हाशिए के धतकरम को बेपर्दा करते व्यंग्य
मालिश पुराण जब सुशील सर ने मुझे पढने को पचमढी में दिया तो उस समय मेरे लिये उनके दर्शन प्राप्त होना ही सौभाग्य का छण था। मालिश पुराण पढने के बाद के बाद कुछ लिखने का दुस्साहस मै नहीं कर सका। फेसबुक में और वलेस (व्यंग्य लेखक संघ) में सर की कलम और कमलकारी को नियमित अवलोकन करने का अवसर मिला। वंदना अवस्थी दुबे मैम के यहां जब मैने सुशील सर की हाशिए का राग व्यंग्य संग्रह देखा तो मुझे महसूस हुआ कि इसे पढना चाहिए और क्यों ना महसूस हो जब पूरे देश में इस व्यंग्यसंग्रह ने धूम मचा रखी है। वंदना मैम से निवेदन करके मैने इस पुस्तक को एक सप्ताह के लिए उधारी मांग कर पढने के लिए ले आया। इसको पढकर मेरा मन प्रारंभ में गदगद होने लगा, जैसे जैसे आगें बढता गया तो लगा जैसे किसी महासागर में डुबकी लगाना प्रारंभ कर दिया हूं और संग्रह को खत्म करते हुए लगा कि गहराई में जाकर व्यंग्य के सीप को खोज निकाला हो मैने।
मालिश पुराण को पढने के बाद अगले पडाव में हाशिए का राग पढना व्यंग्य के सम्राज्य की भूल भुलैया में खुद को खडा होते देखने जैसा था। मै ना व्यंग्य लिखता था, ना व्यंग्य से कोई गहरा सरोकार था, ना मै व्यंग्य की एबीसीडी और ककहरा जानता था उसके बावजूद पहले पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ में प्रकाशित बारह लघुव्यंग्य पढने की तारत्म्यता स्थापित करने में व्यंग्यराग असर डालता रहा। हर व्यंग्य यूं तो पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुका था किंतु मेरे लिए नए नवेले रूप में ही ये व्यंग्य आये। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि गाहे बगाहे ही सर के व्यंग्यों की गहराई से मेरा सामना इतना नजदीक से हो रहा था।
चाहे बात मोहब्बत की हो, लात की हो, तन ढकने वाले कपडे की हो, राजा और रंक की हो, चोर या कोतवाल की हो,माफी से लेकर नेकी तक की बातें, देश समाज से परिवार तक की बातें, दोश्ती से दुश्मनी तक की बाते, गाली से लेकर सतसंग तक का सफर ऐसा तय किया मैने जैसे इन व्यंग्यों के साथ जाने अनजाने मित्रता हो गई हो। कद के केंद्र में घूमने वाले सर के व्यंग्य प्रारंभ की भूमिका से ही विभिन्न दिग्गजों की अभिव्यक्तियों और अभिमत से सुरक्षित हो चुके थे। मै कुछ समय के लिए तो अन्योक्ति स्थिति में पहुँच गया था कि ये अभिमत इन व्यंग्यों की प्रस्तावना है या ये व्यंग्य इन अभिमतों की प्रस्तावना के परे उपसंहार के रूप में हैं। जिन लोगों ने भी इसमें अभिमत दिये वो व्यंग्य के हर दृष्टिकोण से पुरोधा कलमकार हैं। किंतु पढने के बाद एक पाठक जो मेरे जैसे व्यंग्य में मात्र साक्षर हो गया, वो इन व्यंग्यों को अभिमत के परे मानता है। क्योंकि सर का व्यंग्यकार दिमाग जितना सक्रिय है उससे कहीं ज्यादा उनका कवि और शायर मन, लोक रंग को समेटी आशाएं उनके दिमाग की उपज के साथ घुडसवारी करती नजर आती हैं। इस मिजाज में वो हर विषय को नेपथ्य से निहारने की चेष्टा बस नहीं करते वरन जिस कोण से देखने जज्बा दिखाते है उस कोण से विभिन्न आयाम को समेटने का गुणधर्म उनके लेखन में साफ साफ दिखता है। लोक भाषा, बोलियों के देशज शब्द अवध की भूमि की भाषागत महक यह बता देती है कि वो अवधी के सुशील सुपुत्र है ही साथ ही साथ लोक भाषा बोली और देशज संग विदेश भाषा संविलियन में सिद्धहस्त सिद्धार्थ भी है।
