पुस्तक- दृष्टि एवं दिशा
लेखक- डॉ. भारतेंदु प्रकाश, छतरपुर
प्रकाशक- शब्द शिल्पी,सतना
समीक्षा-अनिल अयान
दृष्टि एवं दिशा काव्य संग्रह डॉ. भारतेंदु प्रकाश जी द्वारा रचित पैंसठ काव्य रचनाओं का संग्रह इस संग्रह में विगत पैसठ वर्षों की की गई रचनाओं से चयनित कविताएँ समाहित हैं जो विभिन्न भावभूमि की इंद्रधनुषीय रंगों को खुद में समेंटे हैं, इतना ही नहीं इन कविताओं का भाव पक्ष में नदी के बचाव, गाँव की हरियाली रक्षा, वनों की रक्षा, ग्राम स्वराज्य, लोक संस्कॄति संरक्षण, मंदिरों की संस्कॄति, किसान और कृषि उत्थान, सर्वोदय, हिंदी और भाषा उत्थान, रामराज्य कल और आज, देश की विशंगतियाँ, पशु-पक्षी-जीवधारी संरक्षण, गौ वंश संरक्षण, चुनाव चक्र और राजनीति लीला,और जीवन चर्या से जुड़े हुए गीत और नई कविताएँ समाहित हैं, लेखक गाहे बगाहे खुद के बचपन को याद करता है, कवि ने जीवन के गीतों से अपने भावों को उकेरने का प्रयास भी करता है। उम्र के सात आठ दशक पार करने के बाद कवि ने अपने अनुभवों को आपबीती से जगबीती के भावों को कविताओं में उकेरने में सफलता प्राप्त की है। लेखक ने मन के भावों को तो कविता मे उकेरा ही है किंतु ग्रामीण परिवेष, ग्राम विकास, किसानी की समस्याओं,को प्राथमिकता से उकेरा है, कवि लिखते हैं "शिक्षा जो देते गाँवों में, खेती से दूर भगाती है, कौशल विकास के नाम यहाँ शहरों का मार्ग दिखाती है।संगठित किसानों को करके सहयोगी बन संताप हरॆं, आओ किसान की बात करें।" कवि सर्वोदय के बारे में लिखते हैं सर्वोदय का भाव जगाकर सहयोगी समाज को गढ़ने/सत्य अहिंसा प्रेम समन्वित सद्विकास की राह दिखाए। कवि ने उस परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया है जिसको आज की कविता में छोड़ दिया गया है।
कवि ने समय की नजाकत को समझते हुए आज के भारत की स्थिति पर कलम चलाते हुए विशंगतियों पर पैबंद लगाते हुए कहते हैं कि - शिक्षालय दुकान बन गये, नगरीय विकास बना, जंगल नदी पहाड़ भूमि पर छाया संकट लाख गुना। लेखक ने खुद के गीतों को परिभाषित करते हुए लिखा कि गीत मेरे हो गये निरुपाय, नये युग के नवविधा की क्लान्ति से आच्छन्न, नित नूतन ज्योति से समपन्न। इस तरह कितनी ही बानगियाँ हैं जिसमें कवि मन की पीड़ा, आक्रोश, कसक और पीड़ा से उपजता स्व उपाय कविताओं का केंद्र बना है।कविताओ की भाषा शैली सामान्य हिंदी है, कहीं कहीं पर गूढ़ तत्सम शब्दों का प्रयोग भी कवि ने किया है। कवि की कई कविताएँ मानववाद, और प्रयोगवादी हैं, कई कविताओं में छायावाद के गुण भी परिलक्षित होते हैं, इन कविताओं में छंदबद्धता, गेयता और लयबद्धता है, कहीं कहीं पर दोहा शैली का प्रयोग किया गया है। विज्ञान और प्रकृति संरक्षण के आंदोलनों के बीच इन कविताओं ने शोधकर्ता की भूमिका को कविकर्म की भूमिका में बदलते हुए खुद को जीवंतता प्राप्त की है। ये कविताएँ एक तरफ प्राकृतिक विध्वंशता की पीड़ा को बखान करती हैं वहीं दूसरी ओर मन, वातावरण, समाज और देश की सास्कृतिक संरक्षण की पाठकों से याचना भी करती हैं, ये कविताएँ आशा रूपी उर्जा का संचार करने में तीव्र हैं। ये कविताएँ जनमानस के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक राह को सुनिश्चित करती हैं। यदि कतिपय रचनाओं के प्रसून चिंतन की सुवासित महक को जन जन तक पहुँचाने का जिम्मा ले रहे हैं तो निश्चित ही बागवान इन भावों से धनाड्य होगा इसी आशा के साथ पुस्तक की सफलता हेतु शुभाकांक्षी हैं।
अनिल अयान, सतना
संपर्क-९४७९४११४०७
भारतेंदु प्रकाश, छतरपुर
