Wednesday, 5 June 2024

पुस्तक समीक्षासंघर्ष,पीडा,वेदना और संत्रास का कुरुक्षेत्र है:- अग्नि पथ पर

 परअग्नि पथ पर काव्य संग्रह श्री रामनारायण सिंह राना द्वारा रचित नवीनतमकाव्य संग्रह है जिसमे लगभग ७० कवितायें छः खंडों में संग्रहितहै ,इनकविताओं में गीत,नवगीत,लंबी कवितायें,और काव्य नाटक की सुगंध भी देखने कोमिलती है.इस कविता संग्रह को पढने में राना जी के द्वारा रचितपूर्वकविता संग्रहों में संचित उनके हर उम्र की कविताओं का इंद्रधनुष भी देखनेको मिलता है.उनकी हर कृति को मैने पढा और गूढ अध्ययन किया है.उनका जीवनआम शिक्षक का जीवन रहा है. मै यदिसतना से विगत कई वर्षों सेसाहित्यकारों के लिये शब्द शिल्पी पत्रिका का संपादन कर रहा हूँ तो उसमेंमैने राना जी के रचना समग्र और बतकहीं में अंतर्मन को छुआ भी है. उनसेलगभग हर साहित्यिक गोष्ठियों में मुलाकात भी होती है और साहित्य समाज कीचर्चायें भी किया करता हूँ,दर्द की बाँसुरी,युद्ध के विरुद्ध,जनवाणीसीता,अंगूठा एकलव्य का,और ना जाने कितनी संपादित कृतियाँ,बुद्ध ,भरहुतस्तूप गाथा,आदि का मैने मन भर अध्ययन किया है. एक बहुत ही अमीर परिवारमें जन्मे राना जी का संबंध राजनीति में समाजवाद से भी रहा,भले ही यहसंबंध उनके भाई साहब रामानंद सिंह की वजह से रहा हो.यह मायने नहीं रखताहै.दर्द की बाँसुरी काव्य संग्रह से लेकर आज मेरे सामने आयी पुस्तक अग्निपथ पर को देखें तो उनके रचना कर्म और रचना शक्ति में बदलाव महसूस होताहै.और यह कहने में कोई परहेज नहीं है कि इस पुस्तक के हर खंड में पाठक कोहर रस का स्वाद महसूस होगा जो उनके प्रारंभिक काल से वर्तमान काल तक कीरचनाधर्मिता में आई परिपक्वता को प्रभावी रूप से परिलक्षित करती है. इसपुस्तक में देश के नामवर रचनाकारों और समीक्षकों ने अपनेविचार दियेहै.जिसमें डा धर्मकीर्ति,डा चौथीराम यादव,डा जयप्रकाश कर्दम,और हनुमंतकिशोर शर्मा.सभी विद्वानों का अपना अपना दृष्टिकोण है जो कवि की सिनाक्तअपने अनुसार करता है,इससे हटकर मै कुछ नयी बात करने का प्रयास कररहाहूँ.ताकि उपर्युक्त विद्वानों की बातें पुनरावृति ना हो.अपने शहर मेंमैने यह महसूस किया है कि सतना ही नहीं वरन राना जी के रचनाकर्मअन्यसाहित्यकार अपनी स्वीकृति सहज रूप से नहीं देते है क्योंकि वो दलित चेतनाऔर सर्वहारा वर्ग की बात करते है.ईश्वरवाद की अंधविश्वासपन कोखत्म करनेकी बात करते है.सर्वहारा वर्ग,मजदूर,दबे कुचले समुदाय की बात करते है.जोसाहित्य जगत को बेमानी सा महसूस होता है.बौद्ध धर्म स्वीकार करने केपश्चात उनकी रचनाधर्मिता को साहित्यिक संगठनों ने नेपथ्य में पहुँचादिया.और इसी चेतना को अपनी ध्वजामानकर जन समुदाय में राना जी अपनीरचनाओं के माध्यम से ध्वज वाहक की तरह आँगे बढ रहें है.भावपक्ष:-अब आते है इस कृति पे,अग्निपथ पर  काव्य संग्रह के प्रथम खंड में १३कवितायें है जो विकास और चेतना की बात करती है.जिसमें अग्नि पथपर,क्रांति स्वर,संघर्श भरा मेरा परिचय,और कृष्ण महाप्रयाण जैसी अद्भुतकविताये है, खंड दो में सिर्फ ६ कवितायें है जो मातृसत्ता के प्रभाव कोवर्णित करती है. इसमें उद्धत यशोधरा के प्रति,आम्रपाली,सत्याग्रहीसीता,जैसी कविताये इस खंड की विशेष कवितायें है. खंड तीन प्रेम और आह्लादकी कविताओं का संग्रह है.प्रेम, से यह खंड प्रारंभ होकर उर्वशी औरद्रोपदी मे जाकर समाप्त हो जाता है. खंड चार में १२ कवितायें संग्रहित हैजिसमें पर्यावरण,प्रकृति, किसान,खेती बारी,ग्राम जीवन आदि पर केंद्रितकवितायें है.