Friday, 24 April 2020

मोहब्बत निभाने वाली वैश्याओं की जिंद़गी का लेखा जोखा - कोठा नं-64


मोहब्बत निभाने वाली वैश्याओं की जिंद़गी का लेखा जोखा - कोठा नं-64

फेसबुक में जब राकेश शंकर भारती जी की कोठा नं-64 और उससे विभिन्न पहलुओं को उजागर करने वाले आलेखों को प्रस्तुत करती पुस्तक का जिक्र हुआ, तब लगा कि इस कहानी संग्रह को पढ़ना चाहिए, और मैने भी कमेंट में अपना मेल आई.डी. भेज दिया ताकि इस कहानी संग्रह का पीडीएफ मुझे राकेश भाई भेज सकें, सहृदय राकेश जी ने पीडीएफ फाइल मेल किया, और पीडीएफ को कागज में प्रिंट निकालकर मैने तल्लीनता से पढ़ा, मेरे दिमाग में अमृतलाल नागर जी का उपन्यास कोठेवालियाँ पूरी तरह से उभर कर सामने आ गया।
       पुस्तक को खोलते ही यह तो समझ में आ गया कि पुस्तक पूरी तरह से नई दिल्ली के जे.बी.रोड़ के इर्द गिर्द घूमती है, और घूमती ही नहीं बल्कि काल गर्ल्स, वैश्याओं की जिंदगी के
इंद्रधनुषीय रंगों को बयां करने वाली इन 14 कहानियों का संग्रह है। आमुख में अमन प्रकाशन के ऋषभ बाजपेयी जी का एक पैरा लिखा मिला, कहानीकार की तरफ से दो शब्द पढ़कर मन आस्वस्त हुआ कि कहानियों की पृष्ठभूमि कैसी होगी, कोठे की रंगीन मिजाजी के बीच में पलती बढ़ती वैश्याएँ, उनका जीवन, उनकी मजबूरियाँ, उनके आदर्श, उनके साथ दलालों और कोठे की बाई का व्यवहार, विभिन्न उम्र की वैश्याओं के रहने के लिए बिल्डिंग की मंजिलों का बंटवारा, और वो सब कुछ ये कहानियाँ बयाँ करेंगी, जो पाठक पढ़ना चाहता था, उपन्यास पढ़ने के बाद कहानियों से गुजरने का यह पहला वाकया था कि जिसमें जिस्मफरोशी, जिस्मफरोशों,और उनके इर्द गिर्द रहने वाले लोगों की कहानी का वर्णन मिलेगा।
      कहानियों की बात करें तो दल्ला, दुश्मन, मै कॉल गर्ल हूँ, तुम फिर कभी नहीं आना, मैने चूडियाँ फोड़ दी, रिक्शा वाला सैंया, चोंट, नत्थी टूट गई थी, ज़िंदगी का हसीन इत्तेफाक है, एहसास की लकीरें, सोनगाछी की याद में, वह चला गया, प्रेमनगर से कहीं दूर, और कोठा नं-64। कहानियाँ संग्रहित हैं।
यदि एकएक करके कहानियों और उसके वैश्या या कालगर्ल पात्रों के जीवन की बात की जाये तो दल्ला कहानी में जयकिशन दलाल है जो कोठा नं-64 की एक वैश्या से ललिता से बेइंतिहाँ मोहब्बत कर बैठता है और कहानी में वो जलील भी होता और पुलिस की मार भी खाता है, ललिता उसकी बेइंतिहाँ मोहब्बत को स्वीकार करके मछली बेंचने का काम शुरू कर देती है,
 दूसरी कहानी दुश्मन में अनिर्वान दादा अपने शादीशुदा जीवन से ऊबकर जे.एन.यू में पीएचडी करते हैं और अपनी कालगर्ल मित्र विनीता के साथ जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं दोनों की अपनी अपनी जिंदगी की मजबूरियाँ होती हैं लिविंग रिलेशन में रह रही विनीता अर्निवान दादा के साथ उनकी मौत के समय तक साथनिभाती हैं, जबके उनके जूनियर राकेश भर ही उनकी अंतिम यात्रा के साथी रह जाते हैं, बाकी सभी दोस्त उनको छोड़कर चले जाते हैं।
काल गर्ल कहानी में लतिका वैश्या का जिक्र है कैसे उसे दलविंदर अपने साथ दिल्ली ले आता है, और बाद में ओम सिंह के साथ वो संबंध बना लेती है जिसे वो अपना सच्चा प्रेमी समझती है, लेकिन उसे पता चलता है कि इस जीवन में दोनों ने उसके साथ बेवफाई की और उसको जिस्मफरोशी के लिए मजबूर करते हैं। वो किसी को स्वीकार नहीं करती बल्कि समाज में अपने एक ग्राहक की बीमारी में उसकी मदद करती है।