संपर्क-९४५२५०८२५१
लेखक- डॉ. भारतेंदु प्रकाश, छतरपुर
प्रकाशक- शब्द शिल्पी,सतना
समीक्षा-अनिल अयान
दृष्टि एवं दिशा काव्य संग्रह डॉ. भारतेंदु प्रकाश जी द्वारा रचित पैंसठ काव्य रचनाओं का संग्रह इस संग्रह में विगत पैसठ वर्षों की की गई रचनाओं से चयनित कविताएँ समाहित हैं जो विभिन्न भावभूमि की इंद्रधनुषीय रंगों को खुद में समेंटे हैं, इतना ही नहीं इन कविताओं का भाव पक्ष में नदी के बचाव, गाँव की हरियाली रक्षा, वनों की रक्षा, ग्राम स्वराज्य, लोक संस्कॄति संरक्षण, मंदिरों की संस्कॄति, किसान और कृषि उत्थान, सर्वोदय, हिंदी और भाषा उत्थान, रामराज्य कल और आज, देश की विशंगतियाँ, पशु-पक्षी-जीवधारी संरक्षण, गौ वंश संरक्षण, चुनाव चक्र और राजनीति लीला,और जीवन चर्या से जुड़े हुए गीत और नई कविताएँ समाहित हैं, लेखक गाहे बगाहे खुद के बचपन को याद करता है, कवि ने जीवन के गीतों से अपने भावों को उकेरने का प्रयास भी करता है। उम्र के सात आठ दशक पार करने के बाद कवि ने अपने अनुभवों को आपबीती से जगबीती के भावों को कविताओं में उकेरने में सफलता प्राप्त की है। लेखक ने मन के भावों को तो कविता मे उकेरा ही है किंतु ग्रामीण परिवेष, ग्राम विकास, किसानी की समस्याओं,को प्राथमिकता से उकेरा है, कवि लिखते हैं "शिक्षा जो देते गाँवों में, खेती से दूर भगाती है, कौशल विकास के नाम यहाँ शहरों का मार्ग दिखाती है।संगठित किसानों को करके सहयोगी बन संताप हरॆं, आओ किसान की बात करें।" कवि सर्वोदय के बारे में लिखते हैं सर्वोदय का भाव जगाकर सहयोगी समाज को गढ़ने/सत्य अहिंसा प्रेम समन्वित सद्विकास की राह दिखाए। कवि ने उस परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया है जिसको आज की कविता में छोड़ दिया गया है।
कवि ने समय की नजाकत को समझते हुए आज के भारत की स्थिति पर कलम चलाते हुए विशंगतियों पर पैबंद लगाते हुए कहते हैं कि - शिक्षालय दुकान बन गये, नगरीय विकास बना, जंगल नदी पहाड़ भूमि पर छाया संकट लाख गुना। लेखक ने खुद के गीतों को परिभाषित करते हुए लिखा कि गीत मेरे हो गये निरुपाय, नये युग के नवविधा की क्लान्ति से आच्छन्न, नित नूतन ज्योति से समपन्न। इस तरह कितनी ही बानगियाँ हैं जिसमें कवि मन की पीड़ा, आक्रोश, कसक और पीड़ा से उपजता स्व उपाय कविताओं का केंद्र बना है।कविताओ की भाषा शैली सामान्य हिंदी है, कहीं कहीं पर गूढ़ तत्सम शब्दों का प्रयोग भी कवि ने किया है। कवि की कई कविताएँ मानववाद, और प्रयोगवादी हैं, कई कविताओं में छायावाद के गुण भी परिलक्षित होते हैं, इन कविताओं में छंदबद्धता, गेयता और लयबद्धता है, कहीं कहीं पर दोहा शैली का प्रयोग किया गया है। विज्ञान और प्रकृति संरक्षण के आंदोलनों के बीच इन कविताओं ने शोधकर्ता की भूमिका को कविकर्म की भूमिका में बदलते हुए खुद को जीवंतता प्राप्त की है। ये कविताएँ एक तरफ प्राकृतिक विध्वंशता की पीड़ा को बखान करती हैं वहीं दूसरी ओर मन, वातावरण, समाज और देश की सास्कृतिक संरक्षण की पाठकों से याचना भी करती हैं, ये कविताएँ आशा रूपी उर्जा का संचार करने में तीव्र हैं। ये कविताएँ जनमानस के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक राह को सुनिश्चित करती हैं। यदि कतिपय रचनाओं के प्रसून चिंतन की सुवासित महक को जन जन तक पहुँचाने का जिम्मा ले रहे हैं तो निश्चित ही बागवान इन भावों से धनाड्य होगा इसी आशा के साथ पुस्तक की सफलता हेतु शुभाकांक्षी हैं।
अनिल अयान, सतना
संपर्क-९४७९४११४०७
भारतेंदु प्रकाश, छतरपुर
संपर्क-९४५२५०८२५१