Monday, 26 October 2015

सतना के आम आदमी की महागाथाः मेरी बस्ती मेरे लोग

सतना के आम आदमी की महागाथाः मेरी बस्ती मेरे लोग

मुझे लगता है कि हमेशा से इतिहास जिन लोगों की उपेक्षा करता रहा है उनकी चिंता साहित्य ने की है और इसी चिंता ने कई महागाथाओं को जन्म दिया है।हर एक शहर का अपना एक इतिहास होता है। कभी इतिहास इतिहास कारों के द्वारा लिखा जाता है और कभी इतिहास से आम आदमी की कहानी उभर कर आती है जिसे उपेक्षित कर दिया गया। सतना की धरती की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। सतना  नगर राजा रानियों के धतकरमों के कारण नहीं उत्पन्न हुआ है। इस नगर को आबाद करने में यहाँ के यहाँ के पुरुखों के अलावा गली, चैराहों, सडकों, गलियों, इमारतों, बाजार, दुकानदारों, दलालों, रंडियों, हिजडों, के अलावा मेहनतकश का बहुत अहम योगदान रहा है।
मेरी बस्ती मेरे लोग सतना नगर की बहुत पुरानी कहानी बनकर सन २००२ में उभरी। इसके पूर्व सतना के लिये शिवानंद जी ने सतना नगर नाम का दस्तावेज छोडा जो आज के समय में विलुप्त प्राय सा हो गया है। मेरी बस्ती मेरे लोग का द्वितीय संस्करण विगत जनवरी २०१५ को इसके लेखक चिंतामणि मिश्र द्वारा दोबारा पाढकों के लिये तैयार किया गया। सतना के बारे में और अधिक खुलासे, रहस्यों का उद्घाटन और नई जानकारियों के साथ यह ऐतिहासिक महागाथा तीन सौ पृष्ठों से भी अधिक की बन पडी।इसके नवीन संस्करण में चिंतामणि जी ने कुछ नये अध्याय जोडा और नये पहलुओं को पाठकों के सामने लाया है। प्रथम संस्करण में तीस से भी कब अध्याय थे और इस संस्करण मे तेतिस अध्याय पाठकों से रूबरू होते है। जिसमें यह हादसों का शहर है, डेढ सौ साल का सतना,अनाथ बस्ती के गुमनाम लोग,चले गये वो लोग नवीन और उपयोगी अध्याय समाहित किये गये हैं। इस पुस्तक में पुराने अध्यायों को पुनः नवीनीकॄत किया गया है जिसका महत्व आज के समय पर और अधिक बढ गया है। जिसमें बस्ती का नामांकरण,सतना की यादगार इमारतें,मुहल्ले और चैराहे, सतना की गलियाँ, रेल्वे स्टेशन,बस स्टैंड, सतना की धर्मशालायें,नगर निगम,पूजा स्थल, धर्म कर्म,सतना की होली,सतना की दीपावली,माहुलिया,सतना का दशहरा, सतना का गरबा,बाजार और दुकानें,रहन सहन, राजनीति और नेता,चिकित्सा सुविधा,पुलिस व्यवस्था, खेल,जुआँ और सट्टा,सतना के अखबार और पत्रकार,साहित्य और साहित्यकार, संगीत और नाटक, रंडियाँ और हिजडे,राजस्व और न्याय,आदि प्रमुख अध्याय हैं। नये अध्यायों को जोडने के पीछे लेखक का उद्देश्य सतना के बारे में वो बातें जो आज की आपाधापी में गुम सी हो जाती हैं,उनको लोगों के सामने लाना है।
चिंतामणि मिश्र सतना के मूल लेखक के रूप में इस धरती में स्थापित हुये आजादी के पहले से उनके पूर्वज इस नगरी में आये और यहीं के होकर रह गये। मेरी बस्ती मेरे लोग २००२ से २०१५ के बीच कई आपाधापियों और उतार चढावों की यात्रा तक कर द्वितीय संस्करण तक पहुँची और आज पाठकों के सामने सतना के कल आज और कल को प्रस्तुत कर रही है। लेखक ने इस बात को खुद स्वीकारा है कि इस संस्करण को तैयार करने मे उन्हें पहले संस्करण से ज्यादा मेहनत और खोजी प्रवृति को उपयोग करना पडा। लेखक ने अपनी बस्ती के स्वाधीनता संग्राम के बारे में भी बहुत कुछ खोजा और उसे एक कृति सतना जिले का १८५७ के रूप में पाढकों के सामने सन २०११ में प्रस्तुत किया। मेरी बस्ती मेरे लोग का द्वितीय संस्करण सतना के गये गुजरे इतिहास की जीती जागती तस्वीर प्रस्तुत करता है। लेखक एक बागवान की तरह होता है जो अपने द्वारा लगाये पौधों को अपने हाथों के पालन पोषण करता है। मेरी बस्ती मेरे लोग और चिंतामणि मिश्र के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। अपने लेखन को नवीनीकृत करके दोबारा चेतन्न बनाकर पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का साहित्यिक करम सफलतापूर्वक उन्होने किया है। चले गये वो लोग इस पुस्तक का वह अध्याय है जिसमें लेखक ने इस नगर के उन अनाम लोगों के बारे में लिखकर उन्हें दस्तावेज बना दिया, जो इस नगर के अस्तित्व की लडाई के लिये खत्म हो गये और इस नगर को उनका हमेशा शुक्रगुजार होना चाहिये। सतना नगर के हर व्यक्ति को इस पुस्तक को पुनः पढकर इस लेखन को समझना और सम्मानित करना चाहिये। क्योंकि यह पुस्तक साहित्यिक कृति होने के साथ साथ सतना की ऐतिहासिक पुस्तक बन पडी है। मेरे द्वारा लिखा गया यह पाठकनामा कोई पुस्तक समीक्षा नहीं वरन इस महागाथा को पढने के बाद उपजी मन की जिज्ञासा और पुनर्विचार हैं। एक जीवंत महागाथा को पुस्तक के रूप में सहेजने के लिये श्री चिंतामणि मिश्र साधोवाद के पात्र हैं।

