असंवेदनशील समाज की केंचुल उतारती कविताओं का संग्रह
पुस्तक - केंचुल (कविता संग्रह)/लेखक - ऋषिवंश,सतना/प्रकाशक- नमन प्रकाशन, नई दिल्ली/समीक्षा- अनिल अयान,सतना
सतना के सुप्रसिद्ध कवि ऋषिवंश या विद्याशंकर मिश्र अपनी पीढी के जाने माने कवि और उपन्यासकार हैं। वो ऐसे लेखक हैं जिनकी कृतियाँ बिना शोर गुल किये हम सबके बीच में उपस्थित हो जाती हैं, वो एक मात्र ऐसे रचनाकार हैं जिनकी कृति युद्धबीज जो एक उपन्यास है, को भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया। एक तरफ उनके उपन्यासों में आज के समय की विशंगतियों का दर्द हैं वहीं दूसरी ओर वो जीवन के विभिन्न पहलुओं और अनुभवजन्य रचनाओं से समाज के लोक और जन की बात करते हैं, उनकी कविताओं में आम आदमी की पीड़ा का गान है। उनकी कविताओं में समाज की विद्रूपताओं को प्रकाश में लाने का जिम्मा है। उनकी कविताओं में सहज स्वाभाविक भावों से भरे होने का गुण मौजूद है। केंचुल कविता संग्रह इन्हीं विशंगतिपूर्ण समाज, संबंध, चिंतन, विमर्श, देशकाल का चित्रण देखने को मिलता है। इस संग्रह की जितनी भी कविताएँ हैं वो कविताओं की परंपरागत संरचना से कोसों दूर हैं। उनकी कविताओं में अनावश्यक कल्पनाओं और गूढ़ शब्दों को स्थान नहीं दिया गया। उनकी कविताएँ सीधे तेज प्रवाह से पाठक के दिलो दिमाग तक पहुँचती हैं। उनकी कविताएँ सीधे सपाट, जस के तस, आँखन देखी कागद लेखी की परिकल्पनाओं को समेटें हुए हैं, उनकी कविताओं में शब्द शक्तियों के प्रयोग से परहेज किया गया है, नकी कविताएँ नई कविताओं के काव्य आंदोलनों की बानगी है। इन कविताओं में समस्याओं के लिए कवि की तरफ से सुकून, आश्वासन, तसल्ली, दिलासा और शांति पूर्ण आवेग का प्रवाह दिखाई पड़ता है।
कविता संग्रह के अनुक्रम की तरफ बढ़े तो कविताओं के केंद्रीय भाव ही पाठक को उद्वेलित करने वाले हैं एक शतक कविताओं में हर कविता में कुछ ना कुछ विशेष है जो अन्य कविताओं से उसे भिन्न बनाता है। इस संकलन की कुछ कविताएँ जैसे वक्त की खूटी पर, तेवर, इस्तहार, उम्रकैद, अकुलाहट, पूँछना पड़ेगा, बिजलियाँ, नफरतें, अकाल, खतरनाक समय में, दावानल, टेररिस्ट, शोषण, केंचुल, आवारा किस्से, मामूली लोग, बरबादियाँ, कंगाल,अभिषाप, जो नहीं है, अभागा, चोर आदि कुछ ऐसी कविताएँ हैं जो पाठक को एक पल के लिए सोचने की खातिर विवश कर ही देता है। इन कविताओं की विषय वस्तु लौकिक, समाजिक, साहित्यिक, सामाजिक, संबंधजन्य, मनस्थिति के भिन्न भाव भूमि, अध्ययन और विचरण, जीवन के अनुभवों के बीच से पैदा हुए झंझावातों को प्रस्तुत करती है। सवा सौ पेज की इस कृति में वो सब कुछ मौजूद है जो अकुलाहट और बेचैनी में आकर पाठक पुस्तकों में खोजना चाहता है। इनकी कविताओं में शालीन अक्रोश है, जिसकी बानगी तेवर कविता की ये पंक्तियाँ - कुछ और बिगड़ेगी बातें/ बन जाएगें और पेचीदा हालात/ नहीं बैठेंगी खामोशियाँ चुपचाप/ बदलेगा तेवर आदमी बार बार। इनकी कविताओं में चिंता के रज कण भी आपको देखने को मिलेगें एक बानगी इश्तहार में देखिये- झूठे हलफनामें दे देकर / सुख चाहिए होगा आदमियों को/ इश्तहार बुलाएगा उन्हें अपने आप/ नंगी औरतों के चित्र दिखा दिखाकर/ बेची जाएगीं