Friday, 7 February 2014

स्वामी विवेकानंद: मनुष्य व्यक्त्तिव निर्माण और विश्व बंधुत्व का अजेय योद्धा.

स्वामी विवेकानंद: मनुष्य व्यक्त्तिव निर्माण और विश्व बंधुत्व का अजेय योद्धा.
  सन्यासी योद्धा श्री बसन्त पोतदार द्वारा स्वामी विवेकानंद पे आधारित मराठी उपन्यास है. और इसी को आधार मान कर यह अनुवाद  गंगाधर परांजपे ने एक पुस्तकाकार के रूप मे योद्धा सन्यासी स्वामी विवेकानंद हमारे सामने प्रस्तुत की है. पुस्तक का भावों का केंद्र बिंदु सन्यासी योद्धा नामक मराठी उपन्यास है इस हेतु श्री बसंत पोतदार जी और भाषागत शिल्प के लिये  गंगाधर परांजपे जी की कलम बधाई के पात्र है.पूरा अनुवाद संग्रह २१६ पेजों मे  और पांच खण्डों मे  विभक्त है. अन्त मे प्रकाशित १५ पेजों मे संचयित चारुगात्र विवेकानंद इस अनुवाद उपन्यास का उपसंहार है जिसके बिना पूरे उपन्यास का अनुवाद अधूरा है.
   प्रथम खण्ड परमहंस- एक परिचय है द्वितीय खण्ड अस्सी प्रतिशत भक्त ठग होते है शीर्षक से अनुवादित है.तीसरा खण्ड धर्मसम्मेलन मे प्रवेश नहीं नामक शीर्षक से अनुवादित है. चौथे खण्ड मे यदि तुम्हारी मां का अपमान किया तो नामक शीर्षक से अनुवादित है. और अन्तिम खण्ड मे विदेश यात्रा के पूर्व शीर्षक से अनुवादक ने अपनी बात कही है.
प्रथम खण्ड मे संत रामक्रष्ण परमहंस के जीवन का सम्पूर्ण वर्णन किया है.इस भाग के जरिये गंगाधर जी ने परमहंस जी का नरेन्द्र से मिलन और उनके जीवन मे माता की संज्ञा  मिली माँ काली के चमत्कारों का जिक्र है.इसमे माँ काली से साक्षत्कार , श्री राम की साधना, रामक्रष्ण का विवाह, भैरवी से मुलाकात, तोतापुरी से मुलाकात, गोविन्दराय से मुलाकात,शंभूचरण से मुलाकात का जिक्र है. नरेंद्र से उनके गुरु की लगातार ३ मुलाकातों का जिक्र है. और अंततः परमहंस के जीवन का त्याग १५-१६ अगस्त १८८६ के आस पास की घटनाऒं का वर्णन है.
द्वितीय खण्ड मे भक्तो की मनो दशा को पाठकों के सामने रखा गया है. जिसमे लेखक और अनुवादक ने परमहंस जी के सम्पूर्ण जीवन काल की घटनाओं को एक खण्ड मे रखकर भक्ति और ढकोसला के भेद की तुलनात्मक बातों को पाठकों के सामने रखा गया है.सन १८९३ के पहले की, विवेकानंद के जीवन की क्रमिक घटनाऒं का मार्मिक और रोचक वर्णन किया गया है.इस खण्ड मे स्वामी विवेकानंद के भारत से विदेश जाने और और वहां के पूर्व उनके संघर्ष को दर्शाया गया है. जब वो राजस्थान मे गये तो उन्हे किस तरह विविदिशानंद का नाम प्राप्त हुआ इसका भी वर्णन पाठकों के सामने आता है. राजस्थान के बाद गुजरात कि यात्रा का वर्णन किया गया है. इसी तरह महाराष्ट्र ,पूना, गोवा, कन्याकुमारी, हैदराबाद,और यहा से अमेरिका के लिये प्रस्थान करने के लिये सारी वैचारिक और समाजिक जमीन का जिक्र बखूबी बेबाकी से किया गया है.
  तीसरे खण्ड मे धर्मसभाओं मे स्वामी विवेकानंद का प्रवेश और उनके विचारों का वर्णन किया गया है.यहा पर १८९३ के बाद की स्वामी विवेकानंद के विदेश मे निर्मित हुयी प्रतिष्ठा और वैचारिक जमीन के निर्माण की कहानी है, इसमे अमेरिका मे हुये सन१८९४ की फ़रवरी मे विरोधियों के द्वारा निर्मित विरोधो का तट्स्थ वर्णन है. इस खण्ड मे  इंग्लैड के किये गये स्वामी विवेकानंद के कार्यों का जिक्र है. और अंततः पुनः अमेरिका और इंग्लैड की यात्रा और वहां पर स्वामी विवेकानंद के समाज सुधार और मानवनिर्माण की शिक्षा का प्रचार प्रसार करने का लेखक और अनुवादक ने सीधे सपाट वर्णन किया है.
  चौथे खण्ड मे स्वामी विवेकानंद ने किस तरह फ़्रांस, रोम,अदन, कोलम्बो, और फ़िर कोलकाता तक पहुचे इससे सम्बंधित घटनाओं का वर्णन है. इसी खण्ड मे विवेकानंद के द्वारा रामक्रष्ण परमहंस मिशन की स्थापना के बारे मे विस्त्रित वर्णन है.इसी चरण मे  स्वामी विवेकानंद की भगिनी निवेदिता से मुलाकात और उनके जीवन मे निवेदिता का प्रवेश, उनके मिशन मे योगदान का वर्णन है, रामक्रष्ण मठ मे हुये विवादो अर्थात गुरुबंधुओं से स्वामी विवेकानंद के विवादो का वर्णन है.जो कुछ दिनो के बाद शांत होगया, इसी चरण मे बीमार स्वामी विवेकानंद का विदेश यात्रा के पूरव की घटनाओं का वर्णन है.
 अंततः अंतिम चरण मे.२० जून १८९९ से शुरू हुयी विदेश यात्रा जिसमे भारत से लंदन और फ़िर इस्तंबूल जाने का वर्णन है.यहां पर उनकी मुलाकात का जिक्र है जिसमे उनकी मुलाकात कु, मैक्लाड या जो से हुयी जो उनके विचारों की मुरीद थी. वापस भारत आकर  ट्रस्ट की स्थापना, बंगाल की यात्रा.४ जुलाई १९०२ को उनके स्वर्गवासी होने तक की हर घटना का बारीकी से वर्णन किया गया है.
अन्तिम कुछ पेजों मे परिशिष्ट के रूप मे स्वामी विवेकानंद के विभिन्न रूपों का ,व्यक्तित्व कॆ विभिन्न पहलुओं का वर्णन किया गया है. जिसमे ब्रह्मचारी, पट्टशिष्य, सिद्धि विरोधी, विज्ञान निष्ठ, दलितों के मसीहा, मांसाहारी होने, हाजिरजवाबी होने, से सम्बंधित विभिन्न घटनाओं का, पत्रो के माध्यम से लोगो के विचारों का संग्रह है. यही स्वामी विवेकानंद के सांगोपांग जीवन की लोगो के द्वारा की समीक्षा है.
 सम्पूर्ण अनुवाद पर यदि बात करें तो यह कहने मे कोई संकोच नहीं है कि पूरी पुस्तक स्वामी विवेकानंद शताब्दी वर्ष मे उनके व्यक्तित्व के प्रचार प्रसार के उद्देश्य से पाठक मंच मे भेजी गयी है. गंगाधर परांजपे जी ने अपनी अनुवाद्कीय मे खुद स्वीकार किया है कि  भावपक्ष के नजरिये से इस पूरे उपन्यास मे सिर्फ़ बसन्त पोतदार की बाओ का बिना कोइ फ़ेर बदल किये वर्णन किया गया है. इस पुस्तक का उद्देश्य विवेकानंद के बहुआअयामी जीवन के बारे मे और उससे जुडे विभिन्न आयामो को पाठको के सामने उजागर करना है.साथ ही यह बताना है कि अनासक्त होकर कर्म मे सतत संलग्न होने का नाम विवेकानंद है. पूरी पुस्तक का केन्द्रबिंदु परमहंस और विवेकानंद है. विवेकानंद की जीवनचर्या के साथ वैचारिक सोच को धर्म,समाज, सभ्यता, जाति वर्णव्यवस्था, शिक्षा, मानव चरित्र निर्माण, विज्ञान और तर्क के क्षेत्र मे पाठको के सामने रखना है. इस अनुवाद मे जस्टिस पलोक बसु का अमूल्य योगदान है. जो स्वामी विवेकानंद के विचारों के मुरीद थे.अंतत: पूरी रचना को पढने के बाद यह आकलन कर सकता हूं कि स्वामी विवेकानंद कोमनुष्य के व्यक्त्तिव निर्माण और विश्व बंधुत्व के अजेययोद्धा के रूप  मे  पाठकों के सामने लाना  ही इस पुस्तक का उद्देश्य है.साथ ही मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण की शिक्षा  ही जीवन की सबसे बडी दीक्षा है. जो स्वामी विवेका नंद का मूलमंत्र है.और इस रचना के कालजयी होने का प्रमुख सूत्र है.पूरी रचना को पाठकों के सामने लाने का प्रमुख उद्देश्य पाठकों के सामने स्वामी विवेकानंद के उदीयमान विचारो को पुनुरुत्थान हेतु सामने लाना है.
अनिल अयान.
सतना म.प्र.
संपादक -शब्द शिल्पी,सतना,
सम्पर्क:९४०६७८१०४०,९४०६७८१०७०

