सतना के आम आदमी की महागाथाः मेरी बस्ती मेरे लोग
मुझे लगता है कि हमेशा से इतिहास जिन लोगों की उपेक्षा करता रहा है उनकी चिंता साहित्य ने की है और इसी चिंता ने कई महागाथाओं को जन्म दिया है।हर एक शहर का अपना एक इतिहास होता है। कभी इतिहास इतिहास कारों के द्वारा लिखा जाता है और कभी इतिहास से आम आदमी की कहानी उभर कर आती है जिसे उपेक्षित कर दिया गया। सतना की धरती की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। सतना नगर राजा रानियों के धतकरमों के कारण नहीं उत्पन्न हुआ है। इस नगर को आबाद करने में यहाँ के यहाँ के पुरुखों के अलावा गली, चैराहों, सडकों, गलियों, इमारतों, बाजार, दुकानदारों, दलालों, रंडियों, हिजडों, के अलावा मेहनतकश का बहुत अहम योगदान रहा है।
मेरी बस्ती मेरे लोग सतना नगर की बहुत पुरानी कहानी बनकर सन २००२ में उभरी। इसके पूर्व सतना के लिये शिवानंद जी ने सतना नगर नाम का दस्तावेज छोडा जो आज के समय में विलुप्त प्राय सा हो गया है। मेरी बस्ती मेरे लोग का द्वितीय संस्करण विगत जनवरी २०१५ को इसके लेखक चिंतामणि मिश्र द्वारा दोबारा पाढकों के लिये तैयार किया गया। सतना के बारे में और अधिक खुलासे, रहस्यों का उद्घाटन और नई जानकारियों के साथ यह ऐतिहासिक महागाथा तीन सौ पृष्ठों से भी अधिक की बन पडी।इसके नवीन संस्करण में चिंतामणि जी ने कुछ नये अध्याय जोडा और नये पहलुओं को पाठकों के सामने लाया है। प्रथम संस्करण में तीस से भी कब अध्याय थे और इस संस्करण मे तेतिस अध्याय पाठकों से रूबरू होते है। जिसमें यह हादसों का शहर है, डेढ सौ साल का सतना,अनाथ बस्ती के गुमनाम लोग,चले गये वो लोग नवीन और उपयोगी अध्याय समाहित किये गये हैं। इस पुस्तक में पुराने अध्यायों को पुनः नवीनीकॄत किया गया है जिसका महत्व आज के समय पर और अधिक बढ गया है। जिसमें बस्ती का नामांकरण,सतना की यादगार इमारतें,मुहल्ले और चैराहे, सतना की गलियाँ, रेल्वे स्टेशन,बस स्टैंड, सतना की धर्मशालायें,नगर निगम,पूजा स्थल, धर्म कर्म,सतना की होली,सतना की दीपावली,माहुलिया,सतना का दशहरा, सतना का गरबा,बाजार और दुकानें,रहन सहन, राजनीति और नेता,चिकित्सा सुविधा,पुलिस व्यवस्था, खेल,जुआँ और सट्टा,सतना के अखबार और पत्रकार,साहित्य और साहित्यकार, संगीत और नाटक, रंडियाँ और हिजडे,राजस्व और न्याय,आदि प्रमुख अध्याय हैं। नये अध्यायों को जोडने के पीछे लेखक का उद्देश्य सतना के बारे में वो बातें जो आज की आपाधापी में गुम सी हो जाती हैं,उनको लोगों के सामने लाना है।
चिंतामणि मिश्र सतना के मूल लेखक के रूप में इस धरती में स्थापित हुये आजादी के पहले से उनके पूर्वज इस नगरी में आये और यहीं के होकर रह गये। मेरी बस्ती मेरे लोग २००२ से २०१५ के बीच कई आपाधापियों और उतार चढावों की यात्रा तक कर द्वितीय संस्करण तक पहुँची और आज पाठकों के सामने सतना के कल आज और कल को प्रस्तुत कर रही है। लेखक ने इस बात को खुद स्वीकारा है कि इस संस्करण को तैयार करने मे उन्हें पहले संस्करण से ज्यादा मेहनत और खोजी प्रवृति को उपयोग करना पडा। लेखक ने अपनी