खंड पांच में ११ कवितायें है जिसमें आम जन सर्वहारावर्ग,दलित चेतना और वाम और द्क्षिण पंथ की विवशताओं और विशंगतियों परकेंद्रित कवितायें हैं. और अंतिम छठवें खंड में १४ कवितायें है जिसमेंसमाजवाद,विश्व चिंतन,दलितचेतना,और समसामायिक परिदृश्य की कवितायें है.पूरे संग्रह की बात करें तो भावपक्ष की दृष्टि से लगभग हर विषय बिंदुओंको छुआ है जिसमें आम सर्वहारा वर्ग की वेदना से दलित संचेतना और राष्ट्रविश्व शांति की बात कही गई है. कविताओं में कुछ पौराणिक चरित्रों कोउद्घाटित करने वाली कवितायें औरकाव्य नाटक से स्त्री विमर्श की भी सुगंधआती है.भाव पक्ष में गांधी,मार्टिन लूथर किंग,बाबा साहब,शहीदे आजम,श्रमिकआंदोलन,मजदूर दिवस,आदि विशेष अवसरों पर लिखी गयी कविताओं का भी संग्रह हैजो कहीं ना कहीं विशेष अभिरुचि को भी पाठकों के सामने रखता है.कलापक्ष:-इस कृति मे पारंपरिक गीतों और उनकी गेयता का भी मनोहारी चित्रण है.काव्यशिल्प की दृष्टि से संगीतबद्ध किये जाने वाले गीत भी इस कृति मेंउपस्थिति दर्ज करा रहें है. नई कविता का पुरजोर प्रभाव कवि की लेखनी नेदिखाया है.पढते पढते ऐसा महसूस हुआ कि जब कवि पारंपरिक गीतों केतारतम्यता को निरंतरता देने मेंअसमर्थ रहा और अपने विचारों को इसमेंबांध नहीं पाया तो उन्होंने मुक्त छंद का साथ लेकर अपने मनो भावों कोपाठकों के सामने रखा.इसमें बहुत से देशज शब्दों का भी प्रयोग देखने कोमिलता है विशेष रूप से पाली भाषाऔर बघेली बोली के शब्द भी प्रयोगकियेगये है जो नवीनता लिये हुये और संबंधित अर्थ पाठ्क के ज्ञान वृद्धि कोबढाते है.इसमें दक्षिणा और द्रौपदी जैसे काव्य नाटक की विधा भी पाठक केसामने आयी है जो विंध्य क्षेत्र मेंबहुत कम देखने को मिली है. दलित औरसर्वहारा वर्ग की वेदना का बखान करने के द्वंद में राना जी ने शब्दावलीका चयन जिस प्रकार किया है वह कहीं ना कहीं कविता के मर्म की मांग होसकती है परन्तु मुझे ऐसा महसूस हुआ कि इस प्रकार की शब्दावली जोआमजन मेंअधिक्तर उपयोग की जाती है और जुबान पर है ,उसे बखान करने से अन्य खंडोंका प्रभाव कुछ कम सा लगने लगता है संतुलित और साम्य भाषा से भी कवि अपनेविचार रख सकते थे.इस पूरे संग्रह में राना जी का रचना कर्म कितना अपने साहित्य धर्म कानिर्वहन किया है,इसका पूरा प्रमाण उनकी कविताएँ प्रस्तुत करती है.यहसंग्रह उनके प्रशंसकों के लिये आह्लाद का मार्ग और उनके निंदकों के लियेपीडा का मार्ग प्रसस्त करेगा. उनका रचना कर्म किस स्तर से प्रारंभ होताहै और आज किस वैचारिक पृष्ठभूमि में खडा हुआ है उसका सजीव उदाहरणहै उनकायह संग्रह अग्निपथ पर . शीर्षक की सार्थकता यही है कि अधिक्तम कवितायेंसर्वहारावर्ग, दलित वर्ग,आम जन,स्त्रियों के जीवन के संघर्ष को प्रदर्शितकरती है जिसका हर पल एक अग्नि पथ में सफर कर रहे पैरों के अंतस मेंउत्पन्न हुई पीडा के ताप को अनुभव करता है.इस जीवन के अग्नि पथ में इंशानको किस तरह चलना चाहिये इसकी प्रस्तावना ही यह पुस्तक का केंद्रीय मूलहै.इस हेतु राना जी साधोवाद और बधाई के पात्र हैं.अग्नि पथ पर चल रहे, कदमों का एक सम्मान है यह.कवि के द्वारा उनके लिये, अर्पितलेखनी से मान है यह.संघर्ष,पीडा,वेदना,संत्रास का, कुरुक्षेत्र बनता है यहाँ,अन्याय अत्याचार से ,अंतर्मन में उठा एक गान है यह.अनिल अयान श्रीवास्तव,सतना संपादक शब्द शिल्पी,सतना९४०६७८१०४०.--