तुम फिर कभी आ जाना कहानी माधुरी और सईद के प्रेम के परवान में धोका खाने के बाद वैश्या बनने की कहानी है इस कहानी में माधुरी को समझ में आता है कि कैसे शादी शुदा सईद उसकी जिंदगी को नर्क बनाकर उसे तवायफ बना देता है और वो कोठे में बैठने के लिए मजबूर हो जाती है।
मैने चूडियाँ तोड़ दी कहानी सविता तवायफ और सोमवीर नाम के ग्राहक के प्रेम की अमिट कहानी है, वो उसके साथ राते गुजारने के साथ साथ प्रेम में बंध जाता है, वो उसे चूडियाँ देता है, जीवन के अंतिम समय में वो उसे मोबाइल तक तोफे में देता है, एक दिन सविता जब उसकी मौत की खबर सुनती हैं तो उसकी दी हुई चूडियाँ तोड़ देती है, जैसे वो विधवा हो गई हो।
रिक्शावाला सैंया- मधुलता नाम के वैश्या और राकेश नाम के रिक्शेवाले के बीच की प्रेम कथा की दास्ताँ हैं जिसमें राकेश अपनी जबरजस्ती शादी की वजह से दिल्ली में दुखन के मिलकर इस रोड़ में रिक्शा चलाता है और मधुलता से प्रेम कर बैठता है, बाद में वो उसके प्रेम को अपने जीवन के साथी के रूप में स्वीकार लेता है।
चोंट-यह आंद्रेया जो हब्सी आफ्रीकी लड़की कालगर्ल हैं उसके जिंदगी की कहानी है, जो दो दोस्तों मृणाल और राजीव के साथ मिलती है, वो राजीव के साथ लिव इन में रहने लगती हैं, बाद में पता चलता है कि राजीव उसे सिर्फ अपने इंन्ज्वाय के लिए उपयोग कर रहा है, वो उसके साथ शादी नहीं करेगा, और उसके दिल को इससे काफी चोंट पहुंचती है, वो उसे धक्के मारकर बाहर निकाल देती है।
नत्थी टूट गई- यह वैश्या भंवरी और जयवीर नाम के ग्राहक की कहानी है, ढ़लती जवानी वाली भंवरी की बेटी शीला जवान हो गई है, वो अपने पिता जयवीर के बारे में पूछती है, एक दिन उसके पिता सेठ जी बनकर शीला के साथ रात गुजारने आते हैं पूरी रात गुजारने  के बाद जैसे ही सुबह भंवरी जयवीर को देखती है उसके होश उड़ जाते हैं क्योंकि जाने अनजाने वो अपनी बेटी को अपने ही पिता के साथ संबंध बनाने को मजबूर कर दिया होता है।
जिंदगी एक हसीन इत्तेफाक कहानी रेशमा की है जो आगरा के साधुओं, मौलवियों, और पुलिस से परेशान होकर दिल्ली आ जाती है, वो अपने कमर में आई लव यू राजन का टेटू बनवाती है जो उसका पहला प्रेम होता है, किंतु किसी को नहीं पता होता कि वो एक दिन इसी टेटू की वजह से सेठ राजन अथवा आर के सेठ से इस धंधे में मुलाकात हो जाएगी।
एहसास की लकीरें-यह कहानी सबनम की है जो आमेंर के चक्कर में फंसकर पहले तो कोठे में बैठ जाती है, फिर नकली शराब बेंचने की वजह से जेल हो जाती है, आमेंर उसके साथ रहकर अमीर हो जाता है, संगमरमर के व्यवसायी के साथ उसे संबंध बनाने के लिए होटल ले जाता है, शबनम एक बच्चे की माँ होते हुए भी इस काम में इस उम्मीद से उतरती है कि उसकी खूबसूरती को ग्राहक मिल जाएगा, पर वो व्यवसायी उसे मना कर देता है, तब उसे ठेस पहुँचती है, वो उस व्यवसायी और आमेर को गालियाँ देकर भगा देती है।
सोनागाछी की याद कहानी- सोनल नाम के वैश्या की जिंदगी की कहानी है जो सोनागाछी से दिल्ली आ जाती है, उसका एक ग्राहक प्रोफेशर उसका दोस्त बन जाता है इसमें उसके साथ उसके पति के द्वारा धंधा कराने, निर्भया कांड और उसके आरोपी बस ड्राइवर की मौत का जिक्र आया है,
