Saturday, 5 July 2014

अंतर्मन के दंश का जीवन में प्रवेश वर्जित करती कवितायें: प्रवेश वर्जित.

अंतर्मन के दंश का जीवन में प्रवेश वर्जित करती कवितायें: प्रवेश वर्जित.
कवि: श्री मती अंजनी शर्मा.
कविता संग्रह: प्रवेश वर्जित
समीक्षा: अनिल अयान,सतना
प्रकाशक: यश प्रकाशन,दिल्ली

प्रवेश वर्जित नवीनतम और मार्मिक कविता संग्रह है.श्री मती अंजनी शर्मा ने इस कविता संग्रह में नई कविताओं के माध्यम से पाठको के मन को कुरेदने की कोशिश की है.जिन लम्हों को हम सब नकार देते है या व्यस्तता के चलते छोड देते है उन लम्हों को सहेजने की कोशिश की है.१२७ पेज की इस कविता संग्रह में अंजनी शर्मा जी ने ५० कविताओं में जीवन हर पहलू को कविता के माध्यम से उतारने का सफल प्रयास किया है.बिना किसी सुप्रसिद्ध कवि या साहित्यकार की भूमिका के बिना भी यह कविता संग्रह अपनी भूमि में मजबूती से पैर जमाये हुये है. अपनी बात में अंजनी शर्मा जी ने खुद इस बात को स्वीकारा है कि इस कविता संग्रह में लिखी गई कवितायें भावों का विस्तार है अनकही बातों को व्यक्त करने का जरिया है.कविता में छिपे वो पल है जो चाहकर भी भूलाये ना जा सके है.कभी कभी भावों ने अपनी सुनामी में कागज और कलम को भिगा दिया और फिर इससे कविता का जन्म हुआ है,इस कविता संग्रह की कविताये.सर्द में धूप है,जल में प्रतिबिम्ब है.बीज से संघर्श कर उत्पन्न हुआ अंकुर है.जिंदगी के इद्रधनुषीय रंगों को समेटने की चाहत और जिंदगी के हर उस पल को समेटने की कोशिश है जिसमें कवियत्री बहुत ज्यादा खुश हुई या बहुत ज्यादा दुखी हुई है.जब उसने किसी से इन बातों को बाँटा नहीं तब उसने कविता का सहारा लेकर मन की वेदना को शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति का सुख भोग लिया. और मन से निकली हुई कविताओ को सहेज लिया ताकि यह अंतर्मन  का दंश किसी और के जीवन में अपना प्रवेश निषेध कर दे.
लगता है/आज फिर किसी ने/फेकें है/नदी मे शब्दों के सिक्के/कि बहते बहते/ किनारे आ लगी है/एक कविता/
लगता है/आज किसी के/रात भर रोने से/भीगा हुआ कोई तकिया/कि फैले हुये काजल की /लकीरों से लिखी गई है/एक कविता.
इस कविता संग्रह में कई कवितायें कई भागों में लिखी गई है. जिसमें उस विषय परिपेक्ष में कवि ने अपने सारे भाव उडेल दिया है.
गलियाँ.: सोलह भाग में लिखी गई कविता है.कुछ पक्तियाँ देखे.
गलियों में चेहरे/कुछ जाने पहचाने/कुछ अनजाने/अजनबी चेहरों पर/ठिठक जाती है/गली की नजरें.
आँसू:  आठ भागों में,मेरा शहर: आठ भागों में, मौसम है गुमशुदा: दस भागों में ,और बोले है महाकाल :एक लंबी कविता है. इन कविताओं के मर्म को समझने के लिये पाठक को इन कविताओं में कुछ समय व्यतीत करना होगा.इस संग्रह की शीर्षक कविता प्रवेश वर्जित कवियत्री का विद्रोह भी प्रकट करती है.ये पक्तियाँ देखें.
अपनी निजता पर/अतिक्रमण के लिये/इस दखलंदाजी के लिये/क्यों नहीं/ बंद करते है हाथ/ उन दरवाजों को/ जहाँ लिखा है/ प्रवेश वर्जित / या फिर/ अतिक्रमण/ करने वाली नजरें ही/अनदेखा कर देती है/ लिखे हुये/ प्रवेश वर्जित को.
इसके अलावा कोलाहल, आईना,निस्सारता,उलाहना, उधेडबुन, प्राथमिकता,बावरा मन,बहुत दिनों बाद, हिसाब की किताब, वो कवितायें है जो मन को अंदर झगझोर कर रख देती है.कविताओं में समाज  के हर पहलुओं पर कवितायें देखने को मिलेगी.कही पर बेटियों का जिक्र है कही माँ की वेदना है.कहीं पर मोहल्ले की बात की गई है.कहीं पर गलियों की बात की गई तो कहीं पर उमर की बात की गई. परन्तु अधिक्तर कवितायें कवियत्री के मन के उहापोह को केंद्र में रखती कविताये हैजिनका संबंध समाज से जितना है उससे कहीं ज्यादा मन की वेदना,दंश,उहापोह,और कसक से संबंध है.अग्रवाल पब्लिक स्कूल में शिक्षण कार्य करने के बावजूद नई कविता का सउर सिखाती हुयी ये कविताये समाज में दिल और दिमाग के बीच सामन्जस्य स्थापित करने का संदेश दिया है.
सामान्यतः नई कविता के माध्यम से सीधे सपाट शब्दों में भावो को अभिव्यक्त करने आदत रही है.निराला इसके अपवाद रहे है.आधुनिक कवियों की इस परंपरा को टोडती ये कवितायें सामाजिक मूल्यों की बात करती है वो भी कविता जैसा कुछ लिख कर.जो हो सकता है कि आजकल के साहित्यिक मठाधीसों को ना पच पाये.परन्तु इस प्रकार का प्रारंभ कवियत्री के द्वारा सराहनीय कदम है.इस बात के लिये मै उन्हे और साधोवाद देता हूँ कि उन्होने कविता की भूमि में खडे होकर बिना किसी भूमिका के कृति को पाठकों को सौंप दिया है.अब पाठक को निर्णय करना है कि सपाट बयानबाजी से वो प्रभावित होते है या फिर कविता नुमा इन कविताओं को पढकर मन के द्वारा दिमाग से कुछ सोचने के लिये विवश होते है.अंततः एक अंतर्मन की पीडा,और कसक को विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से कविता के रूप में पाठको से सामने लाने के लिये अंजनी शर्मा बधाई की पात्र है.
अनिल अयान श्रीवास्तव,सतना
सदस्य,पाठक मंच सतना,युवाकवि
संपादक:शब्द शिल्पी त्रैमासिकी,सतना
मारुति नगर,सतना.
९४०६७८१०४०


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