Sunday, 17 March 2019

विद्रूपताओं को तिर्यक दृष्टि से देखती हुई रचनाएँ का संग्रह

पुस्तक समीक्षा-
विद्रूपताओं को तिर्यक दृष्टि से देखती हुई रचनाएँ का संग्रह

पुस्तक - मुसाफिर इस दौर के
लेखक- रविशंकर चतुर्वेदी, सतना, म.प्र.
प्रकाशक - दिनकर प्रकाशन, प्रयाग, उ.प्र.
मूल्य - सौ रुपए मात्र

मुसाफ़िर इस दौर के काव्य संग्रह सतना के रविशंकर चतुर्वेदी, जो पिपरवाह,अमरपाटन के निवासी हैं,के द्वारा लिखा गया। पुस्तक में चतुष्पदियों, और कवित्त छंदों का संकलन है। रविशंकर चतुर्वेदी अपनी कम उम्र मे एक वट वृक्ष की तरह रहे जिनके नीचे मैने साहित्य में प्रवेश,गोष्टियों में सिरकत, कविसम्मेलनों के काव्यपाठ करने के बहाने खुद को स्थापित करने का अवसर पाया, मै ही क्या बहुत से युवा रचनाकारों को कविता लिखने का सउर रविशंकर जी ने सिखाया है। यह उनका भौतिक रूप से कविता संग्रह के रूप में पहली कृति हो सकती है, किंतु जिसने भी उनको मंचों में बिना चुटकुले बाजी के हास्य व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए सुना होगा वह जानता है, कि इस तरह की दर्जनों भर पुस्तकों के लायक उनके पास रचनाएँ हैं, हालाँकि वो मंच में सीमित रचनाओं को प्रस्तुत करने और उन्ही के माध्यम से श्रोताओं को गुदगुदाने का हुनर स्थापित करने में सफल रहे हैं।
कृति का शीर्षक ही यह बता रहा है कि इस दौर में हर शख्स दुनियादारी से परेशां है। इन्ही परेशानियों के सबब को कवि ने अपनी हास्य व्यंग्य की गुदगुदाती दुनिया के परे भी चिंतन परक रचनाएं लिखने का रोग पाल लिया। अपने हाव भाव से, श्रोताओं के बारह बजे चेहरे पर भी हंसी बिखेरने वाले इस कृति के लेखक ने इस कृति में लगभग पचहत्तर रचनाओं को स्थान दिया है जो शीर्षक विहीन होते हुए भी केंद्र में विषयवस्तु को समाहित करती है। लेखक खुद इस बात को स्वीकार करता है कि वो मानकों की चिंता किए बगैर इस कृति की रचना की है। उसका मन जब देश की वर्तमान विद्रूपताओं से दुखी होता है तब उसके हास्य व्यंग्य की व्यंजना की रचना होती है। सीधे सरल शब्दो में उनका व्यंग्य श्रोताओ और पाठकों तक पहुंच कर अंदर से हिला देता है।
चतुष्पदियों के माध्यम से कवि ने विभिन्न सामाजिक विशंगतियों के आयाम को छूते हुए अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट कर दिया है। उनका कवित्व सच का साथ ही देगा भले ही कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ हों जाएं। इन पंक्तियों में उनकी बानगी देखें- बेंचकर ईमान किधर जाएगें,टूट जाएगें बिखर जाएगें, सांच की आँच में तपाओगे, हम तो सोने सा निखर जाएगें। वर्तमान समाजिक विशंगतियों, और ऊँचनीच, भ्रष्ट समाज के भ्रम जालों के बीच वो लिखते हैं कि - ये भला कैसे काम कर बैठे, रोशनी तम के नाम कर बैठे, पद की चाहत में गिर गए इतना, खुद को पद का गुलाम कर बैठे।
आज की ढोल पोल शिक्षा व्यवस्था पर चोंट करते हुए उनकी कलम यहाँ तक कह जाती है कि - कितनी मनहूस हैं मेरी डिग्री, रोटियाँ तक नहीं दिला पाई। आज की न्याय व्यवस्था पर वो आंसू नहीं बहाते बल्कि प्रशासन के सामने प्रश्न चिंह्न खड़ा करतेहैं कि - ले के फ़रियाद कहाँ जाएगें, जबकि मुन्सिफ़ ही खुद बिका सा है। जीवन भर जो भीड़ में हंसते हैं उनके पीछे का दर्द भी कवि से नहीं छिपता वो अपने जैसे हर पल हंसने मुस्कुराने वाले चेहरों का राज खोलते हुए लिख जाते हैं कि- जो लोग समंदर के अंतस में होते हैं, हमने अक्सर देखा वो प्यासे होते हैं, वे राज न जानेगें हम हँसने वालों का, हँसने की मंजिल तक हम कितना रोते हैं।  