Friday, 24 April 2020

मोहब्बत निभाने वाली वैश्याओं की जिंद़गी का लेखा जोखा - कोठा नं-64


मोहब्बत निभाने वाली वैश्याओं की जिंद़गी का लेखा जोखा - कोठा नं-64

फेसबुक में जब राकेश शंकर भारती जी की कोठा नं-64 और उससे विभिन्न पहलुओं को उजागर करने वाले आलेखों को प्रस्तुत करती पुस्तक का जिक्र हुआ, तब लगा कि इस कहानी संग्रह को पढ़ना चाहिए, और मैने भी कमेंट में अपना मेल आई.डी. भेज दिया ताकि इस कहानी संग्रह का पीडीएफ मुझे राकेश भाई भेज सकें, सहृदय राकेश जी ने पीडीएफ फाइल मेल किया, और पीडीएफ को कागज में प्रिंट निकालकर मैने तल्लीनता से पढ़ा, मेरे दिमाग में अमृतलाल नागर जी का उपन्यास कोठेवालियाँ पूरी तरह से उभर कर सामने आ गया।
       पुस्तक को खोलते ही यह तो समझ में आ गया कि पुस्तक पूरी तरह से नई दिल्ली के जे.बी.रोड़ के इर्द गिर्द घूमती है, और घूमती ही नहीं बल्कि काल गर्ल्स, वैश्याओं की जिंदगी के
इंद्रधनुषीय रंगों को बयां करने वाली इन 14 कहानियों का संग्रह है। आमुख में अमन प्रकाशन के ऋषभ बाजपेयी जी का एक पैरा लिखा मिला, कहानीकार की तरफ से दो शब्द पढ़कर मन आस्वस्त हुआ कि कहानियों की पृष्ठभूमि कैसी होगी, कोठे की रंगीन मिजाजी के बीच में पलती बढ़ती वैश्याएँ, उनका जीवन, उनकी मजबूरियाँ, उनके आदर्श, उनके साथ दलालों और कोठे की बाई का व्यवहार, विभिन्न उम्र की वैश्याओं के रहने के लिए बिल्डिंग की मंजिलों का बंटवारा, और वो सब कुछ ये कहानियाँ बयाँ करेंगी, जो पाठक पढ़ना चाहता था, उपन्यास पढ़ने के बाद कहानियों से गुजरने का यह पहला वाकया था कि जिसमें जिस्मफरोशी, जिस्मफरोशों,और उनके इर्द गिर्द रहने वाले लोगों की कहानी का वर्णन मिलेगा।
      कहानियों की बात करें तो दल्ला, दुश्मन, मै कॉल गर्ल हूँ, तुम फिर कभी नहीं आना, मैने चूडियाँ फोड़ दी, रिक्शा वाला सैंया, चोंट, नत्थी टूट गई थी, ज़िंदगी का हसीन इत्तेफाक है, एहसास की लकीरें, सोनगाछी की याद में, वह चला गया, प्रेमनगर से कहीं दूर, और कोठा नं-64। कहानियाँ संग्रहित हैं।
यदि एकएक करके कहानियों और उसके वैश्या या कालगर्ल पात्रों के जीवन की बात की जाये तो दल्ला कहानी में जयकिशन दलाल है जो कोठा नं-64 की एक वैश्या से ललिता से बेइंतिहाँ मोहब्बत कर बैठता है और कहानी में वो जलील भी होता और पुलिस की मार भी खाता है, ललिता उसकी बेइंतिहाँ मोहब्बत को स्वीकार करके मछली बेंचने का काम शुरू कर देती है,
 दूसरी कहानी दुश्मन में अनिर्वान दादा अपने शादीशुदा जीवन से ऊबकर जे.एन.यू में पीएचडी करते हैं और अपनी कालगर्ल मित्र विनीता के साथ जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं दोनों की अपनी अपनी जिंदगी की मजबूरियाँ होती हैं लिविंग रिलेशन में रह रही विनीता अर्निवान दादा के साथ उनकी मौत के समय तक साथनिभाती हैं, जबके उनके जूनियर राकेश भर ही उनकी अंतिम यात्रा के साथी रह जाते हैं, बाकी सभी दोस्त उनको छोड़कर चले जाते हैं।
काल गर्ल कहानी में लतिका वैश्या का जिक्र है कैसे उसे दलविंदर अपने साथ दिल्ली ले आता है, और बाद में ओम सिंह के साथ वो संबंध बना लेती है जिसे वो अपना सच्चा प्रेमी समझती है, लेकिन उसे पता चलता है कि इस जीवन में दोनों ने उसके साथ बेवफाई की और उसको जिस्मफरोशी के लिए मजबूर करते हैं। वो किसी को स्वीकार नहीं करती बल्कि समाज में अपने एक ग्राहक की बीमारी में उसकी मदद करती है।
तुम फिर कभी आ जाना कहानी माधुरी और सईद के प्रेम के परवान में धोका खाने के बाद वैश्या बनने की कहानी है इस कहानी में माधुरी को समझ में आता है कि कैसे शादी शुदा सईद उसकी जिंदगी को नर्क बनाकर उसे तवायफ बना देता है और वो कोठे में बैठने के लिए मजबूर हो जाती है।
मैने चूडियाँ तोड़ दी कहानी सविता तवायफ और सोमवीर नाम के ग्राहक के प्रेम की अमिट कहानी है, वो उसके साथ राते गुजारने के साथ साथ प्रेम में बंध जाता है, वो उसे चूडियाँ देता है, जीवन के अंतिम समय में वो उसे मोबाइल तक तोफे में देता है, एक दिन सविता जब उसकी मौत की खबर सुनती हैं तो उसकी दी हुई चूडियाँ तोड़ देती है, जैसे वो विधवा हो गई हो।
रिक्शावाला सैंया- मधुलता नाम के वैश्या और राकेश नाम के रिक्शेवाले के बीच की प्रेम कथा की दास्ताँ हैं जिसमें राकेश अपनी जबरजस्ती शादी की वजह से दिल्ली में दुखन के मिलकर इस रोड़ में रिक्शा चलाता है और मधुलता से प्रेम कर बैठता है, बाद में वो उसके प्रेम को अपने जीवन के साथी के रूप में स्वीकार लेता है।
