला बन ही जाता है। समसामायिक विषयों को केंद्र में रखकर लिखी गयी ये कविताएँ अपने समय की झंड़ावरदार बनती है, इस हेतु रचनाकार बधाई के पात्र हैं।
अनिल अयान,सतना
बेचैन मन को 

Sunday, 17 March 2019

विद्रूपताओं को तिर्यक दृष्टि से देखती हुई रचनाएँ का संग्रह

पुस्तक समीक्षा-
विद्रूपताओं को तिर्यक दृष्टि से देखती हुई रचनाएँ का संग्रह

पुस्तक - मुसाफिर इस दौर के
लेखक- रविशंकर चतुर्वेदी, सतना, म.प्र.
प्रकाशक - दिनकर प्रकाशन, प्रयाग, उ.प्र.
मूल्य - सौ रुपए मात्र

मुसाफ़िर इस दौर के काव्य संग्रह सतना के रविशंकर चतुर्वेदी, जो पिपरवाह,अमरपाटन के निवासी हैं,के द्वारा लिखा गया। पुस्तक में चतुष्पदियों, और कवित्त छंदों का संकलन है। रविशंकर चतुर्वेदी अपनी कम उम्र मे एक वट वृक्ष की तरह रहे जिनके नीचे मैने साहित्य में प्रवेश,गोष्टियों में सिरकत, कविसम्मेलनों के काव्यपाठ करने के बहाने खुद को स्थापित करने का अवसर पाया, मै ही क्या बहुत से युवा रचनाकारों को कविता लिखने का सउर रविशंकर जी ने सिखाया है। यह उनका भौतिक रूप से कविता संग्रह के रूप में पहली कृति हो सकती है, किंतु जिसने भी उनको मंचों में बिना चुटकुले बाजी के हास्य व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए सुना होगा वह जानता है, कि इस तरह की दर्जनों भर पुस्तकों के लायक उनके पास रचनाएँ हैं, हालाँकि वो मंच में सीमित रचनाओं को प्रस्तुत करने और उन्ही के माध्यम से श्रोताओं को गुदगुदाने का हुनर स्थापित करने में सफल रहे हैं।
कृति का शीर्षक ही यह बता रहा है कि इस दौर में हर शख्स दुनियादारी से परेशां है। इन्ही परेशानियों के सबब को कवि ने अपनी हास्य व्यंग्य की गुदगुदाती दुनिया के परे भी चिंतन परक रचनाएं लिखने का रोग पाल लिया। अपने हाव भाव से, श्रोताओं के बारह बजे चेहरे पर भी हंसी बिखेरने वाले इस कृति के लेखक ने इस कृति में लगभग पचहत्तर रचनाओं को स्थान दिया है जो शीर्षक विहीन होते हुए भी केंद्र में विषयवस्तु को समाहित करती है। लेखक खुद इस बात को स्वीकार करता है कि वो मानकों की चिंता किए बगैर इस कृति की रचना की है। उसका मन जब देश की वर्तमान विद्रूपताओं से दुखी होता है तब उसके हास्य व्यंग्य की व्यंजना की रचना होती है। सीधे सरल शब्दो में उनका व्यंग्य श्रोताओ और पाठकों तक पहुंच कर अंदर से हिला देता है।
चतुष्पदियों के माध्यम से कवि ने विभिन्न सामाजिक विशंगतियों के आयाम को छूते हुए अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट कर दिया है। उनका कवित्व सच का साथ ही देगा भले ही कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ हों जाएं। इन पंक्तियों में उनकी बानगी देखें- बेंचकर ईमान किधर जाएगें,टूट जाएगें बिखर जाएगें, सांच की आँच में तपाओगे, हम तो सोने सा निखर जाएगें। वर्तमान समाजिक विशंगतियों, और ऊँचनीच, भ्रष्ट समाज के भ्रम जालों के बीच वो लिखते हैं कि - ये भला कैसे काम कर बैठे, रोशनी तम के नाम कर बैठे, पद की चाहत में गिर गए इतना, खुद को पद का गुलाम कर बैठे।