उनका व्यंग्य सपात बयान पेश नहीं करता है। वो पाठक को एक कथा के अंदर ले जाकर पात्रों के दवारा वो सब कहला देते हैं जो पाठक सुनना और महसूस करना चाहता है। उनके पात्र पाठक को मनोरंजन देने के साथ साथ, ज्ञानरंजन, लोकरंजन देने का काम करते हैं। उनके व्यंग्य आपबीती से प्रारंभ होकर जगबीती के साथ खडे नजर आते हैं। संवाद की शैली पाठक को जुडने के साथ साथ सोचने और समझने की वैचारिक समझ प्रदान करते है। जाने अनजाने हाशिए में खडे होकर भी पाठक जिस राग को जीवन पर्यन्त अलापता रहताहै वह राग उसे हाशिए से खींचता हुआ केंद्र में स्थापित कर देता है। और यह पाठक की विवशता होती है कि उसे इन व्यंग्यों के साथ कुद को केंद्र में लाना ही पडता है।
ये व्यंग्य अगर भाषाई और विषय गत सुशील हैं तो अपने अंजाम तक पहुंचते पहुँचते वक्र हो जातेहैं। कथ्य सहज होकर भी नुकीला और धारदार लगने लगता है। यदि प्रारंभिक व्यंग्य धारदार हैं तो लघुव्यंग्य उतने ही नुकीले हैं। चुभन देने का काम बडे ही सलीके के साथ कर जाते हैं ये अद्भुत व्यंग्य। मैने जो कुछ भी लिखा वह एक पाठक की तरह से ही माना जाए क्योंकि मै कोई बहुत बडा लेखक नहीं हूँ वरन एक अदना सा अनुज हूं। चाहे मालिस पुराण हो या हाशिए का राग हो दोनो सुशील सर के द्वारा अपनी माटी के कर्ज को उतारने के रूप में देखा जा सकता है। ऐसा महसूस होता है कि उत्तर प्रदेश की माटी की खुशबू दिल्ली के गलियारे से आ रही है। कुछ व्यंग्य जो नाटक के रूप में लिखे गये हैं वो व्यंग्य विधा को शैली के रूप में परिणित करने के लिए नेतृत्व करते नजर आते हैं। ये व्यंग्य परिस्थितियों के साथ न्याय करते नजर आते हैं। ये व्यंग्य पाठक को एक दृष्टि प्रदान करते हैं। अंग्रेजी के शब्दों का इन रचनाओं में उपयोग और बनावटी लहजे से बचकर बेबाकी से बात कहने का गुण अगर लेखक में है तो वह इन व्यंग्यों में झलकता है। विभिन्न आयामों को छूते ये व्यंग्य हाशिए का दंश झेलने वाले पात्रों की जीवंतता को केंद्रित करने में सफल होते हैं। ये व्यंग्य उस धतकरम को पाठकों के सामने लाता है जो नेपथ्य और हाशिए में खामोशी के साथ खटराग करता रहता है।
इन व्यंग्यों में जो अप्रत्याशित रूप से नेपथ्य में खडे लोग और उनसे जुडे घटना क्रम केद्रीय विस्थापन हुआ है। वह व्यंग्य के कुनबों के लिए नवीन है। व्यंग्य की जमात का लेखक इनको पढकर मुख नहीं मोड सकता है। पलायन करने की सोच भी नहीं सकता है। व्यंग्य के कुनबे की मजबूरी हैं कि सुशील सिद्धार्थ के हर उस मिजाज से वाकिफ हो जो उन्होने हर व्यंग्य संग्रह में अलग अलग तेवर के साथ पाठकों के सामने रखे हैं। धार का वार हो या चुभन का दर्द हो या आडंबर के प्रति युद्ध हो इन पर साहित्य के हर लेखक को बात करना ही पडेगा इन व्यंग्यों को अपनी बातचीत और विमर्श में लाना ही पडेगा। यही तो इन व्यंग्य बाणों की सफलता है मित्रों। इस सफलता के लिए जो जिम्मेवार है उसे शुभकामनाएं देने में परहेज इस लिए भी नहीं करना चाहता क्योंकि वो अपने गुरुवर डा ज्ञान चतुर्वेदी जी की तरह ही व्य्ंग्य को हर विधा में एक शैली के रूप में स्थापित करने की राह में अग्रसर हैं।
अनिल अयान सतना
९४७९४११४०७
०२/१०/१७