बस्ती के स्वाधीनता संग्राम के बारे में भी बहुत कुछ खोजा और उसे एक कृति सतना जिले का १८५७ के रूप में पाढकों के सामने सन २०११ में प्रस्तुत किया। मेरी बस्ती मेरे लोग का द्वितीय संस्करण सतना के गये गुजरे इतिहास की जीती जागती तस्वीर प्रस्तुत करता है। लेखक एक बागवान की तरह होता है जो अपने द्वारा लगाये पौधों को अपने हाथों के पालन पोषण करता है। मेरी बस्ती मेरे लोग और चिंतामणि मिश्र के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। अपने लेखन को नवीनीकृत करके दोबारा चेतन्न बनाकर पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का साहित्यिक करम सफलतापूर्वक उन्होने किया है। चले गये वो लोग इस पुस्तक का वह अध्याय है जिसमें लेखक ने इस नगर के उन अनाम लोगों के बारे में लिखकर उन्हें दस्तावेज बना दिया, जो इस नगर के अस्तित्व की लडाई के लिये खत्म हो गये और इस नगर को उनका हमेशा शुक्रगुजार होना चाहिये। सतना नगर के हर व्यक्ति को इस पुस्तक को पुनः पढकर इस लेखन को समझना और सम्मानित करना चाहिये। क्योंकि यह पुस्तक साहित्यिक कृति होने के साथ साथ सतना की ऐतिहासिक पुस्तक बन पडी है। मेरे द्वारा लिखा गया यह पाठकनामा कोई पुस्तक समीक्षा नहीं वरन इस महागाथा को पढने के बाद उपजी मन की जिज्ञासा और पुनर्विचार हैं। एक जीवंत महागाथा को पुस्तक के रूप में सहेजने के लिये श्री चिंतामणि मिश्र साधोवाद के पात्र हैं।
अनिल अयान, सतना
‘संपादक’, शब्द शिल्पी पत्रिका, सतना
संपर्क रू ९४७९४११४०७ ध् ९४७९४११४०८
मुझे लगता है कि हमेशा से इतिहास जिन लोगों की उपेक्षा करता रहा है उनकी चिंता साहित्य ने की है और इसी चिंता ने कई महागाथाओं को जन्म दिया है।हर एक शहर का अपना एक इतिहास होता है। कभी इतिहास इतिहास कारों के द्वारा लिखा जाता है और कभी इतिहास से आम आदमी की कहानी उभर कर आती है जिसे उपेक्षित कर दिया गया। सतना की धरती की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। सतना नगर राजा रानियों के धतकरमों के कारण नहीं उत्पन्न हुआ है। इस नगर को आबाद करने में यहाँ के यहाँ के पुरुखों के अलावा गली, चैराहों, सडकों, गलियों, इमारतों, बाजार, दुकानदारों, दलालों, रंडियों, हिजडों, के अलावा मेहनतकश का बहुत अहम योगदान रहा है।
मेरी बस्ती मेरे लोग सतना नगर की बहुत पुरानी कहानी बनकर सन २००२ में उभरी। इसके पूर्व सतना के लिये शिवानंद जी ने सतना नगर नाम का दस्तावेज छोडा जो आज के समय में विलुप्त प्राय सा हो गया है। मेरी बस्ती मेरे लोग का द्वितीय संस्करण विगत जनवरी २०१५ को इसके लेखक चिंतामणि मिश्र द्वारा दोबारा पाढकों के लिये तैयार किया गया। सतना के बारे में और अधिक खुलासे, रहस्यों का उद्घाटन और नई जानकारियों के साथ यह ऐतिहासिक महागाथा तीन सौ पृष्ठों से भी अधिक की बन पडी।