अंतर्मन के द्वंद को मार्मिकता के समुन्दर मे डुबाती कहानियाँ

अंतर्मन के द्वंद को मार्मिकता के समुन्दर मे डुबाती कहानियाँ

जिंदगी एक सधन वन ही तो है जिसमे धूप और छाँव हमसे लुका छिपी का खेल खेलते रहते है जैसे कि जिंदगी में दुख और सुख आते और अपने  मेहमानी करके चले जाते है. जी हाँ यह किसी कहाने की शुरुआत नहीं वरन एक कहानी संग्रह धूप छाँव के संदर्भ में मेरे मन की आवाज है.इस कहानी संग्रह को सतना की सुप्रसिद्ध समाज सेविका और साहित्य में अटूट रुचि रखने वाली श्री मती बेला मीतल ने लिखा है.यूँ तो उन्हे कोई भी कथाकार के रूप में नहीं जानता है.परन्तु यह भी मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस कहाने संग्रह को पढने के बाद हर पाठक उन्हे हमेशा एक अच्छा कथाकार मन से स्वीकार कर लेगा.धूप छाँव काल्पनिक कहानियों का संग्रह नही बल्कि  जीवन की टीस,कसक, अंतर्दंद, मर्म, और अंतर्मन के कुरुक्षेत्र को बेबाकी से बयान करने वाले पात्रों की अशेश दास्तान है. लेखिका ने अपने प्राक्कथन में खुद लिखा है कि" जीवन एक विशाल जटिल और गहन अरण्य है.वहां उसके सुंदर और असुंदर रूप दोनो विद्यमान होते है. हमारी जिंदगी मे समाजिक पक्ष जितना प्रभावी होता है भावनात्मक पक्ष उतना ही मार्मिक होता है , उतना ही याद गार होता है, और इस हद तक जीवन को प्रभावित करता है कि कोई अपने आप कलम उठा कर भाव और यादों को किसी भी विधा में कागज में उतार सकता है. और ताउमर के लिये उन्हे अमर कर सकता है.
 प्रस्तुत कहाने संग्रह सिर्फ चौदह कहानियों का संग्रह है. जिसमे हर कहानी  अपने नये आयाम छूती नजर आती है.विदाई, स्वीकृति,और पापा चले गये, एक मुट्ठी धूप, वादा, दोस्ती,धोखा, इंतजार,थैक्यू माँ, ऐसी कहानियाँ है जो पाठक एक ही बैठक में पढताहै. मानव संस्कृति सभ्यता की दुहायी देने वालों के समक्ष भावो को जीने वाले भावनात्मक रिस्ते बनाने वाले  पात्रों का प्रत्युत्तर देती ये कहानियाँ पाठक को यह संदेश देती है. कि दकियानूसी विचारधारा के चलते भावनात्मक रिस्तों के साथ बलात्कार करने वाले मठाधीश अपने  को भले विजयी मानकर आत्ममुग्ध होते रहें परन्तु वह जीवन अकी सबसे बडी हार को गले लगाकर उसका दंश उमर भर झेलते रहते है. इन कहानियों में लेखिका ने बताया कि हम उम्रभर भ्रम और द्वेश के चलते सच्चे प्रेम के रिश्तों को अपना नहीं पाते और जब हमें इस बात का पश्चाताप होता है तब तक समय बहुत आगे निकल चुका होता है.हमारे पास उस वक्त सिर्फ अफसोस  ही बचता है.
  संग्रह की अन्य कहानियाँ भी समाज में चलते रिस्तों के साथ खिलवाड और मजाक की पेशगी है.ये कहानियाँ भले ही प्रथम कहानी संग्रह हो परन्तु यह भी सच है कि इसमेम ऐसा ;लगता है कि लेखिका ने जीवन के हर छोटे बडे अनुभवों को , जिसने उन्हे अंतरमन में जाकर हृदय के दरवाजों मे दस्तक दी है, कहानी के रूप में उकेर दिया है. और साथ ही कागज मे भावों को साकार रूप दे दिया. अधिक्तर कहानियाँ चरित्र, भाव और घटनाप्रधान कहानियाँ है. इनके गढन ने ऐसा कही भी नहीं लगता कि कोई पात्र अनायास ही कथा में आकर विचलन उत्त्पन्न कर रहा है. कहानी के मापदण्ड मे हर तरह से खरी उतर रही ये कहानियाँ लेखिका को नये आयाम तक , उचाइयों तक ले जाती है. संग्रह की ८०% कहानियाँ जीवन के धूप छाँव के पलों को मास्टर पीस बना दिया है एक समाज सेविका से एक लेखिका बनने के इस सफर मे ये कहानियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती नजर आती है. इन कहानियों को पढने के समय पर ऐसा लगता है कि जैसे मेरे जीवन के उपन्यास के पन्नों से कुछ पल इन कहानियों ने चुरा लिये गये हो. जैसे यह हमारी जिंदगी बयां की जा रही है ऐसा तो हम भी कहना चाह रहे थे.समाज के क्रूरतम व्यवहार के खिलाफ मोर्चा खोलती ये कहानियाँ वह जवाव देती है जिसके सामने सारे सवालात धरासायी नजर आता है. कभी कभी तो मन को यह आभास होता है कि जैसे लेखिका ने अपने  जीवन के भोगे हुये यथार्थ और दंश को हू बहू बयाँ कर दिया है. अंततः मै  लेखिका को एक मार्मिक , गहराई ली हुई , अंतरमन के द्वंद को बया करती कहानियों का कहानी संग्रह पाठकों से समक्ष प्रश्तुत किया है वह काबिले तारीफ है और शुभकामनायें ताकि वो आने वाले वक्त में इसी तरह के मोती पिरोती रहे और हमे नये संग्रह पढने को मिले और अंत में
    हर लफ्ज जिसके जब तह ए दिल मे उतर जाते हों,
    उसके दिल की हर तह कई यादों का कब्रिस्तान होगी.
अनिल अयान,युवा कथाकार

