Wednesday, 19 June 2019

मानवीय-संबंधों में प्रेम - अपनत्व तलाशती कहानियों का संग्रह स्वेटर

मानवीय-संबंधों में प्रेम - अपनत्व तलाशती कहानियों का संग्रह स्वेटर
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक- स्वेटर (कहानी संग्रह)
लेखक- अशोक जमनानी, होशंगाबाद
प्रकाशक- संदर्भ प्रकाशन, भोपाल
समीक्षक- अनिल अयान,सतना

अशोक जमनानी का यह संग्रह पहली बार मेरी नजर के सामने हैं, पूरे मध्य प्रदेश के लिए अशोक जमनानी उपन्यासों और कहानियों के लिए जाना पहचाना नाम है, यह कहानी संग्रह अपने अंदर पंद्रह कहानियों को समेटे हुए है। ये सभी कहानी हमारे समाज और परिवार और याराना के बीच घटने वाली कहानियां हैं। इन कहानियों में आपको हर उम्र के पात्र उपस्थित मिलेंगें, इन कहानियों में प्रमुखतः स्वेटर, चोर, सुंदर, परकम्मा वासनी, लफ्फाज, टिकिट, रंग, उल्टी चप्पलें, झुर्रियाँ, अलग, अलमारी, लाल चीटियाँ, ग्लोबल वार्मिंग, ज़मीन, और कुंभ दादी प्रमुख कहानियाँ हैं। इन कहानियों की बात की जाए तो स्वेटर युवा मन की कहानी
जिसे स्वेटर की वजह से प्रेमी के रूप में बदनाम कर दिया जाता है, चोर गली मुहल्लों में चोरियों की घटनाओं पर आधारित कहानी है, सुंदर बुजुर्ग महिला बुआ जी के जीवन की विसंगतियों की कहानी है, परकम्मा वासिनी, एक बेबस बुजुर्ग महिला की अपने पारिवारिक दाम्पत्य दुख को त्यागकर नर्मदा परिक्रमा में लीन होने और अनुभवों की कहानी है। लफ्फाज हरफनमौला बन्ने मियाँ के जीवन पर आधारित कहानी है, वहीं टिकिट एक युवा कामगार गोकुल की परहित सरिस धर्म नहीं भाई सूक्ति को साकार करती कहानी है, रंग पति पत्नी के अंतरंग मनोभावों को छूने वाली कहानी है, उल्टी चप्पलें पिता और पुत्री के अगाध प्रेम को प्रदर्शित करती कहानी हि, झुर्रियाँ ग्रामीण परिवेश की एक बेबस महिला और उसके अनछुए असफल प्रेम की कहानी है। अलग स्त्री और पुरुष के बीच अनायास उपजे प्रेम की कहानी है जिसमें दोनों अपनी अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से अकेलेपन के शिकार होते हैं। अलमारी नव विवाहित जोड़े के शहरी जगदोजहद और आपसी वैचारिक भिन्नता को समेटे हुए घटनाक्रमों की कहानी है। लाल चीटियाँ महिला प्रताड़्ना पर आधारित कहानी है जिसमें प्रमुख पात्र समाज और परिवार से क्षुब्ध होकर पलायन कर जाती है। ग्लोबल वार्मिंग ग्रामीण परिवेश की कहानी हैं जिसमें पूजा और कर्मकांड करने वाले पुरोहित गरीब लोगों को कैसे परेशान करते हैं यह दिखाया गया है। ज़मीन स्त्रीपुरुष के बीच अनन्य प्रेम की पराकाष्ठा और घनिष्ठत को दर्शाती कहानी है, अंतिम कहानी कुंभ दादी  एक  बुजुर्ग महिला के जीवन की कहानी है जिसका अंतिम समय कुंभ नहाने की मनोकामना के साथ पूर्ण होता है।
इन सभी कहानियों में जीवन के विभिन्न रिश्ते, समाज के विभिन्न पहलुओं को देखने और समझने का अवसर मिलता है। इसमें अधिक्तर कहानियों में मानव मन के बीच में उपजे प्रेम को अपने शब्दपाश से कहानी कार ने कहानीपन के द्वारा संवारा है, ग्रामीण परिवेश की कहानियाँ ग्रामीण जनजीवन और संबंधों की महत्ता को उजागर करता है, ये कहानियाँ कोई प्रोफेशनल कहानियों की तरह चटख पटक वाली नहीं हैं, इनमें शहरी मक्कारियाँ और फरेब कम दिखेगा, इन कहानियों में सकारत्मक उर्जा का समावेश कथाकार पात्रों के माध्यम से करता है, इन कहानियों में पात्र पलायन नहीं करते बल्कि साहस दिखाते है, इन कहानियों का देशकाल और वातावरण पाठक को बांधे रखते हैं, संवादों की सहजता पाठक को मंत्रमुग्ध करती है। कुछ कहानियों में स्त्री पात्रों की स्थिति उनकी समाजिक परिस्थियों का आईना बन जाती हैं। कहानियों की भाषा और बुनावट पाठक को उबाऊपन से दूर करती है। कहानी सरलता लिए होने की वजह से पाठक कहानी के कथ्य और कथाकार के उद्देश्य को समझने में सफल होता है। इस संग्रह में मेरे अनुसार उल्टी चप्पलें सर्वश्रेष्ठ कहानी और लफ्फाज किस्सागोई और बुनावट के हिसाब से कुछ कमतर कहानी लगी। हर कहानीकार के लिए सभी कहानी प्रिय होती हैं। इस संग्रह की कहानियाँ पाठकों को कुछ पल के लिए अपने आसपास झांकने के लिए विवश करती हैं, तथा प्रेम और अपनत्व के कितने रूप हो सकते हैं यह समझाने में सफल होती हैं। यहीं सही मायनों में इस संग्रह की पाठकीय सफलता है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

