पुस्तक समीक्षा
संघर्ष,पीडा,वेदना
और संत्रास का कुरुक्षेत्र है:- अग्नि पथ पर
अग्नि पथ पर काव्य संग्रह श्री रामनारायण
सिंह राना द्वारा रचित नवीनतम काव्य संग्रह है जिसमे लगभग ७० कवितायें छः खंडों
में संग्रहित है ,इन कविताओं में गीत,नवगीत,लंबी कवितायें,और काव्य नाटक की सुगंध भी
देखने को मिलती है.इस कविता संग्रह को पढने में राना जी के द्वारा रचित पूर्व कविता
संग्रहों में संचित उनके हर उम्र की कविताओं का इंद्रधनुष भी देखने को मिलता है.उनकी
हर कृति को मैने पढा और गूढ अध्ययन किया है.उनका जीवन आम शिक्षक का जीवन रहा है. मै
यदि सतना से विगत कई वर्षों से साहित्यकारों के लिये शब्द शिल्पी पत्रिका का संपादन
कर रहा हूँ तो उसमें मैने राना जी के रचना समग्र और बतकहीं में अंतर्मन को छुआ भी है.
उनसे लगभग हर साहित्यिक गोष्ठियों में मुलाकात भी होती है और साहित्य समाज की चर्चायें
भी किया करता हूँ,दर्द की बाँसुरी,युद्ध के विरुद्ध,जनवाणी सीता,अंगूठा एकलव्य का,और
ना जाने कितनी संपादित कृतियाँ,बुद्ध ,भरहुत स्तूप गाथा,आदि का मैने मन भर अध्ययन किया
है. एक बहुत ही अमीर परिवार में जन्मे राना जी का संबंध राजनीति में समाजवाद से भी
रहा,भले ही यह संबंध उनके भाई साहब रामानंद सिंह की वजह से रहा हो.यह मायने नहीं रखता
है.
दर्द की बाँसुरी काव्य संग्रह से लेकर आज मेरे सामने आयी पुस्तक अग्नि
पथ पर को देखें तो उनके रचना कर्म और रचना शक्ति में बदलाव महसूस होता है.और यह कहने
में कोई परहेज नहीं है कि इस पुस्तक के हर खंड में पाठक को हर रस का स्वाद महसूस होगा
जो उनके प्रारंभिक काल से वर्तमान काल तक की रचनाधर्मिता में आई परिपक्वता को प्रभावी
रूप से परिलक्षित करती है. इस पुस्तक में देश के नामवर रचनाकारों और समीक्षकों ने अपने
विचार दिये है.जिसमें डा धर्मकीर्ति,डा चौथीराम यादव,डा जयप्रकाश कर्दम,और हनुमंत किशोर
शर्मा.सभी विद्वानों का अपना अपना दृष्टिकोण है जो कवि की सिनाक्त अपने अनुसार करता
है,इससे हटकर मै कुछ नयी बात करने का प्रयास कर रहाहूँ.ताकि उपर्युक्त विद्वानों की
बातें पुनरावृति ना हो.अपने शहर में मैने यह महसूस किया है कि सतना ही नहीं वरन राना
जी के रचनाकर्म अन्य साहित्यकार अपनी स्वीकृति सहज रूप से नहीं देते है क्योंकि वो
दलित चेतना और सर्वहारा वर्ग की बात करते है.ईश्वरवाद की अंधविश्वासपन को खत्म करने
की बात करते है.सर्वहारा वर्ग,मजदूर,दबे कुचले समुदाय की बात करते है.जो साहित्य जगत
को बेमानी सा महसूस होता है.बौद्ध धर्म स्वीकार करने के पश्चात उनकी रचनाधर्मिता को
साहित्यिक संगठनों ने नेपथ्य में पहुँचा दिया.और इसी चेतना को अपनी ध्वजा मानकर जन
समुदाय में राना जी अपनी रचनाओं के माध्यम से ध्वज वाहक की तरह आँगे बढ रहें है.
