Tuesday, 19 April 2016

प्रेम की संभावना और विडंबना से युक्त कहानियां

प्रेम की संभावना और विडंबना से युक्त कहानियां
पुस्तक: प्रेम गली अति सांकरी, कहानीकार: राम रतन अवस्थी, नौगांव, समीक्षा: अनिल अयान
कहानीकार रामरतन अवस्थी जी के द्वारा लिखित कहानी संग्रह प्रेम गली अति सांकरी का शीर्षक ही कृति को पढने के लिये जिज्ञासा को बढा देता है.संग्रह की कहानियां अपने अपने कालखंड में प्रेम के त्वरित बदलाओं को पाठक तक पहुंचाने का काम करती हैं.पचास से साठ दशक में लिखी ये कहानियां पाठक को स्वातंत्रोंत्तर काल खंड में पहुंचने में मदद करती है.कहानीकार ने अपनी कहानियों के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रेम को किसी एक फ्रेम में कैद नहीं किया जासकता है. किरदारों की बात करें तो प्रेम गली अति सांकरी की किरदार नलिनी, कर्मक्षेत्र का मुकेश,सुखिया का किरदार किस्सू,आबरू के विजय और प्रभा,रिसते रिस्ते के बाबू जी और उनके बेटी दामाद और अंतिम कहानी के रामदुलारे सभी ने अपनी अपनी पटकथा में अभिनय करके प्रेम की संभावना और विडंबना को पाठकों तक पहुंचाते हैं.प्रेम के हर रंग से अभिभूत यह कृति कलमकार के द्वारा ही पूर्णरूपेण कथा की संपुष्टि तो नहीं करती परन्तु इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि ये कहानियां भले ही क्लैसिकल कहानियां ना हो परन्तु एक साइलोलाजिकल कहानियों के चलन को आगे बढाने का काम बेहतर ढंग से किया है.
      कहानीवार यदि हम बात करें तो अंतिम दो कहानियों में प्रेम के पराभव की प्रस्तुति है.वो पराभव जो रिस्तों के विघटन को पाठकों के सामने लाता है.(रिसते रिस्ते और राम दुलारे की शवयात्रा)।अन्य कहानियों में किरदार वर्णित प्रेम की पराकाष्ठा और प्राप्ति हेतु महसूस होने वाली विडंबना का वर्णन किया गया है.प्रेम गली अति सांकरी में जहां युवा साधू और नलिनी के अंतरंग संबंधो की चर्चा है. पुनः असहज होकर वचन में नलिनी को प्रेम पाश की जकडन की अनुभूति कराता है.कर्म क्षेत्रे में मुकेश की विडंबना यही थी कि वो अस्थिर मन के चलते कर्म क्षेत्र की खोज करने की पीडा को भोगता है.और अंत में एक तपस्वी बाबा जी का आशीर्वाद उसे राह दिखाता है.शहादत में प्रेम धर्म की जंजीरों को पार करके इंशानियत की बानगी प्रस्तुत करता है.एक प्राण दो देह में समाजिक रूप से प्रेम की आकृति उम्र के परे जाकर किरदारों को प्राप्त होती है.जैसे आबरू कहानी में प्रभा और विजय की कहानी भी प्रेम की पराकाष्ठा को आर्मी कैंप के कथानक से जोडने काम लेखक ने किया है.सुखिया एक चरित्र प्रधान कहानीहै जिसमें मेले में गुम हुआ बेटा बडा होकर विधवा आश्रम में एक डाक्टर के रूप में अपनी मां से मिलता है.अंतर्वेदना कहानी में उमेश का रेनू के प्रेम को नकारने की बात भी कहीं ना कहीं प्रेम गली अति सांकरी को पाठकों तक पहुंचाता है. कहानियों का तारतम्य भले ही प्रेम की अभिव्यक्ति को प्रेमी प्रेमिका से लेजाकर अन्य रिस्तों तक समेटने का कार्य कहानीकार ने बखूबी किया है.परन्तु हर कहानी भारतीय मर्यादा और उसके परे अतंर्मन के प्रेम की संभावना को पाठकों के सामने रखा है.कई कहानियों में यह देखा गया है कि पुरुष किरदार,स्त्री किरदार के प्रेम पाश को टॊड कर कहानी में यात्रा करता है. वहीं दूसरी ओर सांसारिक प्रेम के चलते पुरुष ही स्त्री के प्रेम के बिना एकाकीपन का शिकार हो जाता है.इसमें कोई गुरेज नहीं है कि पुरुष अपने प्रेम का बखान करके प्रसिद्धि पा लेता है और स्त्री उसी प्रेम को छिपाकर उम्र भर हृदय के अंतरंग में सुरक्षित रखती है.
      कहानीकार ने अपने जीवन अनुभवों को समय सापेक्ष किरदारों के माध्यम से कथावस्तु में पिरोया है, प्रेम की गली तो हर कहानी में नजर आती है.परन्तु देशकाल और कथानक का वातावरण गली में किरदार की विवशता और विडंबना को पाठकों तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की है.उनकी अलका कृति को भी मैने पहले पढा है. वो निश्चित ही इंद्रधनुषीय लेखन के धनी कलम कार हैं. कहानी का कहानी पन भी इन कहानियों में मुख्य रूप से परिलक्षित होता है.कहानियां पढने के बादमहसूस होता है इस प्रकार के किरदार आज भी हमारे समाज में देखे जा सकते हैं. भाषा की सरलता और तरलता इतनी तीव्र है कि उसमें अवस्थी जी के भाषागत वातावरण की महक आती है.कहानी संग्रह प्रेम के अविरल रूप रंगों से पाठकों को गहराई तक जोडता है. संग्रह में कहीं पीडा ना पाने की है तो कहीं पीडा पाकर खोने की भी है.कहानीकार ने आपबीती को जग बीती बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयास किया.एक रुचिपूर्ण कहानीपन लिये कहानियों को लिखने की कला के धनी अवस्थी जी बधाई के पात्र है और बधाई की पात्र उनकी बेटी वंदना अवस्थी दुबे जी भी  हैं जिनके स्नेह से यह कृति मुझ तक पहुंची. हर पाठक को इस कृति को पढना चाहिये ताकि वो इसके माध्यम से प्रेम की गली के संकरेपन के मनोविज्ञान को समझ सके..यह दावा है कि पाठक को इस कृति को पढने के बाद आत्मशांति की प्राप्ति अवश्य होगी. वो आत्मशांति जो उसके मन की चंचलता को स्थिर करने के साथ साथ केद्रित करने का काम भी करेगी.
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७


2 comments:

  1. शानदार समीक्षा है अनिल जी। आभार आपका।

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  2. शानदार समीक्षा है अनिल जी। आभार आपका।

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