अनिल अयान, सतना
‘संपादक’, शब्द शिल्पी पत्रिका, सतना
संपर्क रू ९४७९४११४०७ ध् ९४७९४११४०८

स्त्री के अंतर्मन के मनोविज्ञान को प्रस्तुत करती कवितायें

स्त्री के अंतर्मन के मनोविज्ञान को प्रस्तुत करती कवितायें
पुस्तक: छुअन सप्तरंग की, कवियत्री :मंदाकिनी श्रीवास्तव,दंतेवाडा, समीक्षा: अनिल अयान,सतना

जीवन के सात रंग गर्भावस्था, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढावस्था और वृद्धावस्था में समाहित है।इन सातो रंगो से सजा स्त्री का जीवन अपने विभिन्न आयाम स्वयंमेव ही गढता है। कवियत्री मंदाकिनी श्रीवास्तव ने इन्हीं स्त्रीत्योचित आयामों को एक सुदीर्घ कविता के माध्यम से अपने भाव पाठकों के सामने रखती हैं।सबसे बडी बात यह है कि मुखपृष्ठ और चित्रांकन भी मंदाकिनी श्रीवास्तव के द्वारा ही किया गया है।इस पुस्तक में छत्तीसगढ के कुछ स्वनाम धन्य साहित्यकारों की संप्रतियां भी इस काव्य संग्रह को उचाइयां प्रदान करती हैं। इस संप्रतियों में मालती जोशी,डा.गणेश खरे,प्रो.बालचंद्र कछवाह,गोवर्धन यादव,मनोज शुक्ल मनोज,लाला जगदलपुरी और गिरीश पंकज जी के पुस्तक और कवियत्री के प्रति सारगर्भिक विचार पुस्तक की कोटि को और अधिक विकसित करते हैं। इस पुस्तक में मंदाकिनी जी ने इन सप्त रंगों के माध्यम से हर अवस्था में उठे स्त्री विमर्श के विभिन्न आयामों को भी स्वस्थ विचारधारा के अनुरूप स्पर्श किया है। उन्होने अपने पुरोवाक में खुद स्वीकारा है कि पीडा सहने के बाद भी नारी के आहत मर्म स्थलों को अपनी संवेदना से छूकर उन्हें आत्मिक संतोष मिलता है। इस काव्यसंग्रह में हर अवस्था में नारी नहीं बल्कि नारी चेतना के विकास की दशायें अभिव्यक्त हुई है।
            हर अवस्था से संबंधित कविता के पूर्व में लिखी गयी काव्यगत प्रस्तावना और अंत में लिखी गई विमर्शगत टीप इस काव्य संग्रह की अनुपम विशेषता है जिसको पढने के बाद कवियत्री के मन की बात उस कविता विशेष पर क्या रही होगी यह जान पडती है। गर्भावस्था के पूर्व में ही कवियत्री ने एक कविता का अंश उद्धरित किया है जिसका अर्थ पुस्तक के उद्देश्यों पर खरी उतरती है। उसकी बानगी इस तरह है कि
            जमीन में दबा दी गई..मेरी तरह….जन्मी अजन्मीहजारो लाखों आकांक्षायें|
            मेरे अस्तित्व केछिन्न भिन्न
            इधर उधर गिरे अंश फिर सेसती के….जलते हुये रूप देहरूपी अंगारों की भांति
            चेतना का स्वरूप होंगें।
            हर अवस्था में …..मेरा अस्तित्वकरायेगा परिचय..जग कोअपने मान का।