Monday, 17 June 2019

बचपन की सैर कराती बाल कवित़ाओ का संग्रह

बचपन की सैर कराती बाल कवित़ाओ का संग्रह

कृति-अम्मा जरा बताओ, बाल कविताएँ
लेखक- डॉ हरीश निगम, सतना
प्रकाशक- जेटीएस पब्लिकेशन, नईदिल्ली
समीक्षा -अनिल अयान, सतना।

पूरे देश मे जहां बाल साहित्यिक कृतियों का अकाल सा है उस दरमियां डा हरीश निगम की स्मृति शेष अंक का यह संग्रह भीषण गर्मी मे वादियों की ठंडक देने वाला है। सतना मे बाल कविताओं मे थोडा बहुत काम डॉ वेद प्रकाश सिंह प्रकाश जी ने भी किया, हरीश निगम जी की बाल कविताएं जो नवभारत टाइम्स मे नियमित प्रकाशित होती रहीं उनको सहेजने का काम मरणोपरांत उनके परिवारजनों ने इस पुस्तक के रूप मे किया यह बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध होगा। इस संग्रह मे बचपन की हर उस अंगडाई को हरीश निगम जी ने कविता के बंधों मे माला की तरह पिरोया है जिसे हम सामान्यतः नजरंदाज कर देते है।उनके जीवित रहते भी उनके कई बालकविताओं का संग्रह आये हैं। किंतु यह इसलिए भी सर्वश्रेष्ठ है क्योकि यह उनकी अनुपस्थिति मे आया है और उनकी उपस्थिति की महक देता रहेगा।
इस संग्रह मे अर्धशतकीय बाल गीत हैं जो विभिन्न विषयों जैसे अम्मा की बातचीत, चंदामामा, सडकें, पंछी, सर्दी, जाडे का मौसम, दीवाली, सूरज, शिशुगीत, पानी, सुबह, वर्षा, चूहा चुहिया मंहगाई, छुट्टियां, गर्मी, दादा जी, बंदर मामा, नया साल, होली विषयों को समेटा गया है।
सभी गीत बाल मन की जिज्ञासाओं से उपजे हैं। कई सवाल और उनके सवाल देते ये गीत सरल, सहज और गेयता लिए हुए हैं, इन पर बच्चे अभिनय भी कर सकते है प्री प्राइमरी और प्राइमरी कक्षाओं के लिए बच्चों के जुबां मे जल्दी ही आ जाने वाले ये गीत सतना की माटी और सतना के लाल हरीश निगम की लेखनी और भावों की सुगंध बिखेरते हुए पाठक को मंत्र मुग्ध करते है,  पुस्तक के शीर्षक के गीत का बंध देखे-।।नानी इतनी ढेर कहानी, और कुए जी इतना पानी, रोज कहां से पाते हैं, अम्मा जरा बताओ तो।। या फिर ।।आई आई गर्मी आई, पूंछ दबाए भगी रजाई, ठंडा पानी लगे मिठाई, लू मैडम ने डांट लगाई।। इन गीतों मे छंद बद्धता भी है, गेयता भी है, मन का संगीत भी है, लेखक के कलम की जादुई सम्मोहित करने वाली कल्पना भी है। इस पुस्तक को पढते हुए इस बात का क्षोभ जरूर होता है कि हरीश सर की ये कृतियां ही हमारी साथी है। वो अगर होते तो और ज्यादा बाल रचनाएं हमें पढने को मिलती, किंतु उनका यह संकलन बच्चो और बूढों दोनों को बचपन की सैर कराने मे सफल सिद्ध होता है। 

