टूटने की खातिर सपने देखने वालों की मार्मिक दास्तां
है बारामासी
डा ज्ञान
चतुर्वेदी जी एक विचारधारा की तरह साहित्य में बह रहे हैं जिन्होने व्यंग्य को हर विधा
में बेबाकी से सलीके के साथ इस्तेमाल किया और सफलता भी हासिल की. लेखक के बारे में
जितना मैने अपने लेखन के प्रारंभिक काल से देखा. उन्हे पत्र पत्रिकाओं में गाहे बगाहे पढने का भी अवसर मिला, परन्तु देखने,
मिलने का अवसर पचमढी में जनवरी के अंतिम सप्ताह में आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला में
मिला. लोग रचना अथवा कृति को पढकर लिखते हैं. मैने इस उपन्यास के मंचन को पचमढी के
अंतिम दिन देखा. देखकर आनंद आया तो उसे ढूंढकर दो बार पढा.अब जाकर लिखने का दुस्साहस
कर रहा हूं. मै सिर्फ रचना की बात करूंगा क्योंकि रचनाकार के कद को मै अपने शब्दों
में बयां नहीं कर सकता हूं.
लोग बारामासी
को पढकर लिखे होंगे परन्तु मैने बारामासी को पहले देखा सुना और समझा.फिर भी मन नहीं
माना तो उसे दो बार पढा. देखना जितना ज्यादा सुखद था पढना उतना ज्यादा रोमांचक और मार्मिक
रहा. बुंदेली की मिठास लिये बोली हो और हिंदी भाषा में जब एक कस्बे की मनोदशा का वर्णन
हो तो बारामासी अपने में ही अद्वितीय बन पडता है. दुबे जी का परिवार तो सिर्फ एक बहाना
है ज्ञान जी के लिये,ताकि वो पाठक को उस परिदृश्य से जोडकर देश के अंदर पैदा हुये कस्बों
मे पल रहे निम्न व मध्यम वर्गीय परिवार की मनोदशा,भविष्यगत सपनों की दुनिया के आभासीपन
को बेबाकी से तीव्रगति से पहुंचा सके. उपन्यास के इतर लेखक का रीवा,सतना और पन्ना से
काफी गहरा ताल्लुकात रहा है.बुंदेली की मिठास से यह उपन्यास इसीलिये सराबोर हो गया.एक
दर्शक की भांति उपन्यास के नाट्य रूपांतरण को देखने के बाद ऐसा लगा जैसे कि लेखक ने
कथानकों की कठपुतलियां कलाकारों के अंदर समाहित करके अपनी बात दर्शकों तक पहुंचा दी
हो.
उपन्यास
का हर पात्र अपनी अपनी प्रथा का निर्वहन कर रहा है.लेखक ने हर पात्र और उसके देशकाल
के साथ कुछ नया करने की कोशिश की है. हर पात्र पूरे उपन्यास में आशाओं का पल्लू नहीं
छॊडता है. हर पात्र अपने इंद्रधनुषीय सपनों की दुनिया में जी रहा है.वो जानता है कि
उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और सामाजिक स्थिति उसके सपनों के पूरा होने के लिये सबसे
बडी बाधा है. उसे इजाजत नहीं मिलती है. तब भी हर पात्र अपने हठ से विवश है.वह हठ आशाओं
की धुंधली तस्वीर को पाठकों के सामने उकेर देता है. इसी लिये हम इसे हठकथा के रूप में
स्वीकार करें तो बेमानी ना होगा.बारामासी का हर किरदार एक जुनून को अपने अंतस में समेटकर
न पूरा होने वाले सपनों को खुशमिजाजी से देखता है. सपने पूरे नहीं होते तो टूट कर बिखर
जाते हैं.टूटे सपनों की पीडा और हार जाने की कसक उन्हें कचोटती है. परन्तु पात्र इतने
दृढ संकल्पी हैं कि कसक को समेटकर, दर्द को सहकर भी दो बारा टूटने के लिये नये सपनों
को देखते हैं. उन्हें उम्मीद है कि एक ना एक दिन उनके सपने हकीकत में पूरे होंगे. इस
भूमिका में मामा जी और बिन्नू इसी तरह की मिट्टी से बने किरदार हैं. जिन्होने अपनी
उम्मीदों की ज्योति को अपनी मजबूरियों से लडकर भी जलाये रखा है भले ही यह एक मनोवैज्ञानिक
भ्रम था जो अंत तक एक भ्रम ही के रूप में ही उपन्यास में बना रहता है.