चोंट-यह आंद्रेया जो हब्सी आफ्रीकी लड़की कालगर्ल हैं उसके जिंदगी की कहानी है, जो दो दोस्तों मृणाल और राजीव के साथ मिलती है, वो राजीव के साथ लिव इन में रहने लगती हैं, बाद में पता चलता है कि राजीव उसे सिर्फ अपने इंन्ज्वाय के लिए उपयोग कर रहा है, वो उसके साथ शादी नहीं करेगा, और उसके दिल को इससे काफी चोंट पहुंचती है, वो उसे धक्के मारकर बाहर निकाल देती है।
नत्थी टूट गई- यह वैश्या भंवरी और जयवीर नाम के ग्राहक की कहानी है, ढ़लती जवानी वाली भंवरी की बेटी शीला जवान हो गई है, वो अपने पिता जयवीर के बारे में पूछती है, एक दिन उसके पिता सेठ जी बनकर शीला के साथ रात गुजारने आते हैं पूरी रात गुजारने  के बाद जैसे ही सुबह भंवरी जयवीर को देखती है उसके होश उड़ जाते हैं क्योंकि जाने अनजाने वो अपनी बेटी को अपने ही पिता के साथ संबंध बनाने को मजबूर कर दिया होता है।
जिंदगी एक हसीन इत्तेफाक कहानी रेशमा की है जो आगरा के साधुओं, मौलवियों, और पुलिस से परेशान होकर दिल्ली आ जाती है, वो अपने कमर में आई लव यू राजन का टेटू बनवाती है जो उसका पहला प्रेम होता है, किंतु किसी को नहीं पता होता कि वो एक दिन इसी टेटू की वजह से सेठ राजन अथवा आर के सेठ से इस धंधे में मुलाकात हो जाएगी।
एहसास की लकीरें-यह कहानी सबनम की है जो आमेंर के चक्कर में फंसकर पहले तो कोठे में बैठ जाती है, फिर नकली शराब बेंचने की वजह से जेल हो जाती है, आमेंर उसके साथ रहकर अमीर हो जाता है, संगमरमर के व्यवसायी के साथ उसे संबंध बनाने के लिए होटल ले जाता है, शबनम एक बच्चे की माँ होते हुए भी इस काम में इस उम्मीद से उतरती है कि उसकी खूबसूरती को ग्राहक मिल जाएगा, पर वो व्यवसायी उसे मना कर देता है, तब उसे ठेस पहुँचती है, वो उस व्यवसायी और आमेर को गालियाँ देकर भगा देती है।
सोनागाछी की याद कहानी- सोनल नाम के वैश्या की जिंदगी की कहानी है जो सोनागाछी से दिल्ली आ जाती है, उसका एक ग्राहक प्रोफेशर उसका दोस्त बन जाता है इसमें उसके साथ उसके पति के द्वारा धंधा कराने, निर्भया कांड और उसके आरोपी बस ड्राइवर की मौत का जिक्र आया है,
वह चला गया कहानी- सिवानी नाम की लड़की का दिल्ली में रवीना नाम की काल गर्ल के रूप में बनने की कहानी है, वो बचपन में ही रणदीप से प्रेम और शादी करना चाहती थी, किंतु दहेज की वजह से वो बर्बाद हो जाती है, वही रणदीप अपने जीवन से संतुष्ट न होने पर एक रात अपने दोस्त नरेंद्र के साथ अपने पूर्व मंगेतर सिवानी अथवा रवीना के साथ रात गुजारता है, सुबह जब रवीना को नशा उतरता है तो वह रणदीप से पैसे लेने के बजाय जलील करके दो हजार की नोट उसके मुंह में मारकर उसे भगा देती है,
प्रेमनगर से कहीं दूर- रंभा नामक गृहणी के वैश्या बनने और इन्नोवा कार ड्राइवर कुंवारे महिपाल के प्रेम की कथा है, रंभा से उसके सास ससुर और पति धंधा करवाता है, महिपाल से उसकी मुलाकात ग्राहक के रूप में होती है, महिपाल और उसका प्रेम परवान चढ़ता चला जाता है, और एक दिन वो अपनी बेटी और महिपाल के साथ एक नया जीवन की खोज में प्रेम नगर से दूर निकल जाती है।
कोठा नं-64 बूढ़ी हो चुकी वैश्या पार्वती की ढ़लती उम्र और कोठे में उसके संघर्ष की कहानी हैं, उसकी मनोदशाओं को व्यक्त करती हुई कहानी है, उसके साथ कम उम्र की जवान सलमा,शीतल, कृष्णा, जैसी वैश्याएँ उसे काफी ढांढ़स बढ़ाती हैं, किंतु वो अंत में अपना समान लेकर वापिस जाने के लिए रेल्वे स्टेशन चली जाती है।
      इन चौदह कहानियों की पृष्ठभूमि देखें तो समझ में आता है, कोई भी लड़की या औरत अपने आप इस धंधे में नहीं आती, किसी ना किसी अनजान, पहचान, नात रिश्तेदार के प्रेमजाल में फंसकर इस धंधे में पहुँचती है, ललिता, विनीता, मधुलता, आंद्रेया, रेशमा, सोनल पार्वती जैसी वैश्याओं के किरदार इस जीवन में भी ग्राहकों में प्रेम को महसूस करती हैं, उनके साथ जीवन व्यतीत करने का सपना भी संजोती हैं, उनके साथ ग्राहकों के जैसे व्यवहार नहीं करतीं, लेकिन इनमें से कुछ पात्र तो इस दलदल से बाहर निकलकर दिल्ली को छोड़कर अपना परिवार बसालेती हैं, कुछ को समाज स्वीकार कर लेता है, और कुछ को समाज की अस्वीकृति बर्दास्त नहीं हो पाती। यह भी हमारे समाज की विशंगतियाँ ही हैं जो पुरुष प्रधान समाज उसे वैश्या बनने पर मजबूर करता है वही उसे अस्वीकार भी कर देता है।