आज की ढोल पोल शिक्षा व्यवस्था पर चोंट करते हुए उनकी कलम यहाँ तक कह जाती है कि - कितनी मनहूस हैं मेरी डिग्री, रोटियाँ तक नहीं दिला पाई। आज की न्याय व्यवस्था पर वो आंसू नहीं बहाते बल्कि प्रशासन के सामने प्रश्न चिंह्न खड़ा करतेहैं कि - ले के फ़रियाद कहाँ जाएगें, जबकि मुन्सिफ़ ही खुद बिका सा है। जीवन भर जो भीड़ में हंसते हैं उनके पीछे का दर्द भी कवि से नहीं छिपता वो अपने जैसे हर पल हंसने मुस्कुराने वाले चेहरों का राज खोलते हुए लिख जाते हैं कि- जो लोग समंदर के अंतस में होते हैं, हमने अक्सर देखा वो प्यासे होते हैं, वे राज न जानेगें हम हँसने वालों का, हँसने की मंजिल तक हम कितना रोते हैं।  
पुस्तक के दूसरे भाग में गीतिकाओं, मे माध्यम से उन्होने अंतर्मन की महीन संवेदनाओं को,मखमली एहसासों को पिरोने का काम भी किया है और खुद को पहचानने और खुद की सुनने सुनाने की चेष्टा को पाठको तक पहुँचाते हुए लिखते हैं कि- जिंदगी खिलखिला नहीं पाई,मुझको मुझसे मिला नहीं पाई, या फिर,बेजान जिस्म हैं इसे ना मोडिये हुजूर, टूटे हैं ख़्वाब और नहीं तोडि़ए हुजूर, चाहता हूँ कोई न जख़्म भरे अपना, चलो एक और नया दोस्त बनाया जाए। ऐसी बहुत सी रचनाएँ हैं जो वर्तमान समय में रिश्तों के मोल की तश्दीग करती नजर आएंगी।
कवित्त,छंदों में उन्होने, राजनीति,समाज, भारत पाकिस्तान मुद्दे, चुनाव, काश्मीर मुद्दों, राज काज, और भाषा भाषियों, पुरुस्कारों की राजनीतियों पर छंद रचे, और छंदो के माध्यम से व्यंग्य की तिर्यक दृष्टि को भी पाठको के सामने रखा है। उन्होने हिंदी भाषा के संदर्भ में आशान्वित होते हुए लिखा है कि - हिंद के निवासी हम, हिंदी भाषा भाषी हम, देश को ही भाषा में विश्वस्त होना चाहिए। मातृभाषा को उचित मान सम्मान मिले, ऐसा एक विधान अब प्रशस्त होना चाहिए, हिंदी राजभाषा नहीं राष्ट्र भाषा बन जाए, उसी दिन पंद्रह अगस्त होना चाहिए। इसके अलावा उन्होने आशावादी गीतों के माध्यम से पीढियों के रिक्त स्थान को भरने का प्रयास किया जिसमें, उनका गीत- दूर मत जाना मुसाफ़िर, लौटकर आना मुसाफिर, या फिर तुम युग पथ के उन्नायक हो, हे युवा तुम्हीं सब लायक हो, या फिर रूठे अनुबंध निभाने को, हारे भी जीत दिलाने को॥ गीतों में कविता के इस मुसाफिर की चिंता, दर्द, चिंतन, दर्शन, तिर्यक दृष्टि और अपने समय के सच के साथ न्याय संगत निर्णय पाठकों के सामने आता है।
इस कृति में नौ रस भी है, छंद विधान भी है, अलंकार, गेयता, भाषाई सरलता, विषय वस्तु के प्रति कवि की जागरुकता, अपने गौरवशाली इतिहास और धर्म ग्रंथों का अध्ययन भी है, फूहड़ संस्कृति को नकारने का साहस भी है। इस कृति की रचनाएँ, अविधा व्यंजना और लक्षणा तीनों प्रभावों से लबालब है। सत्तर पृष्ठ की इस पुस्तक को पढ़ने के बाद रविशंकर चतुवेदी जी का श्रोता और पाठक उनके लेखन के कई पहलुओं से रूबरू होगा, उनके कई वैचारिक भ्रम के किले टूटेगे और नए तटस्थ बिंब का निर्माण होगा। एक मुफ्त की गुजारिश उनसे यह भी होगी, रचनाओं के कैनवास को और बृहद करने की आवश्यकता अगली कृति में जरूर है। इसी बहाने कृतियों का आना उनकी रचनाओं के संकलन का माध्यम बनेगा, वही रचनाओं की पुनरावृत्ति कर मंच लूटने का जो भ्रम उनके मंचीय कविसाथी गणों का बना हुआ हुआ है, वह भी समय समय में भविश्य में टूटत रहेगा। इस प्रयास के लिए यदि वो साधोवाद के पात्र हैं तो दूसरी ओर वो इस उम्मीद के भी पात्र हैं कि उनकी कृतियाँ आगामी समय में भी पढ़ने को मिलती रहेंगीं। ताकी यह पता चलता रहे कि इस दौर का मुसाफ़िर वक़्त दर वक़्त किस नज़र से सबको देख रहा है।

अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          

Tuesday, 5 March 2019

चुभते चिकोटी काटते समसामायिक व्यंग्यों का संग्रह

चुभते चिकोटी काटते समसामायिक व्यंग्यों का संग्रह
पुस्तक समीक्षा
कृति- कुत्तों की खोज में भीड़ तंत्र (व्यंग्य संग्रह)
लेखक- रंदी सत्यनारायण राव,जमशेदपुर
प्रकाशक - समदर्शी प्रकाशन,हरियाणा

कुत्तों की खोज में भीड़तंत्र,व्यंग्य संग्रह में रंदी सत्यनारायण राव, जमशेदपुर ने चुनिंदा तीस व्यंग्य रचनाओं को संकलित किया है। इन व्यंग्यों की खासियत है कि इनमें विषय वस्तु हमारे आसपास के समाज से निकाली गई है। इन व्यंग्यों में पठनीयता की चासनी सराबोर है, इन व्यंग्यों के विषय वर्तमान संदर्भों से लिए गए हैं, जिन व्यंग्यों का संग्रह किया गया है उनमें से प्रमुख व्यंग्य खेत खाए संपादक मार खाए लेखक, अजगर का जंगल यूनियन, श्रद्धांजलि प्रतियोगिता, चरण स्पर्श का पावन सुख, कुत्तों की खोज में भीड़ तंत्र, संपादक होने का सुख,  साहित्य में चर्चित होने के नुस्खे़, साहित्य में खरपतवार, मौसम बलात्कार का, अपराध अपराधी और मै, मै जन्मजात संचालक हूँ आदि आदि, इन व्यंग्यों की खासियत यह है कि इन व्याप्त और व्यक्त घटना क्रम जो आम है उसे भी तिरछी नजर से देखा गया है। व्यंग्यकार का अनुभव भी इस काम में एक औजार का काम किया है। वो सामान्य घटनाओं में भी विशंगतियों को टेढ़ी नजर उसे उसी तरह देखने में माहिर है जैसे हंस चुनने का काम कर ही लेते हैं। इन व्यंग्यों की लंबाई इतनी ज्यादा नहीं है कि पाठक के गले में रचना हड्डी बनकर फंस जाए। देश की बदहाली, देश की जनता के दुख दर्द, समाजिक कुरूपता, और धार्मिक आड़बरों पर केंद्रित  अधिक्तर व्यंग्य समाज की विशंगतियों को पोस्टमार्टम करते हुए नजर आते हैं। लेखक ने इन रचनाओं को लिखते समय सिर्फ अपनी खाना पूर्ति ही बस नहीं कि बल्कि जिम्मेवारी के साथ पाठकों और रचना के साथ न्याय करने की कोशिश की है। इन व्यंग्यों में पीड़ा है वो पीड़ा जो चिकोटी काटती है, साहित्य समाज पर केंद्रित जितनी भी व्यंग्य रचनाएँ है वो तो ऐसा महसूस होता है कि हमारे साहित्य समाज को आइना दिखाने के उद्देश्य से लिखी गई हैं। रचना में बेबाकी के तेवर और छिद्रान्वेषण का गुण, साफगोई की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम करता है।