यह उपन्यास
हास्य व्यंग्य को साथ साथ लेकर अंत तक की यात्रा करता है.लेखक सीधे बातचीत से खुद को
बचाते हुये अपने उपन्यास के पात्रों और उनकी परिस्थितियों के माध्यम से अपने उद्देश्यों
को पाठकों तक संप्रेषित करते है. यह कथा दुबे परिवार के हर सदस्य के बदलते मानवीय और
पारिवारिक संबंधों की दास्तां है. यह कस्बों और कस्बाई सडकछाप इश्कबाजी का चिट्ठा है.
यह छिछोरे प्रेम की अधूरी कहानी भी बन पडती है. यह शिक्षा पद्धति की मजबूरी, विवषता
,और फायदा उठाने वाले दलालों की कहानी है. यह उपन्यास बिन्नू नाम की लडकी की बिन ब्याही
स्थिति का मनोविज्ञान भी है. बिन्नू के मामा जी लल्लन के आत्मविश्वास की अमरता की कथा
भी है यह बारामासी उपन्यास. यह उपन्यास छुट्टन, गुच्चन, चंदू, लल्ला और बिब्बो के रिस्तों
के अंतर्संबंधों का समाजशास्त्र भी पाठक के सामने रखता है.यह उपन्यास अम्मा की मजबूरी
का खुला दस्तावेज भी बन जाता है. उपन्यास में जहां एक ओर विडंबनायें है तो इसमें दूसरी
तरफ विशंगतियों को परास्त करने के लिये मार्ग भी पात्र खुद ब खुद तलाश कर लेते हैं.
हर पेज बुंदेलखंडी परिवेश, संस्कार, स्वागत, आचार-विचार,रीति रिवाजों और आचरण को समेटे
हुये है. उपन्यास बेरोजगारी का समाज और परिवार में पडने वाले प्रभाव को जहां एक ओर
पाठक तक पहुंचाता है वही दूसरी ओर शादी ब्याह की विरासत और आज के समय में इस विरासत
में लगी सेंधमारी की करतूतों को पाठक तक पहुंचाता है. बिन्नो के ब्याह के समय लडके
वालों की तरफ से जिस तरह की मांगें रखी जाती हैं और दुबे परिवार अपने अभावों के बावजूद
उन मांगों को उसी समय पूर्ण करने की कोशिश करता है,यह दृष्टांत आज के भारत में रहने
वाले हर बेटी के परिवार वालों की मनोस्थिति को परिलक्षित करता है.उपन्यास में बिब्बो
और छुट्टन का प्रेम प्रसंग की प्रस्तुति जिस तरह से आदरणीय ज्ञान जी ने प्रस्तुत किया
है वह दिखने में तो सडक छाप प्रेम और टपोरीपन की छाप छोडता है परन्तु कहीं ना कहीं
पाठक के मन में एक गुदगुदी पैदा करने के लिये भी एक हसगुल्ले का काम करता है. इस तरह
के प्रेम सामान्यतः बीच-बीच में फैंटेसी उतपन्न करने में भी सफल रहा है.
उपन्यास का एक महत्वपूर्ण किरदार गुच्चन और उसके
जीवन में जबरजस्ती बरुआसरायवालों की कृपा से, रिछारिया जी के परिवार से, शीला की उपस्थिति
की वजह उत्पन्न कलह इस उपन्यास में कहीं ना कहीं अप्रत्यासित ट्विस्ट का कारण भी बनकर
उभरता है.मामा जी की कैंसर की लडाई और और अस्पताल में संवादों के जरिये व्यंग्य निकालने
की प्रवृति भी आदरणीय ज्ञान जी से सीखने की आवश्यकता है. लल्ला और फिरंगी के कर्मो
का चिट्ठा भी उपन्यास का एक पूरे अध्याय के रूप में पाठक तक बेबाकी से पहुंचता है और
पाठकों को सामाजिक परिस्थितियों के परिवर्तनशील होने का संदेश भी देता है. उपन्यास की प्रवृति को हम उस समय और गहराई से समझ
सकते हैं जब कथ्य पांच वर्ष का समय गुजार लेते है। दुबे जी के परिवार की स्थिति में
कितना बदलाव आया है वह आगे की कथा स्पष्ट कर देती है. परन्तु अम्मा की आशायें है कि
आज भी इतना सब कुछ होने के बाद भी सपने देखने का क्रम उनके जीवन में बदस्तूर जारी रहता
है,उनका उदय के प्रति आशान्वित होना भी बुढौती में सपनों के दामन को थामें रखने की
बानगी ही तो है..सब कुछ खत्म होने के बाद भी उपन्यास के अंत तक अम्मा के स्वप्न देखने
की प्रक्रिया अनवरत जारी रहती है. लेखक के अनुसार टूटे सपनों के टुकडे उनके पैरों में
चुभते भी हैं. परन्तु अम्मा सपनों को देखना नहीं छॊडना चाहती है.क्योंकि सपनों से ही
तो जीवन है.यदि हम सपने देखना बंद कर दें तो हमारा जीवन भी समाप्त हो जाये.. यह संदेश
हर पाठक को बारामासी पढकर मिलता है.