अनिल अयान, सतना

असंवेदनशील समाज की केंचुल उतारती कविताओं का संग्रह

असंवेदनशील समाज की केंचुल उतारती कविताओं का संग्रह
पुस्तक - केंचुल (कविता संग्रह)/लेखक - ऋषिवंश,सतना/प्रकाशक- नमन प्रकाशन, नई दिल्ली/समीक्षा- अनिल अयान,सतना
सतना के सुप्रसिद्ध कवि ऋषिवंश या विद्याशंकर मिश्र अपनी पीढी के जाने माने कवि और उपन्यासकार हैं। वो ऐसे लेखक हैं जिनकी कृतियाँ बिना शोर गुल किये हम सबके बीच में उपस्थित हो जाती हैं, वो एक मात्र ऐसे रचनाकार हैं जिनकी कृति युद्धबीज जो एक उपन्यास है, को भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया। एक तरफ उनके उपन्यासों में आज के समय की विशंगतियों का दर्द हैं वहीं दूसरी ओर वो  जीवन के विभिन्न पहलुओं और अनुभवजन्य रचनाओं से समाज के लोक और जन की बात करते हैं, उनकी कविताओं में आम आदमी की पीड़ा का गान है। उनकी कविताओं में समाज की विद्रूपताओं को प्रकाश में लाने का जिम्मा है। उनकी कविताओं में सहज स्वाभाविक भावों से भरे होने का गुण मौजूद है। केंचुल कविता संग्रह इन्हीं विशंगतिपूर्ण समाज, संबंध, चिंतन, विमर्श, देशकाल का चित्रण देखने को मिलता है। इस संग्रह की जितनी भी कविताएँ हैं वो कविताओं की परंपरागत संरचना से कोसों दूर हैं। उनकी कविताओं में अनावश्यक कल्पनाओं और गूढ़ शब्दों को स्थान नहीं दिया गया। उनकी कविताएँ सीधे तेज प्रवाह से पाठक के दिलो दिमाग तक पहुँचती हैं। उनकी कविताएँ सीधे सपाट, जस के तस, आँखन देखी कागद लेखी की परिकल्पनाओं को समेटें हुए हैं, उनकी कविताओं में शब्द शक्तियों के प्रयोग से परहेज किया गया है, नकी कविताएँ नई कविताओं के काव्य आंदोलनों की बानगी है। इन कविताओं में समस्याओं के लिए कवि की तरफ से सुकून, आश्वासन, तसल्ली, दिलासा और शांति पूर्ण आवेग का प्रवाह दिखाई पड़ता है।
कविता संग्रह के अनुक्रम की तरफ बढ़े तो कविताओं के केंद्रीय भाव ही पाठक को उद्वेलित करने वाले हैं एक शतक कविताओं में हर कविता में कुछ ना कुछ विशेष है जो अन्य कविताओं से उसे भिन्न बनाता है। इस संकलन की कुछ कविताएँ जैसे वक्त की खूटी पर, तेवर, इस्तहार, उम्रकैद, अकुलाहट, पूँछना पड़ेगा, बिजलियाँ, नफरतें, अकाल, खतरनाक समय में, दावानल, टेररिस्ट, शोषण, केंचुल, आवारा किस्से, मामूली लोग, बरबादियाँ, कंगाल,अभिषाप, जो नहीं है, अभागा, चोर आदि कुछ ऐसी कविताएँ हैं जो पाठक को एक पल के लिए सोचने की खातिर विवश कर