Tuesday, 5 March 2019

चुभते चिकोटी काटते समसामायिक व्यंग्यों का संग्रह

चुभते चिकोटी काटते समसामायिक व्यंग्यों का संग्रह
पुस्तक समीक्षा
कृति- कुत्तों की खोज में भीड़ तंत्र (व्यंग्य संग्रह)
लेखक- रंदी सत्यनारायण राव,जमशेदपुर
प्रकाशक - समदर्शी प्रकाशन,हरियाणा

कुत्तों की खोज में भीड़तंत्र,व्यंग्य संग्रह में रंदी सत्यनारायण राव, जमशेदपुर ने चुनिंदा तीस व्यंग्य रचनाओं को संकलित किया है। इन व्यंग्यों की खासियत है कि इनमें विषय वस्तु हमारे आसपास के समाज से निकाली गई है। इन व्यंग्यों में पठनीयता की चासनी सराबोर है, इन व्यंग्यों के विषय वर्तमान संदर्भों से लिए गए हैं, जिन व्यंग्यों का संग्रह किया गया है उनमें से प्रमुख व्यंग्य खेत खाए संपादक मार खाए लेखक, अजगर का जंगल यूनियन, श्रद्धांजलि प्रतियोगिता, चरण स्पर्श का पावन सुख, कुत्तों की खोज में भीड़ तंत्र, संपादक होने का सुख,  साहित्य में चर्चित होने के नुस्खे़, साहित्य में खरपतवार, मौसम बलात्कार का, अपराध अपराधी और मै, मै जन्मजात संचालक हूँ आदि आदि, इन व्यंग्यों की खासियत यह है कि इन व्याप्त और व्यक्त घटना क्रम जो आम है उसे भी तिरछी नजर से देखा गया है। व्यंग्यकार का अनुभव भी इस काम में एक औजार का काम किया है। वो सामान्य घटनाओं में भी विशंगतियों को टेढ़ी नजर उसे उसी तरह देखने में माहिर है जैसे हंस चुनने का काम कर ही लेते हैं। इन व्यंग्यों की लंबाई इतनी ज्यादा नहीं है कि पाठक के गले में रचना हड्डी बनकर फंस जाए। देश की बदहाली, देश की जनता के दुख दर्द, समाजिक कुरूपता, और धार्मिक आड़बरों पर केंद्रित  अधिक्तर व्यंग्य समाज की विशंगतियों को पोस्टमार्टम करते हुए नजर आते हैं। लेखक ने इन रचनाओं को लिखते समय सिर्फ अपनी खाना पूर्ति ही बस नहीं कि बल्कि जिम्मेवारी के साथ पाठकों और रचना के साथ न्याय करने की कोशिश की है। इन व्यंग्यों में पीड़ा है वो पीड़ा जो चिकोटी काटती है, साहित्य समाज पर केंद्रित जितनी भी व्यंग्य रचनाएँ है वो तो ऐसा महसूस होता है कि हमारे साहित्य समाज को आइना दिखाने के उद्देश्य से लिखी गई हैं। रचना में बेबाकी के तेवर और छिद्रान्वेषण का गुण, साफगोई की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम करता है।
इन व्यंग्यों में चापलूसी, या किसी के प्रति आह्लाद के चलते पूरी तरह से अंधानुकरण नहीं दिखता,इन रचनाओं में प्रहार और मारक गुण पाठक को आनंद प्रदान करने के साथ, एक पल को सोचने के लिए मजबूर करता है। हमारे समाज में जितने भी जैसे भी लूप होल हैं उनकी पड़्ताल इन व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से की गई है। इन व्यंग्यों में वो विंशंगतियों के गुलाम नहीं हुए, वो लोकतंत्र,साहित्य समाज के उन सभी पहलुओं पर अपनी रचनाओं के माध्यम से कोड़े बरसाए हैं जिन पर सवाल उठने चाहिए जिन की वैचारिक चीड़फाड़ किया जाना चाहिए। जिनको नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इन विसंगतियों पर बात,चर्चा विमर्श होना चाहिए। इन विशंगतियों से अगर मन में कोफ्त हैं तो निश्चित ही ये टूटन हमारे समाज,देश,साहित्य के लिए लाभकर नहीं होगी। लेखक खुद इस बात को स्वीकार करता है कि "मैने भयानक बनकर कितने योग्य लोगों को इस विधा को अपनाने को प्रेरित किया या इस विधा में मै स्वयं कितना सफल हूँ? यह मेरी पुस्तक पढ़कर पता चलेगा,चूँकी सफेद -पोशों की दुनिया का एक मात्र चोर झूठा, बकलोल चोट्टा मक्कार आदि पता नहीं और कितने जानी अनजाई उपाधियों से विभूषित जो निहायत शरीफ,सदाचारिता में, नोबल पुरुस्कार विजेता खिलंदड़ गुरुओं से भरे इस शहर देश में निवास करता हूँ जिससे मुझे अकेला रहने, जीने का हौसला देते हैं,ताकि उनको चिकोटी काटता फिरूँ।"
एक साहित्यिक व्यंग्य रचना में लेखक लिखता हैकि  " वैसे यह जो हम प्रकाशित करते हैं साहित्यकारों के विशुद्ध विचार होतेहैं फिर भी विशुद्ध सोना भी बगैर मिलावट के आकार ग्रहण नहीं कर पाता।इसी कारण से अपनी और दूसरों की बुद्धि की मिलावट संपादन में अनिवार्य हो जाती हैं"। और ऐसे बहुत से संदर्भ हैं जो व्यंग्यकार की लेखनी की भाषा को पाठक के योग्य बनाती हैं। कुल मिका कर बात की जाए तो वर्तमान परिदृश्य में व्यंग्य जहाँ पूरी तरह से राजनैतिक माहौल पर केंद्रित हो चुके हैं उस दरमियां ये मुट्ठी भर रचनाएँ इस मामले में पाठक को आश्वस्त कराती हैं कि अभी भी व्यंग्य में सपाटबयानी,और मसखरी ने अपना हाथ नहीं मारा,अभी भी व्यंग्य  साहित्यिक बलात्कार से सुरक्षित है। रंदी साहब के कुछ व्यंग्यों में व्यंग्य, आलेख के साथ साथ लघु कथाओं के रूप में भी शामिल किया गया है। कुछ रचनाओं का कैनवास और बढ़ाने की आवश्यकता पाठक को महसूस होती है। व्यंग्य के साथ मुहावरों की जुगलबंदी भी संग्रह को और हास्यव्यंग्य रस से सराबोर बनाता है। वर्तमान विशंगतियों पर आधारित यह संग्रह आने वाले समय मे भी तरोताजा बना रहेगा। ऐसी उम्मीद की जा सकती है। व्यंग्य विधा में एक महत्वपूर्ण कृति को जोड़ने के लिए रंदी राव साहब साधोवाद के पात्र भी हैं। उनकी लेखनी से और भी  चुटीली व्यंग्य कृतियाँ पाठकों को पढ़ने को मिलेंगी ऐसी आशा की जा सकती है।
अनिल अयान,सतना

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