      इन कहानियों में सविता, आंद्रेया, भंवरी और शीला, शिवाली अथवा रवीना जैसे ऐसे भी पात्र हैं जो इस दलदल में जिन लोगों की वजह से भेज दिये गए, या स्वीकार करना पड़ा उनके साथ अपनी उम्मीदों और अरमानों का गला घोंट कर खुद को या अपने बेटी को भी रात गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ता है, किंतु वो भी एक दिल रखती हैं जाने अनजाने इस सबके बावजूद वो इन प्यासे जानवरों से नफरत करके अपने से कोसों दूर कर देती हैं। क्यॊकिं धंधे में वो ग्राहक के रूप में इन पापियों और उनकी जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले अपराधियों को भी स्वीकार नहीं कर पाती हैं। मजबूरी, जरूरत, दुख, या अकेले पन को दूर करने वाली इन महिलाओं और लड़कियों को अंत तक यह उम्मीद करती हैं कि काश कोई भगवान ग्राहक के रूप  में आयेगा और उसे इस दलदल से निकालकर अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करेगा।
      इन कहानियों में देश की पुलिस, नेताओं, व्यवसाइयों, मास्टरों, जे.एन.यू और अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के छात्रों, प्रोफेसरों, मल्टीनेशनल कंपनी के अधिकारियों और समाज के अन्य वर्ग जैसे  दलाल में वैश्याओं के पति, बच्चे, समाज के ससुर,पति, आटोवाले, रिक्शे वाले, राह चलते कोई भी मर्द जो जिस्म की प्यास नहीं पाये या पाकर भी अपनापन नहीं पा सके वो सब इस कोठे के ग्राहक हैं, उनकी अपने अपनी चयनित वैश्याएं हैं, वो जिस्म की प्यास बुझाने बस नहीं आते बल्कि अपने दुख दर्द को बांटने भी आते हैं, जैसे उन्हें एक सुकून की आश मिलती है, ये वैश्याएं भी पढ़ी लिखी होती हैं, वो राम कृष्ण गांधी, काली माता आदि के बारे में बहुत कुछ जानती हैं, वो इनकी पूजा भी करती हैं, इसमें किसी वैश्या का धर्म नहीं होता, एक ही कोठे में हिंदू मुस्लिम वैश्याएँ रहती हैं। एक ही थाली में खाना खाती हैं, ग्राहक को भी खिलाती हैं। सर्व धर्म संभाव की भावना को कोठे में स्थापित करती हैं। यदि ये वैश्याएँ ना हों तो लोग तो अपने हर सगे संबंधियों की स्त्रियों को एक जिस्म के रूप में देखे।
      इन कहानियों की भाषा सरल सीधी हिंदी है, बीच बीच में उर्दू के लफ़्जों का प्रयोग किया गया है। दिल्ली की महानगरीय जुबान का पात्रों ने उपयोग किया है, कुछ कहानियों में लेखक ने खुद को कहानी का पात्र बना लिया है, आत्मकेंद्रित कहानियों के रूप में इन कहानियों को देख सकते हैं। इन कहानियों में अधिक्तर कहानियों में वैश्याएँ या काल गर्ल्स अपना परिवार बसा लेती हैं, किंतु कुछ कहानियों में ये स्त्रियाँ उसी दलदल में रहने को मजबूर होती है। इन स्त्रियों में एक सच्चा प्रेमी बसता है। यह बात कई कहानियों में पुष्टि हुई है। कथाकार ने पहले ही इन वैश्याओं को बेबस बहन के रूप में संबोधित करते हुए संबोधित किया है, इसलिए इन कहानियों की भाषा महानगरीयता होते हुए भी अश्लीलता की पराकाष्ठा को नहीं पार करती है। इन कहानियों में पहाड़ी इलाकों, हिमालय, हब्सी, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और हिमाचल,पंजाब, बंगाल, और दक्षिण भारत के राज्यो की भी झलक मिलती है।
      अंतत कहने को बहुत कुछ है पर वैश्याओं के जीवन को देखने का अवसर इन कहानियों में नजदीक से मिला, जो मुझे पढ़ने के बाद महसूस हुआ वो मैने इस रिव्यू में लिखा, मुझे ऐसा महसूस होता है कि इस संग्रह की दो तिहाई कहानियाँ कोठा नंबर चौसठ की हैं, कुछ अन्य कोठों जैसे काश्मीरी कोठे, या आगरा के आसपास की हैं, कुछ कहानियाँ छोटे शहरों के कोठों से निकल कर इस कोठे तक पहुँचती हैं,  कुछ कहानियाँ कालगर्ल की जिंदगी पर आधारित है, मुझे लगता है कि इन कहानियों में से इस कोठे पर आधारित वैश्याओं की जिंदगी संकलित की जाती तो पूरा एक उपन्यास बन सकता था, जिसमें ये कहानियाँ उपन्यास के विभिन्न वैश्याओं की जिंदगी को उजागर करती संबंधित कहानियाँ बन सकती थी। वो पूरी तरह इस शीर्षक को चरितार्थ करता। यदि मै बात करूँ तो इस में सबसे मार्मिक कहानी प्रेम नगर से कहीं दूर, सबसे सार्थक सुख देने वाली कहानियों में दल्ला, रिक्शा वाल सैंया और , जिंदगी एक हसीन इत्तिफाक, पहली कहानी और अन्य कुछ कहानियों में लगा कि कहानी अपना विस्तार लेने के पहले ही समय से पहले खत्म हो गई, या कर दी गई, कुछ कहानियों को और विस्तार से जानने की इच्छा मन में अधूरी रह गई, इस संग्रह को पढ़ने के बाद लेखक की और भी कृतियों को पढ़ने की इच्छा जाग जाती हैं मन में, बहरहाल इस विषय पर लिखे गए कहानी संग्रह के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएँ राकेश शंकर भारती जी को, वो आने वाले भविष्य में कुछ नये संग्रह हम सभी तक पहुँचाएँगें।