ही देता है। इन कविताओं की विषय वस्तु लौकिक, समाजिक, साहित्यिक, सामाजिक, संबंधजन्य, मनस्थिति के भिन्न भाव भूमि, अध्ययन और विचरण, जीवन के अनुभवों के बीच से पैदा हुए झंझावातों को प्रस्तुत करती है। सवा सौ पेज की इस कृति में वो सब कुछ मौजूद है जो अकुलाहट और बेचैनी में आकर पाठक पुस्तकों में खोजना चाहता है। इनकी कविताओं में शालीन अक्रोश है, जिसकी बानगी तेवर कविता की ये पंक्तियाँ - कुछ और बिगड़ेगी बातें/ बन जाएगें और पेचीदा हालात/ नहीं बैठेंगी खामोशियाँ चुपचाप/ बदलेगा तेवर आदमी बार बार। इनकी कविताओं में चिंता के रज कण भी आपको देखने को मिलेगें एक बानगी इश्तहार में देखिये- झूठे हलफनामें दे देकर / सुख चाहिए होगा आदमियों को/ इश्तहार बुलाएगा उन्हें अपने आप/ नंगी औरतों के चित्र दिखा दिखाकर/ बेची जाएगीं  कमजोरियाँ/झाँसे में आते रहेंगे लोग। इनकी कविताओं में मानवजीवन के पलायन के बीच में आशाओं की किरण भी देखने को मिलती है केंचुल कविता की ये पंक्तियाँ देखें - दंड़ है देह धरने का/ अवांछित करना और भोगना/ न भूख खत्म हुई न समस्याएँ/ अब तो बासी और विखंडित देह गंधाने लगी है/ केंचुल उतारने की बड़ी इच्छा होती है। धरती के प्रति कवि की जायज चिंताओं को भी संग्रह में स्थान दिया गया है जिसमें वो कहता है कि आपातकालीन व्यवस्थाएँ कारगर नहीं होगीं/ हमें तो चाहिए वही पुरानी और नैसर्गिक/लता पत्र से लदी फंदी आदिमयुग की धरती। ऐसे ही ना जाने कितने भावों को सहेजे कविताओं को संग्रहित करने में सफल हुआ है यह संग्रह,
इस संग्रह की भाषा सपाट खड़ी बोली में है, कहीं कहीं अंग्रेजी, उर्दूऔर बघेली के शब्दों की उपस्थिति भी कविताओं में मिल जाती हैं। कहीं कहीं पर कविताओं में प्रतापगढ़ बांदा का वो अख्खड़पन और बेबाकी का लहजा मिल जाता है, कविताओं में छंदबद्धता और गेयता का अभाव है,शब्दों के साथ चमत्कार और तिलिस्म खोजने का प्रयास बिल्कुल भी नहीं किया गया है। कविताओं में कवि के मन में उपजी चिंता, समाधान, विशंगतियों के प्रति खोजी रवैया, खुद के प्रति सजगता साफ साफ झलकती है, अंततः पाठकों की वोश्रेणी जो समाज देश और राजनीति के प्रति चिंतन और चिंतित रहती है उसके लिए यह संग्रह सुकून और शांति देने वाला बन ही जाता है। समसामायिक विषयों को केंद्र में रखकर लिखी गयी ये कविताएँ अपने समय की झंड़ावरदार बनती है, इस हेतु रचनाकार बधाई के पात्र हैं।
अनिल अयान,सतना
बेचैन मन को