इसके नवीन संस्करण में चिंतामणि जी ने कुछ नये अध्याय जोडा और नये पहलुओं को पाठकों के सामने लाया है। प्रथम संस्करण में तीस से भी कब अध्याय थे और इस संस्करण मे तेतिस अध्याय पाठकों से रूबरू होते है। जिसमें यह हादसों का शहर है, डेढ सौ साल का सतना,अनाथ बस्ती के गुमनाम लोग,चले गये वो लोग नवीन और उपयोगी अध्याय समाहित किये गये हैं। इस पुस्तक में पुराने अध्यायों को पुनः नवीनीकॄत किया गया है जिसका महत्व आज के समय पर और अधिक बढ गया है। जिसमें बस्ती का नामांकरण,सतना की यादगार इमारतें,मुहल्ले और चैराहे, सतना की गलियाँ, रेल्वे स्टेशन,बस स्टैंड, सतना की धर्मशालायें,नगर निगम,पूजा स्थल, धर्म कर्म,सतना की होली,सतना की दीपावली,माहुलिया,सतना का दशहरा, सतना का गरबा,बाजार और दुकानें,रहन सहन, राजनीति और नेता,चिकित्सा सुविधा,पुलिस व्यवस्था, खेल,जुआँ और सट्टा,सतना के अखबार और पत्रकार,साहित्य और साहित्यकार, संगीत और नाटक, रंडियाँ और हिजडे,राजस्व और न्याय,आदि प्रमुख अध्याय हैं। नये अध्यायों को जोडने के पीछे लेखक का उद्देश्य सतना के बारे में वो बातें जो आज की आपाधापी में गुम सी हो जाती हैं,उनको लोगों के सामने लाना है।
चिंतामणि मिश्र सतना के मूल लेखक के रूप में इस धरती में स्थापित हुये आजादी के पहले से उनके पूर्वज इस नगरी में आये और यहीं के होकर रह गये। मेरी बस्ती मेरे लोग २००२ से २०१५ के बीच कई आपाधापियों और उतार चढावों की यात्रा तक कर द्वितीय संस्करण तक पहुँची और आज पाठकों के सामने सतना के कल आज और कल को प्रस्तुत कर रही है। लेखक ने इस बात को खुद स्वीकारा है कि इस संस्करण को तैयार करने मे उन्हें पहले संस्करण से ज्यादा मेहनत और खोजी प्रवृति को उपयोग करना पडा। लेखक ने अपनी बस्ती के स्वाधीनता संग्राम के बारे में भी बहुत कुछ खोजा और उसे एक कृति सतना जिले का १८५७ के रूप में पाढकों के सामने सन २०११ में प्रस्तुत किया। मेरी बस्ती मेरे लोग का द्वितीय संस्करण सतना के गये गुजरे इतिहास की जीती जागती तस्वीर प्रस्तुत करता है। लेखक एक बागवान की तरह होता है जो अपने द्वारा लगाये पौधों को अपने हाथों के पालन पोषण करता है। मेरी बस्ती मेरे लोग और चिंतामणि मिश्र के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। अपने लेखन को नवीनीकृत करके दोबारा चेतन्न बनाकर पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का साहित्यिक करम सफलतापूर्वक उन्होने किया है। चले गये वो लोग इस पुस्तक का वह अध्याय है जिसमें लेखक ने इस नगर के उन अनाम लोगों के बारे में लिखकर उन्हें दस्तावेज बना दिया, जो इस नगर के अस्तित्व की लडाई के लिये खत्म हो गये और इस नगर को उनका हमेशा शुक्रगुजार होना चाहिये। सतना नगर के हर व्यक्ति को इस पुस्तक को पुनः पढकर इस लेखन को समझना और सम्मानित करना चाहिये। क्योंकि यह पुस्तक साहित्यिक कृति होने के साथ साथ सतना की ऐतिहासिक पुस्तक बन पडी है। मेरे द्वारा लिखा गया यह पाठकनामा कोई पुस्तक समीक्षा नहीं वरन इस महागाथा को पढने के बाद उपजी मन की जिज्ञासा और पुनर्विचार हैं। एक जीवंत महागाथा को पुस्तक के रूप में सहेजने के लिये श्री चिंतामणि मिश्र साधोवाद के पात्र हैं।
अनिल अयान, सतना
‘संपादक’, शब्द शिल्पी पत्रिका, सतना
संपर्क रू ९४७९४११४०७ ध् ९४७९४११४०८
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