कमजोरियाँ/झाँसे में आते रहेंगे लोग। इनकी कविताओं में मानवजीवन के पलायन के बीच में आशाओं की किरण भी देखने को मिलती है केंचुल कविता की ये पंक्तियाँ देखें - दंड़ है देह धरने का/ अवांछित करना और भोगना/ न भूख खत्म हुई न समस्याएँ/ अब तो बासी और विखंडित देह गंधाने लगी है/ केंचुल उतारने की बड़ी इच्छा होती है। धरती के प्रति कवि की जायज चिंताओं को भी संग्रह में स्थान दिया गया है जिसमें वो कहता है कि आपातकालीन व्यवस्थाएँ कारगर नहीं होगीं/ हमें तो चाहिए वही पुरानी और नैसर्गिक/लता पत्र से लदी फंदी आदिमयुग की धरती। ऐसे ही ना जाने कितने भावों को सहेजे कविताओं को संग्रहित करने में सफल हुआ है यह संग्रह,
इस संग्रह की भाषा सपाट खड़ी बोली में है, कहीं कहीं अंग्रेजी, उर्दूऔर बघेली के शब्दों की उपस्थिति भी कविताओं में मिल जाती हैं। कहीं कहीं पर कविताओं में प्रतापगढ़ बांदा का वो अख्खड़पन और बेबाकी का लहजा मिल जाता है, कविताओं में छंदबद्धता और गेयता का अभाव है,शब्दों के साथ चमत्कार और तिलिस्म खोजने का प्रयास बिल्कुल भी नहीं किया गया है। कविताओं में कवि के मन में उपजी चिंता, समाधान, विशंगतियों के प्रति खोजी रवैया, खुद के प्रति सजगता साफ साफ झलकती है, अंततः पाठकों की वोश्रेणी जो समाज देश और राजनीति के प्रति चिंतन और चिंतित रहती है उसके लिए यह संग्रह सुकून और शांति देने वाला बन ही जाता है। समसामायिक विषयों को केंद्र में रखकर लिखी गयी ये कविताएँ अपने समय की झंड़ावरदार बनती है, इस हेतु रचनाकार बधाई के पात्र हैं।
अनिल अयान,सतना
बेचैन मन को
पुस्तक - केंचुल (कविता संग्रह)/लेखक - ऋषिवंश,सतना/प्रकाशक- नमन प्रकाशन, नई दिल्ली/समीक्षा- अनिल अयान,सतना
सतना के सुप्रसिद्ध कवि ऋषिवंश या विद्याशंकर मिश्र अपनी पीढी के जाने माने कवि और उपन्यासकार हैं। वो ऐसे लेखक हैं जिनकी कृतियाँ बिना शोर गुल किये हम सबके बीच में उपस्थित हो जाती हैं, वो एक मात्र ऐसे रचनाकार हैं जिनकी कृति युद्धबीज जो एक उपन्यास है, को भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया। एक तरफ उनके उपन्यासों में आज के समय की विशंगतियों का दर्द हैं वहीं दूसरी ओर वो जीवन के विभिन्न पहलुओं और अनुभवजन्य रचनाओं से समाज के लोक और जन की बात करते हैं, उनकी कविताओं में आम आदमी की पीड़ा का गान है। उनकी कविताओं में समाज की विद्रूपताओं को प्रकाश में लाने का जिम्मा है। उनकी कविताओं में सहज स्वाभाविक भावों से भरे होने का गुण मौजूद है। केंचुल कविता संग्रह इन्हीं विशंगतिपूर्ण समाज, संबंध, चिंतन, विमर्श, देशकाल का चित्रण देखने को मिलता है। इस संग्रह की जितनी भी कविताएँ हैं वो कविताओं की परंपरागत संरचना से कोसों दूर हैं। उनकी कविताओं में अनावश्यक कल्पनाओं और गूढ़ शब्दों को स्थान नहीं दिया गया। उनकी कविताएँ सीधे तेज प्रवाह से पाठक के दिलो दिमाग तक पहुँचती हैं। उनकी कविताएँ सीधे सपाट, जस के तस, आँखन देखी कागद लेखी की परिकल्पनाओं को समेटें हुए हैं, उनकी कविताओं में शब्द शक्तियों के प्रयोग से परहेज किया गया है, नकी कविताएँ नई कविताओं के काव्य आंदोलनों की बानगी है। इन कविताओं में समस्याओं के लिए कवि की तरफ से सुकून, आश्वासन, तसल्ली, दिलासा और शांति पूर्ण आवेग का प्रवाह दिखाई पड़ता है।