            गर्भावस्था में एक कन्या भ्रूण के मनोदशा की परिकल्पना को कवियत्री ने विभिन्न मनोवैज्ञानिक दशाओं के माध्यम से उकेरा है।जिसमें तुम्हें बोलना तुम्हे सुनना ,तुम्हे देखना,जानना,समझना,महसूस करना,पाना, आदि विभिन्न भविष्यगत क्रियायें हैं। उन्होने विमर्श में बताया कि जीवन नारी विमर्श से बाहर भी होता है इनकी संख्या लाखों की संख्या में है। यह कविता उन्ही के मर्म को उकेरती है।..शैशवावस्था में कवियत्री मानती है कि इस अवस्था को चित्रण करना कठिन है। इस अवस्था में नारी का स्वाभिमान,आत्माभिमान,रहता है उसका नारित्व,उसके हृदय की कोमलता,उसकी विभिन्न सोच को चाह मिलती है। परन्तु इस अवस्था में भी एक दर्द पीडा को मंदाकिनी जी लिखती हैं कि
समझा है मैने...रंग है दो ही,... प्रदीप्ति में नहाया हुआ... है एक और.. कालिमा में डूबा हुआ वही... कालिमा से निकलकर आते हैं.... कुछ लोग.,. काला हृदय... लेकर ...मुझ जैसे अंकुर को अलग कर देते है धरती से.....शिशु को मां से....
            बाल्यावस्था में कवियत्री ने लिखा कि लडकी का बढना उस सहत्रों जापों और तप तपस्याओं की तरह है जिसने शैलजा को शाम्भवी के रूप में अधिस्थापित किया।बालिका से नारी बनने का अर्थ हाथों से फिसलती रेत में मोती तलाशना है। मंदाकिनी जी लिखती हैं कि
            “मां से लो..जीवन का रस... ज्यों ज्यों मै बढती हूं.. गहरी होती चली जाती है....रेखायें तुम्हारे चेहरे पर.... मां तुम क्यों खडी होती हो दृढ..उपेक्षा की कडकती ठंड..और अप्रिय बर्फीली हवाओं में भी... जगह जगह ...बनते चिन्ह... तुम्हारी देह पर... कहते हैं मुझे..नजाने क्या.. टूटता सा लगता है कुछ.. जैसे कि ...मेरे प्यारे खिलौने का हिस्सा.. कोई दरका हो कहीं से..
किशोरावस्था के अंतर्गत कवियत्री लिखती है कि यह अवस्था कांच की दीवारों की तरह होती है जिसके आर पार देख तो वो सकती है परन्तु हाथ लगते ही वह दीवार चकनाचूर होकर बिखर जाती है। उन्होने अपनी कविता में लिखा कि
            “लडकी होने के गर्व को..मै और मां मिलकर...डालते हैं...बूंद बूंद जरा जरा करके..पानी में...और चलाते हैं.. आत्मविश्वास की पतवार..”
            युवावस्था में कवियत्री के भाव हैं कि इस अवस्था में नारी जानती है सवालों के जवाब,वह प्रश्न नहीं करती बल्कि उसका मन मस्तिष्क जवाबों के कई चित्र बनाता है बिगाडता है।समाज की वर्जनाओं के स्वरूप भिन्न है जिसमें चित्र नहीं समाते हैं चित्र।कई स्थानों पर यह और भी दुखद है कि नारी गुलामी को इतना अपना चुकी है कि उसे अपनी खोई अस्मिता बिखरा हुआ आत्मभिमान ढूंढने की जरूरत ही महसूस नहीं होती है। वो इसमें लिखती हैं कि