वह चला गया कहानी- सिवानी नाम की लड़की का दिल्ली में रवीना नाम की काल गर्ल के रूप में बनने की कहानी है, वो बचपन में ही रणदीप से प्रेम और शादी करना चाहती थी, किंतु दहेज की वजह से वो बर्बाद हो जाती है, वही रणदीप अपने जीवन से संतुष्ट न होने पर एक रात अपने दोस्त नरेंद्र के साथ अपने पूर्व मंगेतर सिवानी अथवा रवीना के साथ रात गुजारता है, सुबह जब रवीना को नशा उतरता है तो वह रणदीप से पैसे लेने के बजाय जलील करके दो हजार की नोट उसके मुंह में मारकर उसे भगा देती है,
प्रेमनगर से कहीं दूर- रंभा नामक गृहणी के वैश्या बनने और इन्नोवा कार ड्राइवर कुंवारे महिपाल के प्रेम की कथा है, रंभा से उसके सास ससुर और पति धंधा करवाता है, महिपाल से उसकी मुलाकात ग्राहक के रूप में होती है, महिपाल और उसका प्रेम परवान चढ़ता चला जाता है, और एक दिन वो अपनी बेटी और महिपाल के साथ एक नया जीवन की खोज में प्रेम नगर से दूर निकल जाती है।
कोठा नं-64 बूढ़ी हो चुकी वैश्या पार्वती की ढ़लती उम्र और कोठे में उसके संघर्ष की कहानी हैं, उसकी मनोदशाओं को व्यक्त करती हुई कहानी है, उसके साथ कम उम्र की जवान सलमा,शीतल, कृष्णा, जैसी वैश्याएँ उसे काफी ढांढ़स बढ़ाती हैं, किंतु वो अंत में अपना समान लेकर वापिस जाने के लिए रेल्वे स्टेशन चली जाती है।
      इन चौदह कहानियों की पृष्ठभूमि देखें तो समझ में आता है, कोई भी लड़की या औरत अपने आप इस धंधे में नहीं आती, किसी ना किसी अनजान, पहचान, नात रिश्तेदार के प्रेमजाल में फंसकर इस धंधे में पहुँचती है, ललिता, विनीता, मधुलता, आंद्रेया, रेशमा, सोनल पार्वती जैसी वैश्याओं के किरदार इस जीवन में भी ग्राहकों में प्रेम को महसूस करती हैं, उनके साथ जीवन व्यतीत करने का सपना भी संजोती हैं, उनके साथ ग्राहकों के जैसे व्यवहार नहीं करतीं, लेकिन इनमें से कुछ पात्र तो इस दलदल से बाहर निकलकर दिल्ली को छोड़कर अपना परिवार बसालेती हैं, कुछ को समाज स्वीकार कर लेता है, और कुछ को समाज की अस्वीकृति बर्दास्त नहीं हो पाती। यह भी हमारे समाज की विशंगतियाँ ही हैं जो पुरुष प्रधान समाज उसे वैश्या बनने पर मजबूर करता है वही उसे अस्वीकार भी कर देता है।
      इन कहानियों में सविता, आंद्रेया, भंवरी और शीला, शिवाली अथवा रवीना जैसे ऐसे भी पात्र हैं जो इस दलदल में जिन लोगों की वजह से भेज दिये गए, या स्वीकार करना पड़ा उनके साथ अपनी उम्मीदों और अरमानों का गला घोंट कर खुद को या अपने बेटी को भी रात गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ता है, किंतु वो भी एक दिल रखती हैं जाने अनजाने इस सबके बावजूद वो इन प्यासे जानवरों से नफरत करके अपने से कोसों दूर कर देती हैं। क्यॊकिं धंधे में वो ग्राहक के रूप में इन पापियों और उनकी जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले अपराधियों को भी स्वीकार नहीं कर पाती हैं। मजबूरी, जरूरत, दुख, या अकेले पन को दूर करने वाली इन महिलाओं और लड़कियों को अंत तक यह उम्मीद करती हैं कि काश कोई भगवान ग्राहक के रूप  में आयेगा और उसे इस दलदल से निकालकर अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करेगा।