मालिश पुराण जब सुशील सर ने मुझे पढने को पचमढी में दिया तो उस समय मेरे लिये उनके दर्शन प्राप्त होना ही सौभाग्य का छण था। मालिश पुराण पढने के बाद के बाद कुछ लिखने का दुस्साहस मै नहीं कर सका। फेसबुक में और वलेस (व्यंग्य लेखक संघ) में सर की कलम और कमलकारी को नियमित अवलोकन करने का अवसर मिला। वंदना अवस्थी दुबे मैम के यहां जब मैने सुशील सर की हाशिए का राग व्यंग्य संग्रह देखा तो मुझे महसूस हुआ कि इसे पढना चाहिए और क्यों ना महसूस हो जब पूरे देश में इस व्यंग्यसंग्रह ने धूम मचा रखी है। वंदना मैम से निवेदन करके मैने इस पुस्तक को एक सप्ताह के लिए उधारी मांग कर पढने के लिए ले आया। इसको पढकर मेरा मन प्रारंभ में गदगद होने लगा, जैसे जैसे आगें बढता गया तो लगा जैसे किसी महासागर में डुबकी लगाना प्रारंभ कर दिया हूं और संग्रह को खत्म करते हुए लगा कि गहराई में जाकर व्यंग्य के सीप को खोज निकाला हो मैने।
मालिश पुराण को पढने के बाद अगले पडाव में हाशिए का राग पढना व्यंग्य के सम्राज्य की भूल भुलैया में खुद को खडा होते देखने जैसा था। मै ना व्यंग्य लिखता था, ना व्यंग्य से कोई गहरा सरोकार था, ना मै व्यंग्य की एबीसीडी और ककहरा जानता था उसके बावजूद पहले पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ में प्रकाशित बारह लघुव्यंग्य पढने की तारत्म्यता स्थापित करने में व्यंग्यराग असर डालता रहा। हर व्यंग्य यूं तो पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुका था किंतु मेरे लिए नए नवेले रूप में ही ये व्यंग्य आये। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि गाहे बगाहे ही सर के व्यंग्यों की गहराई से मेरा सामना इतना नजदीक से हो रहा था।
चाहे बात मोहब्बत की हो, लात की हो, तन ढकने वाले कपडे की हो, राजा और रंक की हो, चोर या कोतवाल की हो,माफी से लेकर नेकी तक की बातें, देश समाज से परिवार तक की बातें, दोश्ती से दुश्मनी तक की बाते, गाली से लेकर सतसंग तक का सफर ऐसा तय किया मैने जैसे इन व्यंग्यों के साथ जाने अनजाने मित्रता हो गई हो। कद के केंद्र में घूमने वाले सर के व्यंग्य प्रारंभ की भूमिका से ही विभिन्न दिग्गजों की अभिव्यक्तियों और अभिमत से सुरक्षित हो चुके थे। मै कुछ समय के लिए तो अन्योक्ति स्थिति में पहुँच गया था कि ये अभिमत इन व्यंग्यों की प्रस्तावना है या ये व्यंग्य इन अभिमतों की प्रस्तावना के परे उपसंहार के रूप में हैं। जिन लोगों ने भी इसमें अभिमत दिये वो व्यंग्य के हर दृष्टिकोण से पुरोधा कलमकार हैं। किंतु पढने के बाद एक पाठक जो मेरे जैसे व्यंग्य में मात्र साक्षर हो गया, वो इन व्यंग्यों को अभिमत के परे मानता है। क्योंकि सर का व्यंग्यकार दिमाग जितना सक्रिय है उससे कहीं ज्यादा उनका कवि और शायर मन, लोक रंग को समेटी आशाएं उनके दिमाग की उपज के साथ घुडसवारी करती नजर आती हैं। इस मिजाज में वो हर विषय को नेपथ्य से निहारने की चेष्टा बस नहीं करते वरन जिस कोण से देखने जज्बा दिखाते है उस कोण से विभिन्न आयाम को समेटने का गुणधर्म उनके लेखन में साफ साफ दिखता है। लोक भाषा, बोलियों के देशज शब्द अवध की भूमि की भाषागत महक यह बता देती है कि वो अवधी के सुशील सुपुत्र है ही साथ ही साथ लोक भाषा बोली और देशज संग विदेश भाषा संविलियन में सिद्धहस्त सिद्धार्थ भी है।