किसकी बपौती नहीं है मुंशी प्रेमचंद्र

किसकी बपौती नहीं है मुंशी प्रेमचंद्र
३० जुलाई को मुंशी प्रेमचंद्र का जन्म दिवस है. सोचता हूँ कि प्रेम चंद्र में क्या था जो हर वर्ग अपना माई बाप मान कर उनके नाम से ऐश करना चाहता है. चाहे प्रगतिशील हों, चाहे वाम पंथी हों, चाहे भारतीय संस्कृति के पोषक संस्थायें हो. और चाहे कायस्थ समाज हो सब प्रेमचंद्र के नाम की सोने की मोहर को लिये भँजाने की कोशिश में लगे होते है. सभी का यह मानना है कि प्रेमचंद्र जैसा युग दृष्टा उपन्यास कार और कहानी कार शायद ही भविष्य में भारत की धरती में भविष्य में पैदा होगा. लेकिन भारत में लोगों की फितरत रही है कि जब भी कोई फर्श में होता है उसकी कोई पूँछ परख नहीं होती है और जब कोई अर्श में होता है तो सब उसे ही अपना माई बाप मान लेता है. यही सब करते चले आये है.
    प्रेमचंद्र जिन्हे कहानी और उपन्यास का चितेरा जादूगर कहा जाता है.उनकी हर कहानी आज भी कुछ न कुछ बयान करती नजर आती है. वो जैसे उस समय भविष्यवाणी करके चले गये थे कि उनके पात्र वर्तमान परिस्थितियों के फ्रेंम मे उसी तरह फिट होंगे जैसे की वो उस वक्त हुआ करते थे. हर पात्र आज भी काल जयी बना हुआ है और भविष्य में भी बना रहेगा. प्रेमचंद्र की कहानी और उपन्यास की फेहरिस्त की बात करें तो शायद आज वह उपयुक्त समय न होगा क्योंकी आज यह बात करना जरूरी है कि जिस व्यक्ति का काम उसके नाम को इतना आँगे बढाया है कि उसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया गया हो. उसके लिये इस तरह की गुटबाजी कहाँ तक उचित है. और कहाँ तक यह बात सही है कि प्रेमचंद्र को लेकर इस तरह के विवाद पैदा करे. प्रेमचंद्र ऐसे कहानी और उपन्यासकार है जिनकी सोजे वतन जैसी कृति स्वतंत्रतापूर्व जला दी गई थी.और उसके बाद से ही उन्होने यह प्रेमचंद्र लबादा ओढ कर अपना लेखनकार्य शुरू किया जो अनवरत चलता रहा. लोग कहते है कि प्रेम चंद्र  कब तक चलेंगें और इस सदी तक लोग प्रेमचंद्र के नाम को जानेगें. उन सब का जवाब यही है कि प्रेम चंद्र वो नाम है जो हिन्दी साहित्य के समापन के साथ ही खत्म होगा. उसके पहले ना वो खत्म हो सकता है और ना कोई खत्म कर सकता है. देश में ही नहीं वरन विदेश में भी जहाँ पर हिन्दीप्रेमी है वो प्रेमचंद्र के दीवाने है. प्रेमचंद्र को भारत देश ही नहीं वरन पूरा विश्व अध्यन कर रहा है. प्रेम चंद्र का कथासम्राज्य इतना विस्तृत है कि कोई पाठक जितना चाहे उतना पढे,उसे गढे और एहसास करे कि प्रेमचंद्र किस कलमकार का नाम है.
   आज प्रगतिशील लेखक संघ,दलित लेखक संघ,हिन्दी साहित्य परिषद,हिन्दी साहित्य सम्मेलन, और कायस्थ समाज जैसे संगठन प्रेमचंद्र के नाम की रोटियाँ सेकने की कोशिश में लगे हुये है. सब प्रेमचंद्र को अपना गाडफादर मान कर उसके नाम की असर्फियाँ भुनाने मे लगे हुये है.प्रगतिशील लेखक संघ ने तो यह सोच रखा  है कि प्रेमचंद्र उसी के नाम पेटेंट है और इसका नाम कोई भी उपयोग नहीं कर सकता है क्योंकि प्रगतिशील लेखकों का मानना है कि प्रेमचंद्र ही वह कथाकार है जिसने हर सर्वहारा वर्ग की पीडा का वर्णन किया है. जो प्रगतिशीलता का सबूत है. इसी तरह दलित लेखक संघ का मानना है कि प्रेमचंद्र उनके माई बाप है जिन्होने दलितो की पीडा अपनी कहानियों में लिखा है,. मै भी मानता हूँ कि उनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन का दर्शन, दलितों की पीडा, और सर्वहारा वर्ग की मार्मिक दास्तान लिखी है और उनकी किसानों के लिये लिखी गयी कथायें अद्वितीय है. पर क्या इसका मतलब यह है कि हम उनके नाम को अपने बाप की बपौती बनाकर नाम का दुरुपयोग करें.क्या यह काफी नहीं है आज भी सरकार ने प्रेमचंद्र सृजनपीठ का गठन करके प्रेमचंद्र का नाम अमर कर दिया है और उस पर कहानियों के लिये काम भी किया जा रहा है.शोध का काम हर जगह किया जा रहा है. मै इतना जानता हूँ कि प्रेमचंद्र को पढना हमारी मजबूरी है यदि हम एक अच्छे पाठक है क्योंकि आज जो लिखा जा रहा है वह अकालजयी है ज्यादा समय तक याद नहीं रहता है. और यदि आज भारत में हिन्दी साहित्य के अंतरगत कहानी और उपन्यास में किसी को पढना है जो आज से कई दशक पहले भी कालजयी था और आज भी कालजयी है ,आने वाले कई दशकों में भी कालजई रहेगा तो हमारी विवशता है प्रेमचंद्र को पढना ही पडेगा.क्योंकी हमारे पास कोई आप्शन ही नहीं है. प्रेमचंद्र की कहानियाँ एक दर्द को बयान करती है जो एक किसान का है, सर्वहारा वर्ग का है, दलित का है, और उस सभी व्यक्ति का है जो दबा और कुचला है अत्याचार से ग्रसित है. यदि इस बिन्दु को लेकर सब अपने अपने तरफ प्रेमचंद्र को खींचना शुरू कर देंगे तो यह दिन दूर नहीं होगा जब प्रेमचंद्र के विचारो को खून के आँशू बहाना पडेगा. और साहित्यकारों को इतना भी वख्त ना मिलेगा कि वह मुंशी प्रेमचंद्र की मैयत मे जाकर आँशू बहा सकें. शायद यही नियति का विधान है. आज के समय मे चाहिये कि बिना उन्हे अपने घर की बपौती माने उनके कार्यों पे चर्चा होनी चाहिये. उनके कार्यों पे शोध होना चाहिये और ऐसे कार्य होने चाहिये कि जिस पर सभी को गर्व हो जिसको आगामी पीढी अनुगमन कर सके और यह जान सके कि भारत का साहित्यिक इतिहास कैसा था. यदि हम इसी तरह गृह युद्ध मचाते रहे तो वह दिन दूर नहीं है जब प्रेमचंद्र की विचारधारा इन विभिन्न पंथियों के घर में टंगे मृग खाल की तरह हो जायेगी और पाठक बेचारा विवश होगा साहित्य मे मचे यह कुरुक्षेत्र का साक्षी बनने के लिये.
अनिल अयान,सतना

परसायी की नजर में.... डरना मना है.....