             “मै..युवा हूँ...मै सुनूंगी इन पुकारों को...हाथों में होगी..कलम की तलवार..जूझने के लिये... या होगी..दोनो हाथों में ... हिम्मत भरी ...चांद और सूरज की रोशनी...या फिर होगी उठाने के लिये... बैसाखियां आत्म शक्ति की।
            मंदाकिनी जी लिखती है कि प्रौढावस्था से गुजरना आयु के उस रंग का स्पर्श करना है जहां एक ठहराव है सोच की गंभीरता है।यहां आयु आकर ठहर सी जाती है।शायद उसे भी अनुभवों का दमकता व्यक्तित्व भा जाता है।
            “थपेडे सहकर...गर्म झुलसाने वाली..जिम्मेवारियों के...बिता दिये वर्षों..लेकिन अब युव नहीं....अनचाही ..अनजानी.. पीडा से भरा हुआ..अंग..अंग.. मानो कहता हुआ.. संपदा थे तुम्हारी..पर होम कर दिया..सारे सौंदर्य और शक्ति को..जीवन के अपने यज्ञों में।
            वृद्धावस्था के संदर्भ में कवियत्री कहती हैं कि भटकाव भी इस अवस्था में दिखता है परन्तु जीवन में भटकते भटकते बच्चा वृद्ध बन जाता है।नारी चेतना भी वृद्धाअवस्था में आती है।पाना है की अनुगूंज के साथ जीवित रहता है और बस इतना पा लिया के भीतरी संतोष भरे स्वर में दम तोड देता है।नारी चेतना अपनी हार जीत के मायने खुद गढती है और जीत तो तभी जाती है जब वह जन्म लेती है। वो लिखती हैं कि
            “मै निहारूंगी .... बूढी देह की इन.. धुंधला गयी आखों से... जलभरे शून्य में...रंग रस्मियों को... दूर है अभी यात्री.... आते ही पास,.,. उन्हें भी दिखेगा अवश्य.... झिलमिल चेतनायुक्त..जीवनधनुष..सप्तरंगों का...
            इस कविता संग्रह में कवियत्री ने सुदीर्घ नई कविता के स्वरूप में स्त्री के अंतर्मन के मनोविज्ञान को प्रस्तुत किया है।जिसमें उसके मन के बीच का अंतर्द्वंद ,आशंका,डर,पीडा भी है तो दूसरी तरफ आशा,उम्मीद,लक्ष्य,उद्देश्य,और जीवन के विभिन्न अवस्थाओं से मिली सीख और प्रेरण का स्वर भी है। यह कविता संग्रह स्त्री समग्र के चित्रण को बहुआयामी बनाया है। इसमें जडता के परे स्त्रीजीवन की सार्वकालिकता की बात पाठकों और समाज तक पहुंचाया है। मुझे इस बात की खुशी है कि इस तरह के स्वस्थ स्त्री विमर्श की प्रस्तावना साहित्य को विचारधारा के बंधनों से मुक्त करने के लिये कारगर सिद्ध होगी। नई कविताओं में भावप्रधान और बोधगम्य भाषा शैली के साथ साथ धारा प्रवाह वैचारिक मंदाकिनी को पाठकों के मन में अविरल प्रवाहित करने के लिये कवियत्री धन्यवाद और बधाई की पात्र हैं।

अनिल अयान,सतना
युवाकवि,कथाकार
प्रधान संपादक
शब्द शिल्पी,सतना
9479411407