उनका व्यंग्य सपात बयान पेश नहीं करता है। वो पाठक को एक कथा के अंदर ले जाकर पात्रों के दवारा वो सब कहला देते हैं जो पाठक सुनना और महसूस करना चाहता है। उनके पात्र पाठक को मनोरंजन देने के साथ साथ, ज्ञानरंजन, लोकरंजन देने का काम करते हैं। उनके व्यंग्य आपबीती से प्रारंभ होकर जगबीती के साथ खडे नजर आते हैं। संवाद की शैली पाठक को जुडने के साथ साथ सोचने और समझने की वैचारिक समझ प्रदान करते है। जाने अनजाने हाशिए में खडे होकर भी पाठक जिस राग को जीवन पर्यन्त अलापता रहताहै वह राग उसे हाशिए से खींचता हुआ केंद्र में स्थापित कर देता है। और यह पाठक की विवशता होती है कि उसे इन व्यंग्यों के साथ कुद को केंद्र में लाना ही पडता है।
ये व्यंग्य अगर भाषाई और विषय गत सुशील हैं तो अपने अंजाम तक पहुंचते पहुँचते वक्र हो जातेहैं। कथ्य सहज होकर भी नुकीला और धारदार लगने लगता है। यदि प्रारंभिक व्यंग्य धारदार हैं तो लघुव्यंग्य उतने ही नुकीले हैं। चुभन देने का काम बडे ही सलीके के साथ कर जाते हैं ये अद्भुत व्यंग्य। मैने जो कुछ भी लिखा वह एक पाठक की तरह से ही माना जाए क्योंकि मै कोई बहुत बडा लेखक नहीं हूँ वरन एक अदना सा अनुज हूं। चाहे मालिस पुराण हो या हाशिए का राग हो दोनो सुशील सर के द्वारा अपनी माटी के कर्ज को उतारने के रूप में देखा जा सकता है। ऐसा महसूस होता है कि उत्तर प्रदेश की माटी की खुशबू दिल्ली के गलियारे से आ रही है। कुछ व्यंग्य जो नाटक के रूप में लिखे गये हैं वो व्यंग्य विधा को शैली के रूप में परिणित करने के लिए नेतृत्व करते नजर आते हैं। ये व्यंग्य परिस्थितियों के साथ न्याय करते नजर आते हैं। ये व्यंग्य पाठक को एक दृष्टि प्रदान करते हैं। अंग्रेजी के शब्दों का इन रचनाओं में उपयोग और बनावटी लहजे से बचकर बेबाकी से बात कहने का गुण अगर लेखक में है तो वह इन व्यंग्यों में झलकता है। विभिन्न आयामों को छूते ये व्यंग्य हाशिए का दंश झेलने वाले पात्रों की जीवंतता को केंद्रित करने में सफल होते हैं। ये व्यंग्य उस धतकरम को पाठकों के सामने लाता है जो नेपथ्य और हाशिए में खामोशी के साथ खटराग करता रहता है।
इन व्यंग्यों में जो अप्रत्याशित रूप से नेपथ्य में खडे लोग और उनसे जुडे घटना क्रम केद्रीय विस्थापन हुआ है। वह व्यंग्य के कुनबों के लिए नवीन है। व्यंग्य की जमात का लेखक इनको पढकर मुख नहीं मोड सकता है। पलायन करने की सोच भी नहीं सकता है। व्यंग्य के कुनबे की मजबूरी हैं कि सुशील सिद्धार्थ के हर उस मिजाज से वाकिफ हो जो उन्होने हर व्यंग्य संग्रह में अलग अलग तेवर के साथ पाठकों के सामने रखे हैं। धार का वार हो या चुभन का दर्द हो या आडंबर के प्रति युद्ध हो इन पर साहित्य के हर लेखक को बात करना ही पडेगा इन व्यंग्यों को अपनी बातचीत और विमर्श में लाना ही पडेगा। यही तो इन व्यंग्य बाणों की सफलता है मित्रों। इस सफलता के लिए जो जिम्मेवार है उसे शुभकामनाएं देने में परहेज इस लिए भी नहीं करना चाहता क्योंकि वो अपने गुरुवर डा ज्ञान चतुर्वेदी जी की तरह ही व्य्ंग्य को हर विधा में एक शैली के रूप में स्थापित करने की राह में अग्रसर हैं।
अनिल अयान सतना
९४७९४११४०७
०२/१०/१७
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