Friday, 11 July 2014

जम्मू काश्मीर के उत्थान में छिपे रहस्य का प्रमाण: जम्मू काश्मीर की अनकही कहानी


जम्मू काश्मीर के उत्थान में छिपे रहस्य का प्रमाण: जम्मू काश्मीर की अनकही कहानी

(पुस्तक:  जम्मू काश्मीर की अनकही कहानी, लेखक: डां कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री , समीक्षक: अनिल अयान,सतना)

प्रभात प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री के द्वारा रचित पुस्तक "जम्मू काश्मीर की अनकही कहानी" जम्मू काश्मीर के उदय की गाथा है.हम यह भी मान सकते है कि जम्मू काश्मीर के उत्थान में छिपे रहस्य का प्रमाण है.वह प्रमाण जिसका उदय प्रजा परिषद के उदय के साथ ही प्रारंभ हो चुका था.कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के धर्मशाला क्षेत्रीय निदेशक रहे है.वो आपातकाल के नजरों देखा इतिहास जानते है,पंजाब में जनसंघ के विभाग संगठन मंत्री तथा जनसत्ता और हिन्दुस्तान टाइम्स में कार्य कर चुके है.भाजपा के साथ गहरा संबंध रखने वाले कुलदीप जी का जीवन राजनैतिक पृष्ठ्भूमि से काफी जुडा रहा है.इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसकी प्रस्तावना भारतीय जनता पार्टी के वयोवृद्ध राजनेता और राजनीति की एक खास शक्सियत लाल कृष्ण आडवानी जी ने लिखा है.उन्होने अपनी प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से कहा है इस पुस्तक में वह सभी तथ्य मौजूद है जिसमे भारतीय जनसंघ का इस उद्देश्य को पूर्ण करने में योगदान और डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दवारा किये प्रयास का खुला चिट्ठा है.प्रजापरिषद के प्रमुख पं प्रेम नाम डोगरा जी के नेतृत्व में किस तरह से एक देश में दो विधान, दो निशान- नहीं चलेंगे नहीं चलेंगे के आंदोलन को रफ्तार प्रदान की गई.इस पुस्तक का प्रकाशन भी २३ जून २०१३ अर्थात डा.श्यामाप्रसाद मुखर्जी बलिदान दिवस के दिन ही  किया गया.इस पुस्तक के लेखक ने भी इस बात को स्वीकारा है कि जम्मू काश्मीर नाम का राज्य सिर्फ जम्मू और काश्मीर ही बस रियासत नहीं है इसमें लद्दाख,गिलगिल,बल्तीस्तान भी संभाग है और यह भी सत्य है कि काश्मीर को छोड दें तो नेशनल कांफ्रेंस का प्रभाव इन संभागों में बहुत कम था.प्रजा परिषद का काउदय जिस तरह हुआ उसका उद्देश्य आज भी अधूरा है.इन आंदोलनों में के प्रमुख पात्र प्रेम नाथ डोगरा,शेख अब्दुल्ला,डा.कर्ण सिंह और बख्शी गुलाम मोहम्मद का नाम अग्रणी रहा और इनकी आत्म कथाओं से बहुत से तथ्य भी निकल कर पाठकों के सामने आता है.
            इस पुस्तक में पौने दो सौ पृष्ठ है परन्तु इन पृष्ठों में लेखक ने नौ उप भागों में जम्मू काश्मीर के इतिहास का पोस्टमार्टम किया है जिसमें जम्मू काश्मीर की सियासत की पृष्ठभूमि,प्रजा परिषद की स्थापना,शेख अबदुल्ला का शासन काल,जम्मू में छिडे छात्र आंदोलन जो १५ जनवरी १९५२ से ०६ अप्रैल १९५२ तक चला था का जिक्र है.इस अलावा सबसे विवादित भाग उतरते नकाब,भिंचती मुट्ठियाँ है.प्रजापरिषद आंदोलन का देश भर में विस्तार तथा डा श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान और शेख अबदुल्ला का पतन भी कुछ पठनीय भाग भी लेखक के द्वारा लिखा गया है.उपसंहार और परिशिष्ट के चार भागों में प्रजा परिषद के अध्यक्ष पंडित प्रेमनाथ डोगरा द्वारा डा.राजेद्र प्रसाद को १९ जून १९५२ को सौपे गये ज्ञापन का ,डा कर्ण सिंह के द्वारा जवाहर लाल नेहरू को जम्मू के हालात पर २७ दिसम्बर १९५२ को भेजी गयी रिपोर्ट का,डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा ७ अगस्त १९५२ को काश्मीर समस्या पर लोक सभा में दिये गये भाषण का और प्रजापरिषद के आंदोलन शहीदों की सूची घटना क्रम का जिक्र मिलता है सन १९३९ से १९६३ तक के घटना क्रम का विस्तार से तथ्य परक जिक्र किया गया है. लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से साफगोई बात की है जिसमें प्रजापरिषद और श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जम्मू काश्मीर के लिये किये गये कार्य और  आंदोलन में भूमिकाओं को पाठकों के सामने रखा है.इस पुस्तक के लेखक का राजनैतिक स्तर भारतीय जनसंघ से जुडा हुआ है तो उसका असर भी लेखन में दिख रहा है. अधिक्तर बातें जनसंघ के नजरिये को ध्यान में रख कर ही की गई है. कुछ भी विचार धारा रही हो परन्तु काश्मीर की वास्तविक राजनैतिक और सत्ता की गणित का इस पुस्तक के माध्यम से विस्तृत चित्रण किया गया है.काश्मीर के बारे में जो हम टीवी चैनलों में या अखबारों में देखते वा पढते है उससे बहुत ज्यादा अलग वास्तविकता का वर्णन इस पुस्तक में मिलता है.यह पुस्तक पाठकों को स्वतंत्रता से पूर्व जम्मू काश्मीर राज्य के उदय और उसके बाद इसकी राजनीति में आने वाले मोडों का जिक्र मिलता है.पुस्तक में कुछ कठिन संवैधानिक शब्दावली का भी जिक्र किया गया है जो राजनैतिक समझ रखने वाले ही लोग समझ सकते है. परन्तु एक अनुसंधानात्मक पुस्तक को लिखने के लिये लेखक को साधोवाद देता हूं.
अनिल अयान
संपादक शब्द शिल्पी ,सतना
संपर्क:९४०६७८१०४०

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