अनिल श्रीवास्तव "अयान"
सतना, मध्यप्रदेश,भारत,
संपर्क-9479411407
मेल-ayaananil@gmail.com



Sunday, 16 February 2020

जनमानस के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक राह को सुनिश्चित करती कविताएँ

पुस्तक- दृष्टि एवं दिशा
लेखक- डॉ. भारतेंदु प्रकाश, छतरपुर
प्रकाशक- शब्द शिल्पी,सतना
समीक्षा-अनिल अयान

दृष्टि एवं दिशा काव्य संग्रह डॉ. भारतेंदु प्रकाश जी द्वारा रचित पैंसठ काव्य रचनाओं का संग्रह इस संग्रह में विगत पैसठ वर्षों की की गई रचनाओं से चयनित कविताएँ समाहित हैं जो विभिन्न भावभूमि की इंद्रधनुषीय रंगों को खुद में समेंटे हैं, इतना ही नहीं इन कविताओं का भाव पक्ष में नदी के बचाव, गाँव की हरियाली रक्षा, वनों की रक्षा, ग्राम स्वराज्य, लोक संस्कॄति संरक्षण, मंदिरों की संस्कॄति, किसान और कृषि उत्थान, सर्वोदय, हिंदी और भाषा उत्थान, रामराज्य कल और आज, देश की विशंगतियाँ, पशु-पक्षी-जीवधारी संरक्षण,  गौ वंश संरक्षण, चुनाव चक्र और राजनीति लीला,और जीवन चर्या से जुड़े हुए गीत और नई कविताएँ समाहित हैं, लेखक गाहे बगाहे खुद के बचपन को याद करता है, कवि ने जीवन के गीतों से अपने भावों को उकेरने का प्रयास भी करता है। उम्र के सात आठ दशक पार करने के बाद कवि ने अपने अनुभवों को आपबीती से जगबीती के भावों को कविताओं में उकेरने में सफलता प्राप्त की है। लेखक ने मन के भावों को तो कविता मे उकेरा ही है किंतु ग्रामीण परिवेष, ग्राम विकास, किसानी की समस्याओं,को प्राथमिकता से उकेरा है, कवि लिखते हैं "शिक्षा जो देते गाँवों में, खेती से दूर भगाती है, कौशल विकास के नाम यहाँ शहरों का मार्ग दिखाती है।संगठित किसानों को करके सहयोगी बन संताप हरॆं, आओ किसान की बात करें।" कवि सर्वोदय के बारे में लिखते हैं सर्वोदय का भाव जगाकर सहयोगी समाज को गढ़ने/सत्य अहिंसा प्रेम समन्वित सद्विकास की राह दिखाए। कवि ने उस परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया है जिसको आज की कविता में छोड़ दिया गया है।
कवि ने समय की नजाकत को समझते हुए आज के भारत की स्थिति पर कलम चलाते हुए विशंगतियों पर पैबंद लगाते हुए कहते हैं कि - शिक्षालय दुकान बन गये, नगरीय विकास बना, जंगल नदी पहाड़ भूमि पर छाया संकट लाख गुना। लेखक ने खुद के गीतों को परिभाषित करते हुए लिखा कि गीत मेरे हो गये निरुपाय, नये युग के नवविधा की क्लान्ति से आच्छन्न, नित नूतन ज्योति से समपन्न। इस तरह कितनी ही बानगियाँ हैं जिसमें कवि मन की पीड़ा, आक्रोश, कसक और पीड़ा से उपजता स्व उपाय कविताओं का केंद्र बना है।कविताओ की भाषा शैली सामान्य हिंदी है, कहीं कहीं पर गूढ़ तत्सम शब्दों का प्रयोग भी कवि ने किया है। कवि की कई कविताएँ मानववाद, और प्रयोगवादी हैं, कई कविताओं में छायावाद के गुण भी परिलक्षित होते हैं, इन कविताओं में छंदबद्धता, गेयता और लयबद्धता है, कहीं कहीं पर दोहा शैली का प्रयोग किया गया है। विज्ञान और प्रकृति संरक्षण के आंदोलनों के बीच इन कविताओं ने शोधकर्ता की भूमिका को कविकर्म की भूमिका में बदलते हुए खुद को जीवंतता प्राप्त की है। ये कविताएँ एक तरफ प्राकृतिक विध्वंशता की पीड़ा को बखान करती हैं वहीं दूसरी ओर मन, वातावरण, समाज और देश की सास्कृतिक संरक्षण की पाठकों से याचना भी करती हैं, ये कविताएँ आशा रूपी उर्जा का संचार करने में तीव्र हैं। ये कविताएँ जनमानस के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक राह को सुनिश्चित करती हैं। यदि कतिपय रचनाओं के प्रसून चिंतन की सुवासित महक को जन जन तक पहुँचाने का जिम्मा ले रहे हैं तो निश्चित ही बागवान इन भावों से धनाड्य होगा इसी आशा के साथ पुस्तक की सफलता हेतु शुभाकांक्षी हैं।
अनिल अयान, सतना
संपर्क-९४७९४११४०७
भारतेंदु प्रकाश, छतरपुर
संपर्क-९४५२५०८२५१