परसायी की नजर में.... डरना मना है.....अनिल अयान,,,,,,सतना,
हरिशंकर परसायी को पढना आज के समय की जरूरत है. उन्होने जो लिखा , जैसा लिखा , जिस समय लिखा वह इतना महत्व नहीं रखता है जितना कि यह महत्व रखता है कि उसकी जरूरत आज भी बहुत ज्यादा है. आज के समय में उनकी रचनाये एक आईने की तरह काम कर रही है. और यह भी सच है कि समाज की विशंगतियों के सामने उसके जैसा कलम का योद्धा ही है जो बिना हार माने आज भी खडा हुया है. लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनॅतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। उनकी भाषा–शैली में खास किस्म का अपनापन है, जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सामने ही बैठा है. और उसकी विवशताओं के साथ अपने को साथ रख कर आक्रोशित भी होता है और दुखी भी होता है.हम चाहें कहानी संग्रह हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे, भोलाराम का जीव, पढे. या फिर नागफनी की कहानी, तट की खोज, ज्वाला और जल ,तब की बात और थी भूत के पाँव पीछे, बईमानी  की परत, पगडण्डियों का जमाना,शिकायत मुझे भी है ,सदाचार का ताबीज ,प्रेमचन्द के फटे जूते, माटी कहे कुम्हार से, काग भगोड़ा,  वैष्णव की फिसलन ,तिरछी रेखाये , ठिठुरता हुआ गड्तन्त्र, विकलांग श्रद्धा का दौरा |सभी में आज के समय में चल रहा भ्रष्टाचार, पाखंड , बईमानी आदि पर परसाई जी ने अपने व्यंगो से गहरी चोट की है | वे बोलचाल की सामन्य भाषा का प्रयोग करते है चुटीला व्यंग करने में परसाई बेजोड़ है |हरिशंकर परसाई की भाषा मे व्यंग की प्रधानता है उनकी भाषा सामान्यबी और सरंचना के कारण विशेष शमता रखती है |  उनके एक -एक शब्द मे व्यंग के तीखेपन को देखा जा सकता है |लोकप्रचलित हिंदी के साथ साथ उर्दू ,अंग्रेजी शब्दों का भी उन्होने खुलकर प्रयोग किया है |पारसायी के  जीवन का हर अनुभव एक व्यंग्य रहा है. परसाई ने अपने जीवन के अनुभव को रचनाओं में उकेरा है. समाज की विशंगतियों को अपने नजरिये से देखा है. उसे कलम की ताकत से दबोचा है, और फिर पोस्टमार्टम करके पाठकों के सामने रखा है. आज परसाई नहीं है आज भी उनकी रचनाओं को मंचन किया जा रहा है. आज भी उनके दरद . उनके रचना कर्म को समझ कर समाज को दिखाया जारहा है.उन्होने समाज के हर उस धतकरम को ललकारा है.चुनौती दी है और उसके खिलाफ आवाज उठाई है जिसमें आम लेखक और कलम कार अपनी कलम फसाने को जान फसाने की तरह मानते है.हरिशंकर परसाई ने बता दिया है कि व्यंग्य वह विधा है और उस कंबल की तरह है जो शरीर में गडता तो है परन्तु समाज को ठंड से बचाता भी है. उनकी हर रचना कालजयी है. और भविष्य़ में भी रहेगी. जब तक इस समाज में मठाधीश रहेंगें और आम जनों के चूल्हे में अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेंकते रहेंगे. तब तक हर रचना दरद अत्याचार बेबसी और विवशता को चीख चींख कर बयान करती रहेगी. पारसाई वो कलम कार है जिन्होने साहित्यकारों को भी आडे हाथों लिया है. उन्हे बहुत गुस्सा आती थी जो साहित्यकार सम्मान के पीछी भागता था. उनका मानना था, कि हर अच्छे कलमकार का वास्तविक पुरुस्कार पाठकों और समाज के द्वारा दिया जाने वाला सम्मान है. बाकी सब तो चाटुकारिता के अलावा कुछ नहीं है. आज के समय में जो घट रहा है वह परसाई ने पहले हीं भाँफ लिया था.
आज के समय के लेखकों का यह मानना है कि परसाई ने जो भी किया वह सिर्फ उनके समय की माँग थी और कुछ नहीं जो भी लिखा गया वह सिर्फ उनहे मन के फितूर के अलावा कुछ भी नहीं है. परन्तु यह नहीं है. उन्होने अपनी रचनाओं में प्रगतिशीलता की बात की है. और उन प्रगतिशीलों की लंगोट को विशेश रूप से जाँची है जिन्होने प्रगतिशीलता के नाम पर अस्लीलता और नंगेपन को ओढा हुआ है और इसको साथ में रखना और रचनाओं में दिखाना अपनी प्रतिष्ठा का मूल मंत्र समझते है.परसाई देखते है कि वो अपनी लंगोट को कितना सूखा रख पाने में सफल है इस तरह की प्रगतिशीलता का केशरिया चोला ओढने के बाद. सच तो यह है कि परसाई उस प्रगतिशीलता को अपनाये हुये थे जो समाज को परिवर्तित कर नये आयाम से जोड सके परन्तु आज के समय में इस प्रथा को लेकर है अपने अपने झंडे और डंडे गाडे उनके नाम को कैश कर रहे है और उस पर सरे आम ऐश कर रहे है. आज के समय में प्रेमचंद्र और परसाई समाज की जरूरत है और माँग जब ज्यादा हो तो जरूरी है कि सही रूप में हम आगामी पीढी को विरासत का सही रूप सही सलामत सौपें नहीं तो आज तक इतिहास लिखने वाले प्रभावी रहे है. और साहित्य का इतिहास भी इसी तरह से मठाधीशों के हाथ के द्वारा लिखा जायेगा तो परसाई जयंतियों में याद करने के योग्य ही बचेगें आज के समय में हर पाठक को परसाई को प्ढना चाहिये जिससे उसके ह्रदय में जल रही आग की गर्मी को कुछ सुकून मिलेगा.....उसकी प्रमुख वजह यह है कि परसाई ने हमारी सामाजिक और राजनॅतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को बहुत ही निकटता से पकड़ा है। ......