कविता संग्रह के अनुक्रम की तरफ बढ़े तो कविताओं के केंद्रीय भाव ही पाठक को उद्वेलित करने वाले हैं एक शतक कविताओं में हर कविता में कुछ ना कुछ विशेष है जो अन्य कविताओं से उसे भिन्न बनाता है। इस संकलन की कुछ कविताएँ जैसे वक्त की खूटी पर, तेवर, इस्तहार, उम्रकैद, अकुलाहट, पूँछना पड़ेगा, बिजलियाँ, नफरतें, अकाल, खतरनाक समय में, दावानल, टेररिस्ट, शोषण, केंचुल, आवारा किस्से, मामूली लोग, बरबादियाँ, कंगाल,अभिषाप, जो नहीं है, अभागा, चोर आदि कुछ ऐसी कविताएँ हैं जो पाठक को एक पल के लिए सोचने की खातिर विवश कर ही देता है। इन कविताओं की विषय वस्तु लौकिक, समाजिक, साहित्यिक, सामाजिक, संबंधजन्य, मनस्थिति के भिन्न भाव भूमि, अध्ययन और विचरण, जीवन के अनुभवों के बीच से पैदा हुए झंझावातों को प्रस्तुत करती है। सवा सौ पेज की इस कृति में वो सब कुछ मौजूद है जो अकुलाहट और बेचैनी में आकर पाठक पुस्तकों में खोजना चाहता है। इनकी कविताओं में शालीन अक्रोश है, जिसकी बानगी तेवर कविता की ये पंक्तियाँ - कुछ और बिगड़ेगी बातें/ बन जाएगें और पेचीदा हालात/ नहीं बैठेंगी खामोशियाँ चुपचाप/ बदलेगा तेवर आदमी बार बार। इनकी कविताओं में चिंता के रज कण भी आपको देखने को मिलेगें एक बानगी इश्तहार में देखिये- झूठे हलफनामें दे देकर / सुख चाहिए होगा आदमियों को/ इश्तहार बुलाएगा उन्हें अपने आप/ नंगी औरतों के चित्र दिखा दिखाकर/ बेची जाएगीं कमजोरियाँ/झाँसे में आते रहेंगे लोग। इनकी कविताओं में मानवजीवन के पलायन के बीच में आशाओं की किरण भी देखने को मिलती है केंचुल कविता की ये पंक्तियाँ देखें - दंड़ है देह धरने का/ अवांछित करना और भोगना/ न भूख खत्म हुई न समस्याएँ/ अब तो बासी और विखंडित देह गंधाने लगी है/ केंचुल उतारने की बड़ी इच्छा होती है। धरती के प्रति कवि की जायज चिंताओं को भी संग्रह में स्थान दिया गया है जिसमें वो कहता है कि आपातकालीन व्यवस्थाएँ कारगर नहीं होगीं/ हमें तो चाहिए वही पुरानी और नैसर्गिक/लता पत्र से लदी फंदी आदिमयुग की धरती। ऐसे ही ना जाने कितने भावों को सहेजे कविताओं को संग्रहित करने में सफल हुआ है यह संग्रह,
इस संग्रह की भाषा सपाट खड़ी बोली में है, कहीं कहीं अंग्रेजी, उर्दूऔर बघेली के शब्दों की उपस्थिति भी कविताओं में मिल जाती हैं। कहीं कहीं पर कविताओं में प्रतापगढ़ बांदा का वो अख्खड़पन और बेबाकी का लहजा मिल जाता है, कविताओं में छंदबद्धता और गेयता का अभाव है,शब्दों के साथ चमत्कार और तिलिस्म खोजने का प्रयास बिल्कुल भी नहीं किया गया है। कविताओं में कवि के मन में उपजी चिंता, समाधान, विशंगतियों के प्रति खोजी रवैया, खुद के प्रति सजगता साफ साफ झलकती है, अंततः पाठकों की वोश्रेणी जो समाज देश और राजनीति के प्रति चिंतन और चिंतित रहती है उसके लिए यह संग्रह सुकून और शांति देने वाला बन ही जाता है। समसामायिक विषयों को केंद्र में रखकर लिखी गयी ये कविताएँ अपने समय की झंड़ावरदार बनती है, इस हेतु रचनाकार बधाई के पात्र हैं।
अनिल अयान,सतना
बेचैन मन को
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