उपन्यास
में गालियों का संस्कारप्रिय उपयोग किया गया है. लेकिन इससे उपन्यास में अश्लीलता का
असर नहीं दिखता बल्कि संप्रेषणीयता को बल मिलता है. भाषा भी बहुत ज्यादा क्लिष्ट नहीं
है.बल्कि बुंदेलखंड में इस्तेमाल होने वाली बोली को सहेजे हुये हिंदी का प्रायोगिक
रूप है. उपन्यास का हर अनुच्छेद अपने में एक कलात्मकता लिये होता है. उसके अंदर एक
पात्र की खिंचाई उपन्यास की मांग के अनुसार अवश्य लेखक के द्वारा की गई है. अलीपुर
को पाठको के बीच इस रूप में उपन्यास के माध्यम से प्रस्तुत किया गया कि पाठक उपन्यास
पढते समय अपने आप को अलीपुर का वासी मानने का भ्रम पाल बैठता है. और यह भ्रम उसे उपन्यास
को पढने के साथ साथ, हर स्थान को अपनी नजरो के सामने बनने वाले रेखाचित्र को महसूस
करने का अप्रतिम आनंद प्राप्त करने में मदद करता है.राजकमल प्रकाशन इनकी ब्रांड बैल्यू
को और ज्यादा बढा देता है.परन्तु इससे पाठकों को कोई वास्ता नहीं होना चाहिये.आदरणीय
सुशील सिद्धार्थ जी के मार्गदर्शन और संपादन में जब ज्ञान जी के रचना संचयन के प्रकाशन
की जानकारी मिली तो मुझे लगा कि मै अपने मन की बात इस माध्यम से सभी तक पहुंचा सकता
हूं.श्रीलाल जी की परंपरा के सारथी बन चुके लेखक की पाठकों से अप्रत्यक्ष संवाद की
प्रणाली का मै मुरीद हो गया हूं. पचमढी में उनके दो दिन की भेंट ने मुझे ज्यादा उनके
बारे में जानने और समझने का मौका मिला. इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि बारामासी
का हर पात्र आज भी देश के कस्बों में रह रहे मध्यमवर्गीय परिवारों के दर्द को पाठकों
तक पहुंचाने का प्रतिनिधि बना हुआ है. यही इस उपन्यास की सार्वकालिकता भी है.यह उपन्यास
हर कस्बे में अपना जीवन जीता मिल जायेगा.परिवार के मुखिया के जाने के बाद अर्थात मरने
के बाद दुर्दशा का जीता जागता चिट्ठा यह उपन्यास ही है. यह उपन्यास ईमानदार लोगों की
पैरवी करता है और लंपटों को हर सिरे से खारिच करता है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ऐसी रचनाओं को ज्ञानपीठ और
अकादमी पुरुस्कारों के सम्मानित करना चाहिये. यह रचना हमारी तरफ से सम्मानित और श्रेष्ठतम
तो है ही.. इसके बाद मेरा हम ना मरब का अध्ययन जारी है. बारामासी हास्य व्यंग्य से
भरपूर व्यंग्य उपन्यास है... इसमें कोई दो राय नहीं है.
अनिल अयान,सतना म.प्र.
संपादक शब्द शिल्पी, पत्रिका,सतना
९४७९४११४०७
पता; श्रीराम,मारुति नगर,पोस्ट -बिडला विकास,सतना म.प्र.
४८५००५
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