लोककलाकारों के जीवन संघर्ष और लोक संस्कृति के उत्कर्ष की लोकगाथा:खम्मा

लोककलाकारों के जीवन संघर्ष और लोक संस्कृति के उत्कर्ष की लोकगाथा:खम्मा
पुस्तक:खम्मा(उपन्यास),लेखक:आशोक जामनानी, होशंगाबाद, समीक्षा: अनिल अयान,सतना, म.प्र.
श्री आशोक जामनानी की बूढी डायरी और छपाक छपाक की पृष्ठभूमि से ज्यादा प्रभावी और रोमाँचक उपन्यास खम्मा राजस्थान के पश्चिमी भाग माडधरा में बसने वाले लोकसंगीत को संजोने वाले मांगणियार लोगो की संस्कृति सभ्यता और विरासत को सहेजने की प्रभावी प्रस्तावना है. राजस्थान के इन लोककलासाधकों के द्वारा की जाने वाली गंगा जमुनी तहजीब के पालन पोषण तथा उत्सवों में उनकी महत्ता को उपन्यासकार ने अपने मुख्य पात्र बींझा की माध्यम से माडधरा को चूमते हुये घडी खम्मा कर अगाध सम्मान दिया है. इस उपन्यास में उपन्यासकार ने जहाँ एक ओर माडधरा की लोकसंस्कृति के संरक्षक मांगणियार  जाति के जीवन को गहराई से उकेरा है  वहीं दूसरी ओर लोककला के बिचौलियों व दलालों के द्वारा किये जारहे शोषण को भी उपन्यास के माध्यम से समाज और सत्ता को यह संदेश दिया है. कि यदि लोक संस्कृति की रक्षा नहीं की गई तो यह विदेशियों के द्वारा बलात्कृत करके हथिया ली जायेगी. और भारत की यह विरासत सरे आम आत्महत्या करने को  मजबूर हो जायेगी.
            कथा का प्रारंभ बींझा नाम के युवा लोकगीतगायक जो मांगणियार जाति का नेतृत्व करता है, और उसके जमींदार मित्र सूरज के मिलाप से होता है. सूरज जमींदार घराने का युवाराजकुमार है जिसकी पत्नी प्राची का बस एक्सीडेंट में मौत हो गई है और वह बहुत ही एकाकी और तन्हाई का जीवन जी रहा है. बींझा की मित्रता उसे एक बहुत बडा मनोवैज्ञानिक सहारा देता है.सूरज बींझा के गीतों का मुरीद है और वह बींझा की हर कदम में मदद करता है.बींझा की धर्मपत्नी का नाम सोरठ है जो उसके संघर्षपूर्ण जीवन की सच्ची सहचरी होती है.बीझा के साथ उसके बुजुर्ग काका भी रहते है. जिनका साथ पाकर परिवार और मजबूत होता है.उनका नाम मरुखान है.परन्तु कहानी उस समय पहला मोड लेती है जब सूरज बींझा को एक दिन १ लाख रुपये एक लिफाफे में बंद करके देता है और गाँव छोडकर बिना बताये चला जाता है जब मरुखान को पता चलता है तो वह उन रुपयों से खरीदारी करता है. परन्तु बींझा को यह बात अच्छी नहीं लगती. और वह इस बात का गुस्सा सोरठ पर उतारता है. बाद में उसे इस बात की ग्लानि भी होती है.इसके बाद से ही बींझा भी उदास रहने लगता है और परिणाम स्वरूप वह अपने मित्र बिलावल के पास जोधपुर पहुँच जाता है.वह घर वालों को कोई सूचना भी नहीं देता है.वह बिलावल से काम की माँग करता है.बिलावल उसे अपने साथ मेहरानगढ ले जाता है और अपने गाइड के काम से उसे परिचय करवाता है.परन्तु बिलावल के साथ वह बहुत ही ऊब जाता है.कई दिनों के बाद बिलावल उसे कालबेलिया जाति की लोक नृत्यिकाओं सुरंगी और झाँझर से मुलाकात करवाता है.बिलावल की तारीफ से सुरंगी बींझा को अपने साथ रखने को तैयार हो जाती है. सुरंगी एक संघर्षशील गाने बजाने वाली महिलापात्र है. जो भावनात्मक सहारा देकर बींझाको मजबूत करती है. वह उसे बालेसर ले जाती है. उसके साथ बात करतीहै. और अपनी खींवा की कहानी बताती है. जो उसका पूर्व पति होता है. वह बताती है कि इस तरह खींवा चरित्रहीनता का विष पीकर सुरंगी को छोडकर गैर औरत के पास चला जाता है.यहीं पर बींझा का परिचय झाँझर से होता है.वह भी बातों बातों में अपने जीवन की दर्दनाक कहानी बींझा से साझा करती है.यहीं पर पता चलता है कि बिलावल किस तरह उन दोनो की मदद किया था.और अंततः बींझा भी अपने हुनर की दास्ताँ उन दोनो को बयां करता है.इस तरह तीनों के बीच का नाजुक रिश्ता बहुत ही मजबूत हो जाता है.अपना नया सफर शुरू करने से पहले वह सुरंगी की अनुमतिसे अपने परिवार से मिलने गाँव वापिस लौटता है.अपने परिवार के मना करने के बावजूद वह वापिस जैसलमेर पहुँच जाता है. और सुरंगी के साथ रुपया कमाने मे लग जाता है.काम से जीचुराने के चक्कर में वह सुरंगी से डाँट भी खाता है. परन्तु सही समय में उसे अपने जीवन का संघर्ष समझ में आजाता है.एक दिन सुरंगी उसकी मुलाकात विदेशी महिला पर्यटक गाइड क्रिस्टीन से करवाती है जिसका काम विदेशियों को भारत में दर्शनीय स्थलों के बारे में बताना और दिखाना.सुरंगी के मुँह से बींझा की तारीफ सुनकर उसे अपने साथ रख लेती है.क्रिस्टीन की टीम बींझा के साथ रह कर खूब मनोरंजन करती है. दिन गुजरते है और क्रिस्टीन बींझा के साथ अपना ज्यादा समय बिताने लगती है और इसी बीच उनका यह रिस्ता शारीरिक संबंधों की परवान चढने के प्रस्ताव तक पहुँचता है. जिसको पहले ठुकरायेजाने के बाद बींझा के द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है.प्रेम जीवन में परवान चढने लगता है.