Wednesday, 19 June 2019

मानवीय-संबंधों में प्रेम - अपनत्व तलाशती कहानियों का संग्रह स्वेटर

मानवीय-संबंधों में प्रेम - अपनत्व तलाशती कहानियों का संग्रह स्वेटर
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक- स्वेटर (कहानी संग्रह)
लेखक- अशोक जमनानी, होशंगाबाद
प्रकाशक- संदर्भ प्रकाशन, भोपाल
समीक्षक- अनिल अयान,सतना

अशोक जमनानी का यह संग्रह पहली बार मेरी नजर के सामने हैं, पूरे मध्य प्रदेश के लिए अशोक जमनानी उपन्यासों और कहानियों के लिए जाना पहचाना नाम है, यह कहानी संग्रह अपने अंदर पंद्रह कहानियों को समेटे हुए है। ये सभी कहानी हमारे समाज और परिवार और याराना के बीच घटने वाली कहानियां हैं। इन कहानियों में आपको हर उम्र के पात्र उपस्थित मिलेंगें, इन कहानियों में प्रमुखतः स्वेटर, चोर, सुंदर, परकम्मा वासनी, लफ्फाज, टिकिट, रंग, उल्टी चप्पलें, झुर्रियाँ, अलग, अलमारी, लाल चीटियाँ, ग्लोबल वार्मिंग, ज़मीन, और कुंभ दादी प्रमुख कहानियाँ हैं। इन कहानियों की बात की जाए तो स्वेटर युवा मन की कहानी
जिसे स्वेटर की वजह से प्रेमी के रूप में बदनाम कर दिया जाता है, चोर गली मुहल्लों में चोरियों की घटनाओं पर आधारित कहानी है, सुंदर बुजुर्ग महिला बुआ जी के जीवन की विसंगतियों की कहानी है, परकम्मा वासिनी, एक बेबस बुजुर्ग महिला की अपने पारिवारिक दाम्पत्य दुख को त्यागकर नर्मदा परिक्रमा में लीन होने और अनुभवों की कहानी है। लफ्फाज हरफनमौला बन्ने मियाँ के जीवन पर आधारित कहानी है, वहीं टिकिट एक युवा कामगार गोकुल की परहित सरिस धर्म नहीं भाई सूक्ति को साकार करती कहानी है, रंग पति पत्नी के अंतरंग मनोभावों को छूने वाली कहानी है, उल्टी चप्पलें पिता और पुत्री के अगाध प्रेम को प्रदर्शित करती कहानी हि, झुर्रियाँ ग्रामीण परिवेश की एक बेबस महिला और उसके अनछुए असफल प्रेम की कहानी है। अलग स्त्री और पुरुष के बीच अनायास उपजे प्रेम की कहानी है जिसमें दोनों अपनी अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से अकेलेपन के शिकार होते हैं। अलमारी नव विवाहित जोड़े के शहरी जगदोजहद और आपसी वैचारिक भिन्नता को समेटे हुए घटनाक्रमों की कहानी है। लाल चीटियाँ महिला प्रताड़्ना पर आधारित कहानी है जिसमें प्रमुख पात्र समाज और परिवार से क्षुब्ध होकर पलायन कर जाती है। ग्लोबल वार्मिंग ग्रामीण परिवेश की कहानी हैं जिसमें पूजा और कर्मकांड करने वाले पुरोहित गरीब लोगों को कैसे परेशान करते हैं यह दिखाया गया है। ज़मीन स्त्रीपुरुष के बीच अनन्य प्रेम की पराकाष्ठा और घनिष्ठत को दर्शाती कहानी है, अंतिम कहानी कुंभ दादी  एक  बुजुर्ग महिला के जीवन की कहानी है जिसका अंतिम समय कुंभ नहाने की मनोकामना के साथ पूर्ण होता है।
इन सभी कहानियों में जीवन के विभिन्न रिश्ते, समाज के विभिन्न पहलुओं को देखने और समझने का अवसर मिलता है। इसमें अधिक्तर कहानियों में मानव मन के बीच में उपजे प्रेम को अपने शब्दपाश से कहानी कार ने कहानीपन के द्वारा संवारा है, ग्रामीण परिवेश की कहानियाँ ग्रामीण जनजीवन और संबंधों की महत्ता को उजागर करता है, ये कहानियाँ कोई प्रोफेशनल कहानियों की तरह चटख पटक वाली नहीं हैं, इनमें शहरी मक्कारियाँ और फरेब कम दिखेगा, इन कहानियों में सकारत्मक उर्जा का समावेश कथाकार पात्रों के माध्यम से करता है, इन कहानियों में पात्र पलायन नहीं करते बल्कि साहस दिखाते है, इन कहानियों का देशकाल और वातावरण पाठक को बांधे रखते हैं, संवादों की सहजता पाठक को मंत्रमुग्ध करती है। कुछ कहानियों में स्त्री पात्रों की स्थिति उनकी समाजिक परिस्थियों का आईना बन जाती हैं। कहानियों की भाषा और बुनावट पाठक को उबाऊपन से दूर करती है। कहानी सरलता लिए होने की वजह से पाठक कहानी के कथ्य और कथाकार के उद्देश्य को समझने में सफल होता है। इस संग्रह में मेरे अनुसार उल्टी चप्पलें सर्वश्रेष्ठ कहानी और लफ्फाज किस्सागोई और बुनावट के हिसाब से कुछ कमतर कहानी लगी। हर कहानीकार के लिए सभी कहानी प्रिय होती हैं। इस संग्रह की कहानियाँ पाठकों को कुछ पल के लिए अपने आसपास झांकने के लिए विवश करती हैं, तथा प्रेम और अपनत्व के कितने रूप हो सकते हैं यह समझाने में सफल होती हैं। यहीं सही मायनों में इस संग्रह की पाठकीय सफलता है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