पुस्तक के दूसरे भाग में गीतिकाओं, मे माध्यम से उन्होने अंतर्मन की महीन संवेदनाओं को,मखमली एहसासों को पिरोने का काम भी किया है और खुद को पहचानने और खुद की सुनने सुनाने की चेष्टा को पाठको तक पहुँचाते हुए लिखते हैं कि- जिंदगी खिलखिला नहीं पाई,मुझको मुझसे मिला नहीं पाई, या फिर,बेजान जिस्म हैं इसे ना मोडिये हुजूर, टूटे हैं ख़्वाब और नहीं तोडि़ए हुजूर, चाहता हूँ कोई न जख़्म भरे अपना, चलो एक और नया दोस्त बनाया जाए। ऐसी बहुत सी रचनाएँ हैं जो वर्तमान समय में रिश्तों के मोल की तश्दीग करती नजर आएंगी।
कवित्त,छंदों में उन्होने, राजनीति,समाज, भारत पाकिस्तान मुद्दे, चुनाव, काश्मीर मुद्दों, राज काज, और भाषा भाषियों, पुरुस्कारों की राजनीतियों पर छंद रचे, और छंदो के माध्यम से व्यंग्य की तिर्यक दृष्टि को भी पाठको के सामने रखा है। उन्होने हिंदी भाषा के संदर्भ में आशान्वित होते हुए लिखा है कि - हिंद के निवासी हम, हिंदी भाषा भाषी हम, देश को ही भाषा में विश्वस्त होना चाहिए। मातृभाषा को उचित मान सम्मान मिले, ऐसा एक विधान अब प्रशस्त होना चाहिए, हिंदी राजभाषा नहीं राष्ट्र भाषा बन जाए, उसी दिन पंद्रह अगस्त होना चाहिए। इसके अलावा उन्होने आशावादी गीतों के माध्यम से पीढियों के रिक्त स्थान को भरने का प्रयास किया जिसमें, उनका गीत- दूर मत जाना मुसाफ़िर, लौटकर आना मुसाफिर, या फिर तुम युग पथ के उन्नायक हो, हे युवा तुम्हीं सब लायक हो, या फिर रूठे अनुबंध निभाने को, हारे भी जीत दिलाने को॥ गीतों में कविता के इस मुसाफिर की चिंता, दर्द, चिंतन, दर्शन, तिर्यक दृष्टि और अपने समय के सच के साथ न्याय संगत निर्णय पाठकों के सामने आता है।
इस कृति में नौ रस भी है, छंद विधान भी है, अलंकार, गेयता, भाषाई सरलता, विषय वस्तु के प्रति कवि की जागरुकता, अपने गौरवशाली इतिहास और धर्म ग्रंथों का अध्ययन भी है, फूहड़ संस्कृति को नकारने का साहस भी है। इस कृति की रचनाएँ, अविधा व्यंजना और लक्षणा तीनों प्रभावों से लबालब है। सत्तर पृष्ठ की इस पुस्तक को पढ़ने के बाद रविशंकर चतुवेदी जी का श्रोता और पाठक उनके लेखन के कई पहलुओं से रूबरू होगा, उनके कई वैचारिक भ्रम के किले टूटेगे और नए तटस्थ बिंब का निर्माण होगा। एक मुफ्त की गुजारिश उनसे यह भी होगी, रचनाओं के कैनवास को और बृहद करने की आवश्यकता अगली कृति में जरूर है। इसी बहाने कृतियों का आना उनकी रचनाओं के संकलन का माध्यम बनेगा, वही रचनाओं की पुनरावृत्ति कर मंच लूटने का जो भ्रम उनके मंचीय कविसाथी गणों का बना हुआ हुआ है, वह भी समय समय में भविश्य में टूटत रहेगा। इस प्रयास के लिए यदि वो साधोवाद के पात्र हैं तो दूसरी ओर वो इस उम्मीद के भी पात्र हैं कि उनकी कृतियाँ आगामी समय में भी पढ़ने को मिलती रहेंगीं। ताकी यह पता चलता रहे कि इस दौर का मुसाफ़िर वक़्त दर वक़्त किस नज़र से सबको देख रहा है।

अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          

No comments:

Post a Comment