भावपक्ष:-
अब आते है इस कृति पे ,अग्निपथ पर काव्य संग्रह के प्रथम खंड में १३ कवितायें है जो
विकास और चेतना की बात करती है.जिसमें अग्नि पथ पर,क्रांति स्वर,संघर्श भरा मेरा परिचय,और
कृष्ण महाप्रयाण जैसी अद्भुत कविताये है, खंड दो में सिर्फ ६ कवितायें है जो मातृसत्ता
के प्रभाव को वर्णित करती है. इसमें उद्धत यशोधरा के प्रति ,आम्रपाली,सत्याग्रही सीता,जैसी
कविताये इस खंड की विशेष कवितायें है. खंड तीन प्रेम और आह्लाद की कविताओं का संग्रह
है.प्रेम, से यह खंड प्रारंभ होकर उर्वशी और द्रोपदी मे जाकर समाप्त हो जाता है. खंड
चार में १२ कवितायें संग्रहित है जिसमें पर्यावरण,प्रकृति, किसान,खेती बारी,ग्राम जीवन
आदि पर केंद्रित कवितायें है.खंड पांच में ११ कवितायें है जिसमें आम जन सर्वहारावर्ग
,दलित चेतना और वाम और द्क्षिण पंथ की विवशताओं और विशंगतियों पर केंद्रित कवितायें
हैं. और अंतिम छठवें खंड में १४ कवितायें है जिसमें समाजवाद,विश्व चिंतन ,दलितचेतना,और
समसामायिक परिदृश्य की कवितायें है. पूरे संग्रह की बात करें तो भावपक्ष की दृष्टि
से लगभग हर विषय बिंदुओं को छुआ है जिसमें आम सर्वहारा वर्ग की वेदना से दलित संचेतना
और राष्ट्र विश्व शांति की बात कही गई है. कविताओं में कुछ पौराणिक चरित्रों को उद्घाटित
करने वाली कवितायें और काव्य नाटक से स्त्री विमर्श की भी सुगंध आती है.भाव पक्ष में
गांधी,मार्टिन लूथर किंग,बाबा साहब,शहीदे आजम,श्रमिक आंदोलन,मजदूर दिवस,आदि विशेष अवसरों
पर लिखी गयी कविताओं का भी संग्रह है जो कहीं ना कहीं विशेष अभिरुचि को भी पाठकों के
सामने रखता है.
कलापक्ष:-
इस कृति मे पारंपरिक गीतों और उनकी गेयता का भी मनोहारी चित्रण है.काव्य
शिल्प की दृष्टि से संगीतबद्ध किये जाने वाले गीत भी इस कृति में उपस्थिति दर्ज करा
रहें है. नई कविता का पुरजोर प्रभाव कवि की लेखनी ने दिखाया है.पढते पढते ऐसा महसूस
हुआ कि जब कवि पारंपरिक गीतों के तारतम्यता को निरंतरता देने में असमर्थ रहा और अपने
विचारों को इसमें बांध नहीं पाया तो उन्होंने मुक्त छंद का साथ लेकर अपने मनो भावों
को पाठकों के सामने रखा.इसमें बहुत से देशज शब्दों का भी प्रयोग देखने को मिलता है
विशेष रूप से पाली भाषा और बघेली बोली के शब्द भी प्रयोग किये गये है जो नवीनता लिये
हुये और संबंधित अर्थ पाठ्क के ज्ञान वृद्धि को बढाते है.इसमें दक्षिणा और द्रौपदी
जैसे काव्य नाटक की विधा भी पाठक के सामने आयी है जो विंध्य क्षेत्र मेंबहुत कम देखने
को मिली है. दलित और सर्वहारा वर्ग की वेदना का बखान करने के द्वंद में राना जी ने
शब्दावली का चयन जिस प्रकार किया है वह कहीं ना कहीं कविता के मर्म की मांग हो सकती
है परन्तु मुझे ऐसा महसूस हुआ कि इस प्रकार की शब्दावली जो आमजन में अधिक्तर उपयोग
की जाती है और जुबान पर है ,उसे बखान करने से अन्य खंडों का प्रभाव कुछ कम सा लगने
लगता है संतुलित और साम्य भाषा से भी कवि अपने विचार रख सकते थे.
इस पूरे संग्रह में राना जी का रचना कर्म कितना अपने साहित्य धर्म
का निर्वहन किया है,इसका पूरा प्रमाण उनकी कविताएँ प्रस्तुत करती है.यह संग्रह उनके
प्रशंसकों के लिये आह्लाद का मार्ग और उनके निंदकों के लिये पीडा का मार्ग प्रसस्त
करेगा. उनका रचना कर्म किस स्तर से प्रारंभ होता है और आज किस वैचारिक पृष्ठभूमि में
खडा हुआ है उसका सजीव उदाहरण है उनका यह संग्रह अग्निपथ पर . शीर्षक की सार्थकता यही
है कि अधिक्तम कवितायें सर्वहारावर्ग, दलित वर्ग,आम जन,स्त्रियों के जीवन के संघर्ष
को प्रदर्शित करती है जिसका हर पल एक अग्नि पथ में सफर कर रहे पैरों के अंतस में उत्पन्न
हुई पीडा के ताप को अनुभव करता है.इस जीवन के अग्नि पथ में इंशान को किस तरह चलना चाहिये
इसकी प्रस्तावना ही यह पुस्तक का केंद्रीय मूल है.इस हेतु राना जी साधोवाद और बधाई
के पात्र हैं.
अग्नि
पथ पर चल रहे, कदमों का एक सम्मान है यह.
कवि
के द्वारा उनके लिये, अर्पित लेखनी से मान है यह.
संघर्ष,पीडा,वेदना,संत्रास
का, कुरुक्षेत्र बनता है यहाँ,
अन्याय
अत्याचार से ,अंतर्मन में उठा एक गान है यह.
अनिल अयान श्रीवास्तव,सतना
संपादक शब्द शिल्पी,सतना
९४०६७८१०४०.
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