Monday, 17 June 2019

बचपन की सैर कराती बाल कवित़ाओ का संग्रह

बचपन की सैर कराती बाल कवित़ाओ का संग्रह

कृति-अम्मा जरा बताओ, बाल कविताएँ
लेखक- डॉ हरीश निगम, सतना
प्रकाशक- जेटीएस पब्लिकेशन, नईदिल्ली
समीक्षा -अनिल अयान, सतना।

पूरे देश मे जहां बाल साहित्यिक कृतियों का अकाल सा है उस दरमियां डा हरीश निगम की स्मृति शेष अंक का यह संग्रह भीषण गर्मी मे वादियों की ठंडक देने वाला है। सतना मे बाल कविताओं मे थोडा बहुत काम डॉ वेद प्रकाश सिंह प्रकाश जी ने भी किया, हरीश निगम जी की बाल कविताएं जो नवभारत टाइम्स मे नियमित प्रकाशित होती रहीं उनको सहेजने का काम मरणोपरांत उनके परिवारजनों ने इस पुस्तक के रूप मे किया यह बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध होगा। इस संग्रह मे बचपन की हर उस अंगडाई को हरीश निगम जी ने कविता के बंधों मे माला की तरह पिरोया है जिसे हम सामान्यतः नजरंदाज कर देते है।उनके जीवित रहते भी उनके कई बालकविताओं का संग्रह आये हैं। किंतु यह इसलिए भी सर्वश्रेष्ठ है क्योकि यह उनकी अनुपस्थिति मे आया है और उनकी उपस्थिति की महक देता रहेगा।
इस संग्रह मे अर्धशतकीय बाल गीत हैं जो विभिन्न विषयों जैसे अम्मा की बातचीत, चंदामामा, सडकें, पंछी, सर्दी, जाडे का मौसम, दीवाली, सूरज, शिशुगीत, पानी, सुबह, वर्षा, चूहा चुहिया मंहगाई, छुट्टियां, गर्मी, दादा जी, बंदर मामा, नया साल, होली विषयों को समेटा गया है।
सभी गीत बाल मन की जिज्ञासाओं से उपजे हैं। कई सवाल और उनके सवाल देते ये गीत सरल, सहज और गेयता लिए हुए हैं, इन पर बच्चे अभिनय भी कर सकते है प्री प्राइमरी और प्राइमरी कक्षाओं के लिए बच्चों के जुबां मे जल्दी ही आ जाने वाले ये गीत सतना की माटी और सतना के लाल हरीश निगम की लेखनी और भावों की सुगंध बिखेरते हुए पाठक को मंत्र मुग्ध करते है,  पुस्तक के शीर्षक के गीत का बंध देखे-।।नानी इतनी ढेर कहानी, और कुए जी इतना पानी, रोज कहां से पाते हैं, अम्मा जरा बताओ तो।। या फिर ।।आई आई गर्मी आई, पूंछ दबाए भगी रजाई, ठंडा पानी लगे मिठाई, लू मैडम ने डांट लगाई।। इन गीतों मे छंद बद्धता भी है, गेयता भी है, मन का संगीत भी है, लेखक के कलम की जादुई सम्मोहित करने वाली कल्पना भी है। इस पुस्तक को पढते हुए इस बात का क्षोभ जरूर होता है कि हरीश सर की ये कृतियां ही हमारी साथी है। वो अगर होते तो और ज्यादा बाल रचनाएं हमें पढने को मिलती, किंतु उनका यह संकलन बच्चो और बूढों दोनों को बचपन की सैर कराने मे सफल सिद्ध होता है। 

अनिल अयान, सतना