बाद में समझ में बींझा को आता है कि वह सिर्फ समय गुजारने और अपने शारीरिक भूख मिटाने के अलावा कुछ नहीं अर्थात उसे शारीरिक मनोरंजन का साधन के रूप में क्रिस्टीन इस्तेमाल करती है एक दिन क्रिस्टीन से उसकी काफी बहस होती है और वह अंततः बिन बताये विदेश वापिस लौट जाती है और बदले में बीझा को बहुत सा रुपया दे जाती है.बींझा काफी टूट जाता है और वह अपने गाँव वापिस लौट जाता है. उसके मन की दश सोरठ से छिपती नहीं है. तभी बींझा सोरठ का रात्रि में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिये सहयोग का आग्रह करताहै परन्तु वह आग्रह सोरठ के द्वार नकार दिया जाता है और नाराजगी भी दिखाई जाती है..कई दिन गुजरने ले बाद सुरंगी उससे मिलने आती है. उसके द्वारा किया गया मनोवैज्ञानिक सहारा बींझा को और संबल प्रदान करता है. इसी उद्देश्य की पूर्ति के बाद सुरंगी अपने शहर वापिस लौट जाती है.समय गुजरता है तभी सूरज का पुनः बींझा के जीवन में आगमन होता है.  यह आगमन बींझा को और मजबूत बनाता है. वह सूरज से विदेश जाने की बात रखता है और सूरज उसे अपने साथ दिल्ली ले आता है. रास्ते में पता चलता है कि सूरज की जिंदगी में प्रतीची नाम की डाक्टर आ गई है. जो सूरज को प्राची के सदमें से बाहर निकाल देती है. और वही बींझा को भी क्रिस्टीन के प्रेम वियोग से बाहर निकालती है.सूरज ब्रिजेन नाम के एक दलाल से बींझा का मिलना तय करता है. और ब्रिजेन बींझा का गाना सुनने के बाद उससे काफी प्रभावित् होता है. और उसे विदेश ले जाने की अनुमति दे देताहै. बातों ही बातो में ब्रिजेन बताता है कि वह भी मणिपुर का एक लोक गायक है और प्रगति की लालच ने उसे एक दलाल बना कर छोड दिया.वह बताता है कि शोहरत हमसे हमारा अपना सब कुछ छीन लेतीहै.बींझा उससे अपने उद्देश्य में अडिग रहने का विश्वास दिलाता है. अंत में बींझा के द्वारा अपने बजाये जाने वाले कवायच को सीने से लगाये जाने की घटना इसकी शुरुआत करती है और कथा की समाप्ति करती है.
            पूरे उपन्यास में नारी पात्रों का जिक्र करें  तो भारतीय नारी पात्र पुरुषवादी सत्ता के प्रति संघर्ष करते उपन्यास में नजर आते है.चाहे वह झाँझर हो, सुरंगी हो, या फिर सोरठ हो. यह सब पुरुष की सामाजिक मानसिक फिसलन से पीडित महिलाये है. परन्तु संघर्ष ने इन्हे एक निर्णायक के रूप में उपन्यास में जगह बनाने में सफल बनाया है.क्रिस्टीन का चरित्र विदेशी संस्कृति में खुले सेक्स, नशे और कमाऊ प्रवृति को उजागर करता है. उसके रग रग में शोषण करना और सेक्स को मनोरंजन मान कर उपभोग करना ही उपन्यास की एक और खासियत है,सोरठ का चरित्र सूरज का चरित्र बींझा के लिये एक रीड साबित होता है जो  रिस्तों की बारीकियों को समझने और उनके बीच समान्जस्य बिठाने में बींझा की मदद भी करता है.अंततः उजागर हुआ परनतु ब्रिजेन का चरित्र शोहरत के सामने मजबूर लोक कलाकार का चरित्र है जो लोकसंस्कृति को छोड कर  वैश्वीकरण की ओर पलायन करने के लिये मजबूर है. और बीझा वह केन्द्रीय पात्र है जिसके चारों ओर सभी पात्र अपनी अपनी विवशता  की गाथा के साथ गुथे हुयेहै.बींझा का महत्वाकांक्षी हो जाना उपन्यास में उसकी मजबूरी और स्वाभिमान को प्रदर्शित करता है.पूरा उपन्यास लोक संस्कृति के बचाव करने वाले लोक कलाकारॊं  के जीवन संघर्ष, बिचौलियों के द्वारा शोषण के शिकार, और पारिवारिक लचरता के साथ साथ संस्कृति को सुरक्षित रखने की जिम्मेवारी को निर्वहन करने तथा रिस्तों के निस्वार्थ संवहन और संवरण  की मार्मिक गाथा है.पूरे उपन्यास की वाक्य संरचना संवाद परिस्थिति जनय चित्रण राजस्थान की धरती ,बोली जीवन चर्या को पाठक के सामने लाने में सफल होती है.बीच बीच में पात्रों के मुख से लोकगथाये और जातक कथाओं का जिक्र उपन्यास को ऐतिहासिकता के और करीब लाता है.बींझा के द्वारा गाये गये लोकगीत पाठकों को राजस्थान की माडधरा की खुशबू को महसूस करने तथा राजस्थानी बोली दरिया के तिलिस्म को पहचानने का संबल देती है.पूरा उपन्यास मागणियार जाति के लोककलाकारों के जीवन संघर्ष और लोक संस्कृति के संरक्षण के दायित्व निर्वहन करने के बीच के संघर्ष को पाठको के सामने लाने मेंसफल रहाहै.पात्रो के नाम भी माडधरा के गर्भ से खोजे गये है जो लोक गीतों में अधिक्तर उपयोग किये जाते रहे है. परन्तु मुझे फिर एक बार महसूस होता है कि पूर्व उपन्यासों की भाँति इस बार भी अन्य पात्र अपने अनकहे  परिणाम के साथ उपन्यास में शामिल रहे उनके जीवन की अनकही गाथा पाठकों को पुनः प्यासा और जिग्यासा से पूर्ण कर देती है.उपन्यास बूढी डायरी की भांति लोक संस्कृति का पोषण करने वाला है जो पाठकों की चेतना को लोक संस्कृति के और करीब ले जाता है. उपन्यास कार को इन्हीं सफलताओं की बधायी देकर लेखनी को विराम देता हूँ.
अनिल अयान ,सतना.म.प्र,
मारुति नगर सतना.