इन व्यंग्यों में चापलूसी, या किसी के प्रति आह्लाद के चलते पूरी तरह से अंधानुकरण नहीं दिखता,इन रचनाओं में प्रहार और मारक गुण पाठक को आनंद प्रदान करने के साथ, एक पल को सोचने के लिए मजबूर करता है। हमारे समाज में जितने भी जैसे भी लूप होल हैं उनकी पड़्ताल इन व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से की गई है। इन व्यंग्यों में वो विंशंगतियों के गुलाम नहीं हुए, वो लोकतंत्र,साहित्य समाज के उन सभी पहलुओं पर अपनी रचनाओं के माध्यम से कोड़े बरसाए हैं जिन पर सवाल उठने चाहिए जिन की वैचारिक चीड़फाड़ किया जाना चाहिए। जिनको नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इन विसंगतियों पर बात,चर्चा विमर्श होना चाहिए। इन विशंगतियों से अगर मन में कोफ्त हैं तो निश्चित ही ये टूटन हमारे समाज,देश,साहित्य के लिए लाभकर नहीं होगी। लेखक खुद इस बात को स्वीकार करता है कि "मैने भयानक बनकर कितने योग्य लोगों को इस विधा को अपनाने को प्रेरित किया या इस विधा में मै स्वयं कितना सफल हूँ? यह मेरी पुस्तक पढ़कर पता चलेगा,चूँकी सफेद -पोशों की दुनिया का एक मात्र चोर झूठा, बकलोल चोट्टा मक्कार आदि पता नहीं और कितने जानी अनजाई उपाधियों से विभूषित जो निहायत शरीफ,सदाचारिता में, नोबल पुरुस्कार विजेता खिलंदड़ गुरुओं से भरे इस शहर देश में निवास करता हूँ जिससे मुझे अकेला रहने, जीने का हौसला देते हैं,ताकि उनको चिकोटी काटता फिरूँ।"
एक साहित्यिक व्यंग्य रचना में लेखक लिखता हैकि  " वैसे यह जो हम प्रकाशित करते हैं साहित्यकारों के विशुद्ध विचार होतेहैं फिर भी विशुद्ध सोना भी बगैर मिलावट के आकार ग्रहण नहीं कर पाता।इसी कारण से अपनी और दूसरों की बुद्धि की मिलावट संपादन में अनिवार्य हो जाती हैं"। और ऐसे बहुत से संदर्भ हैं जो व्यंग्यकार की लेखनी की भाषा को पाठक के योग्य बनाती हैं। कुल मिका कर बात की जाए तो वर्तमान परिदृश्य में व्यंग्य जहाँ पूरी तरह से राजनैतिक माहौल पर केंद्रित हो चुके हैं उस दरमियां ये मुट्ठी भर रचनाएँ इस मामले में पाठक को आश्वस्त कराती हैं कि अभी भी व्यंग्य में सपाटबयानी,और मसखरी ने अपना हाथ नहीं मारा,अभी भी व्यंग्य  साहित्यिक बलात्कार से सुरक्षित है। रंदी साहब के कुछ व्यंग्यों में व्यंग्य, आलेख के साथ साथ लघु कथाओं के रूप में भी शामिल किया गया है। कुछ रचनाओं का कैनवास और बढ़ाने की आवश्यकता पाठक को महसूस होती है। व्यंग्य के साथ मुहावरों की जुगलबंदी भी संग्रह को और हास्यव्यंग्य रस से सराबोर बनाता है। वर्तमान विशंगतियों पर आधारित यह संग्रह आने वाले समय मे भी तरोताजा बना रहेगा। ऐसी उम्मीद की जा सकती है। व्यंग्य विधा में एक महत्वपूर्ण कृति को जोड़ने के लिए रंदी राव साहब साधोवाद के पात्र भी हैं। उनकी लेखनी से और भी  चुटीली व्यंग्य कृतियाँ पाठकों को पढ़ने को मिलेंगी ऐसी आशा की जा सकती है।
अनिल अयान,सतना