      इन कहानियों में देश की पुलिस, नेताओं, व्यवसाइयों, मास्टरों, जे.एन.यू और अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के छात्रों, प्रोफेसरों, मल्टीनेशनल कंपनी के अधिकारियों और समाज के अन्य वर्ग जैसे  दलाल में वैश्याओं के पति, बच्चे, समाज के ससुर,पति, आटोवाले, रिक्शे वाले, राह चलते कोई भी मर्द जो जिस्म की प्यास नहीं पाये या पाकर भी अपनापन नहीं पा सके वो सब इस कोठे के ग्राहक हैं, उनकी अपने अपनी चयनित वैश्याएं हैं, वो जिस्म की प्यास बुझाने बस नहीं आते बल्कि अपने दुख दर्द को बांटने भी आते हैं, जैसे उन्हें एक सुकून की आश मिलती है, ये वैश्याएं भी पढ़ी लिखी होती हैं, वो राम कृष्ण गांधी, काली माता आदि के बारे में बहुत कुछ जानती हैं, वो इनकी पूजा भी करती हैं, इसमें किसी वैश्या का धर्म नहीं होता, एक ही कोठे में हिंदू मुस्लिम वैश्याएँ रहती हैं। एक ही थाली में खाना खाती हैं, ग्राहक को भी खिलाती हैं। सर्व धर्म संभाव की भावना को कोठे में स्थापित करती हैं। यदि ये वैश्याएँ ना हों तो लोग तो अपने हर सगे संबंधियों की स्त्रियों को एक जिस्म के रूप में देखे।
      इन कहानियों की भाषा सरल सीधी हिंदी है, बीच बीच में उर्दू के लफ़्जों का प्रयोग किया गया है। दिल्ली की महानगरीय जुबान का पात्रों ने उपयोग किया है, कुछ कहानियों में लेखक ने खुद को कहानी का पात्र बना लिया है, आत्मकेंद्रित कहानियों के रूप में इन कहानियों को देख सकते हैं। इन कहानियों में अधिक्तर कहानियों में वैश्याएँ या काल गर्ल्स अपना परिवार बसा लेती हैं, किंतु कुछ कहानियों में ये स्त्रियाँ उसी दलदल में रहने को मजबूर होती है। इन स्त्रियों में एक सच्चा प्रेमी बसता है। यह बात कई कहानियों में पुष्टि हुई है। कथाकार ने पहले ही इन वैश्याओं को बेबस बहन के रूप में संबोधित करते हुए संबोधित किया है, इसलिए इन कहानियों की भाषा महानगरीयता होते हुए भी अश्लीलता की पराकाष्ठा को नहीं पार करती है। इन कहानियों में पहाड़ी इलाकों, हिमालय, हब्सी, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और हिमाचल,पंजाब, बंगाल, और दक्षिण भारत के राज्यो की भी झलक मिलती है।
      अंतत कहने को बहुत कुछ है पर वैश्याओं के जीवन को देखने का अवसर इन कहानियों में नजदीक से मिला, जो मुझे पढ़ने के बाद महसूस हुआ वो मैने इस रिव्यू में लिखा, मुझे ऐसा महसूस होता है कि इस संग्रह की दो तिहाई कहानियाँ कोठा नंबर चौसठ की हैं, कुछ अन्य कोठों जैसे काश्मीरी कोठे, या आगरा के आसपास की हैं, कुछ कहानियाँ छोटे शहरों के कोठों से निकल कर इस कोठे तक पहुँचती हैं,  कुछ कहानियाँ कालगर्ल की जिंदगी पर आधारित है, मुझे लगता है कि इन कहानियों में से इस कोठे पर आधारित वैश्याओं की जिंदगी संकलित की जाती तो पूरा एक उपन्यास बन सकता था, जिसमें ये कहानियाँ उपन्यास के विभिन्न वैश्याओं की जिंदगी को उजागर करती संबंधित कहानियाँ बन सकती थी। वो पूरी तरह इस शीर्षक को चरितार्थ करता। यदि मै बात करूँ तो इस में सबसे मार्मिक कहानी प्रेम नगर से कहीं दूर, सबसे सार्थक सुख देने वाली कहानियों में दल्ला, रिक्शा वाल सैंया और , जिंदगी एक हसीन इत्तिफाक, पहली कहानी और अन्य कुछ कहानियों में लगा कि कहानी अपना विस्तार लेने के पहले ही समय से पहले खत्म हो गई, या कर दी गई, कुछ कहानियों को और विस्तार से जानने की इच्छा मन में अधूरी रह गई, इस संग्रह को पढ़ने के बाद लेखक की और भी कृतियों को पढ़ने की इच्छा जाग जाती हैं मन में, बहरहाल इस विषय पर लिखे गए कहानी संग्रह के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएँ राकेश शंकर भारती जी को, वो आने वाले भविष्य में कुछ नये संग्रह हम सभी तक पहुँचाएँगें।

अनिल श्रीवास्तव "अयान"
सतना, मध्यप्रदेश,भारत,
संपर्क-9479411407
मेल-ayaananil@gmail.com