सम्पर्क:९४०६७८१०४०,९४०६७८१०७०स

फ्लर्ट

फ्लर्ट sameeksha by anil ayaan


फ्लर्ट को पढते पढते मुझे प्रतिमा खनका के लेखन से पहली बार परिचय हुआ.ऐसा लगा की किसी फिल्म की पटकथा से परिचय हो रहा है. प्रतिमा जी ने अपनी ज्यादा उमर ना होते हुये भी फ्लर्ट की इतनी अलग ह्टकर व्याख्या की वह किसी शब्दकोश में शामिल नहीं है. कभी कभी यह भी लगता है कि यह व्याख्यात्मक भाबना कहा तक सर्वमान्य है. क्योंकि इस  समाज में जो फ्लर्ट की व्याख्या की जाती है वह ऐसा बंदा होता है जो अपनी जिंदगी के विकास के लिये किसी भी दिल के साथ खिलवाड कर सकता है.वह किसी का भी इस्तेमाल कर सकता है.परन्तु लेखिका ने अंश नाम के मुख्य पात्र के माध्यम से यह बताया है कि समाज की वह परिभाषा गलत है. पूरी कथा में अंश का किरदार यह बताता है कि वह इंशान भी फ्लर्ट की श्रेणी में आता है. जिसे उसके हालात ,चालें और उसके फैसले अपनी इच्छा से चलाते है.जिसका खुद का विश्वास कई बार टूटा हो, जो खुद के फैसलों के अनुसार बदल जाते है.जिसके दिल से और खेल जाते है जिसका इस्तेमाल अन्य लोग कई बार कर करते है वो लोग भी फ्लर्ट की श्रेणी में आते है.यह उपन्यास एक मजबूर मध्यम वर्गीय परिवार के लडके अंश की जिदगी की दास्तान है जो बहुत ही स्मार्ट है और लडकियों से अपने को बचाने के चक्कर में खुद बखुद लडकियों के प्रेम प्रसंग में परत दर परत वख्त दर वख्त कैद होता चला जाता है वह एक फैशन माडल बन जाता है परन्तु इस मुकाम तक पहुँचने के लिये उसे अपने दिल की भावनाओं को गिरवी रख देता है और बाद में दूसरे की खुशी और सफलता के लिये खुद का इस्तेमाल करवाने के लिये हंसते हंसते हाँ भी कर देता है.
            कथा वस्तु की बात करे तो अंश जो मुख्य किरदार है वह एक मध्यमवर्गीय परिवार का युवा विद्यार्थी है जिसकी मा और बहन है पिता जी का देहांत हो गया है. वह स्कूल की पढाई कर रहा है. उसके दोस्त समीर और मनोज उसे हमेशा लडकियों के बारे में बताते रहते है. वहीं पर उसकी मुलाकात होती है प्रीति से जो उसके जिंदगी की सबसे ज्यादा करीब और बाद में उसकी मंगेतर भी बन जाती  है परन्तु अंश की माडलिंग के नित नये किस्से उसे मजबूर कर देते है कि वह अंश की पत्नी बन पाने में असमर्थ पाती है. स्कूल खत्म होने के बाद अंश माडलिंग आडीशन में चयनित होकर यामिनी के साथ और संजय के साथ मुम्बई जाता है और वहाँ पर यामिनी के सौन्दर्य पर आकर्षित हो जाता है परन्तु दिल टूटने के पहले उसे पता चलता है कि यामिनी शादीशुदा महिला है जो अपने पति की सहमति से यहाँ माडलिंग कर रही है. और जल्द ही और गैर मर्द के साथ शादी रचाकर जापान शिफ्ट हो जाती है और जब वह अंश की जिंदगी में वापिस लौटती है तो अंश की औलाद के साथ और यह वजह ही अंश की पत्नी सोनाली की आत्म हत्या करने का कारण बनता है.
अंश की जिंदगी में यामिनी से पहले जब वह काल सेंटर में काम कर रहा होता है तब कोमल नाम की लडकी भी आती है वह अंश से बेहद प्यार करती है परन्तु अंश नहीं. परिस्थितियाँ अंश को मजबूर करती है कि वह कोमल को उसकी जान बचाने के लिये यह कहे कि वह उससे प्यार करता है.और यही झूठ उसे फिर से फ्लर्ट शाबित कर देता है.अंश का मुम्बई मे माडलिंग के चलते डाली,योगिता और अर्पणा जैसी महत्वाकांक्षी लडकियों को सफलता के शिखर में पहुँचाने के लिये मजबूरी में और अपने मित्र संजय के विकास के लिये मानसिक दैहिक और समाजिक शोषण करना पडता है.अंश जब हर जगह से हार जाता है और एकाकी हो जाता है तब उसे उसी शहर की अमीर घर की लडकी सोनाली से मित्रता का प्रस्ताव मिलता है वह प्रस्ताव के लिये भी संजय जिम्मेवार होता है क्योंकि इसी बहाने उसके नये स्टूडियो का आर्थिक मददगार सोनाली के पिता उसे मिल जाते है. परन्तु सोनाली अंश में इतना डूब जाती है कि वह अपने अंश के रिस्तो की पब्लिसिटी कर देती है.और अंततःवह सोनाली सेशादी करने के लिये राजी हो जाता है परन्तु जब सोनाली को यह पता चलता है कि यामिनी उसके बच्चे की माँ बनकर वापिस उसकी जिंदगी में में आती है और अनजाने ही एक रिकार्डिंग मे संजय और अंश की चालाकी भरे शब्द सुन कर आत्म हत्या कर लेती है परन्तु नाकाम रहती है. इस तरह अंश नाम का मासूम सा शिमला का बच्चा अनजाने मुकाम पाने के लिये लडकियों के फ्लर्ट के लिये पूरे देश में मसहूर हो जाता है.
            पूरे उपन्यास में प्रतिमा जी ने जो भी बताना चाहा है वह तो उन्होने यह स्पष्ट कर ही दिया परन्तु अनजाने में यह भी बता दिया कि युवा वस्था का उठने वाला तूफान या तो किनारे लगा सकता है या सब कुछ अपने साथ बर्बाद भी कर सकता है. कोमल का प्यार, डाली और अन्य माडल्स का अपनत्व सिर्फ एक दिखावा था. कोमल चाहती तो अपने प्यार को बचासकती थी परन्तु गलतफैमियां उसे और प्रीति के प्यार को कुर्बान कर दिया. यामिनी का प्यार बार बार यह बताता है कि प्यार करने की कोई उमर नहीं होती. वह शादी के पहले और शादी के बाद भी किसी से हो सकता है अपने से अधिक और अपने से कम उमर के साथी से. सोनाली का चरित्र में यह बताता है कि अपनी जिंदगी के प्रति गरीब ही बस नही अमीर घर की लडकियाँ भी संजीदा होती है.संजय का चरित्र यामिनी का चरित्र पाठकों को यह  बताता है कि आज के समय में फ़ैशन उद्योग में किस तरह लोग अपनी स्वार्थपरता के लिये मित्रो के विश्वास का गला घोंट देते है. अंश का चरित्र बार बार चींख चींख कर पाठक से यह बात कहता है कि हमें अपने माता पिता की सलाह पे भी काम करना चाहिये.अपनी इच्छा से जो मन कहे उसे कैरियर में चुनना चाहिये.किसी दोस्त के बहकावे में नहीं आकर जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिये.
            उपन्यास युवा पीढी में फैले प्रेमरोग और आकर्षण में विभेद करने में असमर्थता की गाथा बखान करता है.यह युवा वर्ग को बार बार अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने की सलाह देता है.और सबसे बडी बात यह बताता है दिलों से खेलना हमेशा कोई फैशन नहीं होता कभी कभी दिल मजबूरी में किसी से अनजाने खेल में शामिल हो जाता है और कभी किसी के द्वारा खेल लिया जाता है, प्रतिमा जी २९ वर्ष की उमर में यह उपन्यास पाठकों के बीच रखकर युवापाठकों की संख्या में इजाफा किया है.साहित्यिक सरोकार समाज चेतना में हो सकता है कि यह इतना खरा ना उतरे शीर्षक की हिन्दी बाहुल्यता का अभाव भी कहीं ना कहीं इसके प्रसिद्धि में एक रोडा जरूर बन सकती है.

राजनैतिक रेगिस्तान से निकला कवि मन का आक्रोशित स्वर

राजनैतिक रेगिस्तान से निकला कवि मन का आक्रोशित स्वर
न दैन्यं ना पलायनम पं अटल बिहारी वाजपेयी के कवि कर्म की रचनाधर्मिता का खुला प्रमाण है. एक राजनीतिज्ञ,सांसद,संपादक,स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और अंततः प्रधानमंत्री के दायित्वों के बाद सब द्वंदो के मध्य कवित्व का मर्म हृदय में वास करना राजनैतिक रेगिस्तानी दलदल में कहीं मीठे जल की सरिता के उद्गम की तरह जान पडता है. पुस्तक १०३ पॄष्ठों की है. जिसका संपादन डाँ चंद्रिका प्रसाद शर्मा ने किया है.
            पुस्तक में तीन खण्ड है जिसमें प्रथम खण्ड में संपादित की गयी वाजपेयी जी द्वारा लिखित पदबद्ध कविताये हैं और द्वितीय खण्ड तथा तृतीय खण्ड में वायपेयी  जी का जीवन वृत एवं साक्षात्कार है.पुस्तकनुमा इस कृति का मूल स्वर प्रथम खण्ड है जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी के मन के मर्म में दबे आस्था के स्वर,चिंतन के स्वर, आपातकाल के दंश के स्वर,और विविध स्वर के अंतर्गत ५२ कवितायें संग्रहित है. इसमें अधिक्तर कवितायें सुर,लय,तालय्क्त गेयता लिये हुये छंद बद्धता का पीछा करती नजर आती है जो आज की प्रगति और प्रयोगवादी कविताओं से भिन्नता लिये हुये है.इस संग्रह में उन्होने अपने भाव पक्ष के संदर्भ में खुद लिखा है कि विविधता के नाम पर विभाजन को प्रोत्साहन देना सबसे बडी भूल है. यह प्रादेशिक नहीं होसकता है. हम एक राष्ट्र मेम रहने के कारण एक नहीं वरन  हमारे विचार एक है इस लिये हम सब एक है.जो देश को एक बंद मुट्ठी की तरह मजबूत बनाता है.भावपक्ष की बात करें तो आस्था के स्वर में विभिन्न विषय राष्ट्र प्रेम,हिन्दी भाषा के प्रति लगाव और जीवन दर्शन अ के प्रति अमिट सोच को उभारा है.उन्होने जीवन के कुरुक्षेत्र और जीव को अर्जुन की भाँति माना है लगातार उद्घोष करने के लिये ,आँगे बढने के लिये कहा है. इन पक्तियों को देखें.
            आग्नेय परीक्षा की इस घडी में
            आइये अर्जुन की तरह उद्घोष करें
            ना दैन्यं ना पलायनम
ना दीन बनूँगा और ना ही पलायन करूँगा,अंत तक लडता रहूँगा.एक सफल जीवन जीने का यही संदेश है,उन्होने स्वाधीनता विनोवा भावे,कवियों राष्ट्रभाषा आदि पर बहुत सी कुंडलियाँ लिखी है.चिंतन के स्वर में अंतर्मन की वेदना ,सत्यनिष्ठा ,स्वराज, की कवितायें चतुष्पदी और कुंडलियों में बंधी हुई है.आपातकाल के स्वर में आपातकाल के भयावह  दॄश्यों को पँक्तियों की भाव भंगिमाओं में संजोया गया है. जिसमें अनुशासन पर्व,अंधेरा कब जायेगा,भूल भारी की भाई,मीसामंत्र महान.विविध स्वर में समाजिकविसंगतियों,पर्वों,पर्यावरण,वृद्धों तथा अन्य विषयों पर कवि ने कलम चलायी है. इस पूरे खंड में  प्रथम स्वर और आपात काल का स्वर कवि की लेखनी की ताकत  को पाठकों के समक्ष  रखता है परन्तु विविध स्वर में इस पुस्तक की गरिमा में खटास सा पैदा करता है. क्योंकि भाषा शैली और भाव पक्ष बहुत हल्का और सतही महसूस होता है जिसे अन्य तीन स्वरों मेम डीठ की तरह ही मान सकते है.
            पुस्तक का दूसरा और तीसरा भाग परिशिष्ट और साक्षात्कार सर्ग है जिसमें संपादक शर्मा जी ने वाजपेयी जी के जीवन वृत्त,उनकी शिक्षा दीक्षा,राष्ट्र स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और १९३९ सन से कविता के प्रति झुकाव को भी पाठकों के सामने लाया है.अटल जी ने संपादक के रूप में राष्ट्र धर्म,पांचजन्य,दैनिक स्वदेश, चेतना,वीर अर्जुन,आदि पत्रों को सम्हाला है.उनके अभिनंदन,सम्मान,में नजर डालें तो, हिन्दी गौरव,पद्मविभूषण, और अन्य सम्मान से भी विभूषित किया गया है.प्रकाशित रचनाओं में मृत्यु या हत्या,अमरबलिदान,कैदीकविराय की कुंडलियाँ.अमर राग है,मेरी इक्यावन कवितायें,राजनीति की रपटीली राहें,सेक्युलरवाद,शक्ति से क्रांति,न दैन्यं न पलायनम, नई चुनौतियाँ नया अवसर, आदि का जिक्र इस पुस्तक में मिलता है.संपादक ने साक्षात्कार में पाठकों के सामने यह रखा है कि अटल जी को साहित्य विरासत के रूप में श्याम लाल वाजपेयी वटेश्वर पिता जी और अवधेश वाजपेयी बडे भाई से मिला था. प्रसाद,निराला,नवीन, दिनकर,माखनलाल चतुर्वेदी जैसे कवियों, जैनेंद्र, अज्ञेय,वॄंदावन लाल वर्मा, तसलीमा नसरीन, जैसे लेखकों भरत,जगन्नाथ मिलिंद रामकुमार वर्मा जैसे नाटककारों के मुरीद है.साहित्यकार से उनकी अपेक्षा और साहित्यकार को राजनीति के लिये सरोकार के लिये उनका अभिमत मुझे ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाया.समाजिक समरसता के लिये उनकी विचारधारा उच्चकोटि की है. इस पुस्तक में"कवि आज सुना वह गान रे" गीत है जो१९३९ में अटल जी नें नौवीं कक्षा में अध्ययन के दौरान लिखे थे.उनकी एक कविता युगबोध में भी राष्ट्र कवि,निराला,दिनकर के, क्रमशः साकेत,राम की शक्ति पूजा, और उर्वशी को विशिष्ट प्रकार से उद्धत किया गया है.इस कविता संग्रह ने अटल बिहारी वाजपेयी का लेखक और कवि होने को चर्चित हस्ताक्षर,खोजी पत्रकार,संपादक,और अंततः राजनीतिज्ञ के रूप में एक कदम और आगें बढाया है. कविता संग्रह के माध्यम से शर्मा जी ने अटल बिहारी वाजपेयी जी के काव्य के माध्यम से पाठकों को यही संदेश देना चाहा है कि  न कभी मन में दीनता रखो ना कभी जीवन रण से पलायन करो.इस पुस्तक का बारहवाँ संस्करण है इस तथ्य के पश्चात ज्यादा टिप्पणी करना अनुचित है.परन्तु एक कवि होने के नाते मुझे लगता है कि अटल जी की कवितायें एक व्याकरणिक छंद बद्धता के  मर्म को स्पष्ट करती है.परन्तु आज के समय पर प्रताडित आम जन सर्वहारा वर्ग,शोषित लोगों की पीडा का बखान करने में प्रतिनिधित्व करती नजर नहीं आती है. वही नौकरशाही,भ्रष्टाचार,खाये अघाये लोगों का विषय पुराना सा नजर आता है.स्त्री और युवाओं का विमर्श भी इस पुस्तक से अनुपस्थित नजर आता है.जो विषय पहले उठाये जा चुके है या उठाये जाते रहे हैं उनके साथ ही इस पुस्तक की इति श्री हुई है.लेखक ने पाठक को इस पुस्तक के माध्यम से यह बताया है कि राजनीति में शामिल होकर भी कविताये लिखी जा सकती है.परन्तु चिंतन के लिये समय की अल्प अवधि हमेशा आपके सामने रहेगी.अटल जी भी उमर भर चिंतन की इसी समस्या से घिरे रहे जिससे वो काव्य में विशंगतियों,परिस्थियों का बखान तो किया परन्तु कहीं ना कहीं निराकरण बताने में कमतर से लगे.पूरी पुस्तक में सामग्री संपादन और साज सज्जा के लिये शर्मा जी बधाई के पात्र हैं.किताबघर को इस बात का आभार कि उसने राष्ट्रचिंतन और ओज वाली कृति पाठकों के समक्ष प्रभावी कलेवर में पहुँचायी है.
अनिल अयान
संपादक
शब्द शिल्पी,सतना
९४०६७८१०४०